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जल क्षेत्र के लिए अभिशाप है नेताओं-अफसरों-ठेकेदारों की सांठगांठ : शशि शेखर

जल संसाधन मंत्रालय के सर्वोच्च अधिकारी शशि शेखर ने बताया पूरे जल क्षेत्र में क्या गलत हो रहा है और इसे कैसे ठीक किया जाना चाहिए।
Shashi Shekhar speaking at India Rivers Week [image courtesy India Rivers Week]
Shashi Shekhar speaking at India Rivers Week [image courtesy India Rivers Week]

नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने नदियों, विशेषकर गंगा की सफाई पर, विशेष जोर डाला और देश भर में सिंचाई क्षमता में भी सुधार कर रही है। इसने भारत की नदियों को जोड़ने की विवादास्पद परियोजनाओं को भी पुनर्जीवित किया है। नदी विकास और गंगा संरक्षण, इन सबके पीछे की कहानी गढ़ने वाले व्यक्ति काफी हद तक जल संसाधन मंत्रालय के सचिव शशि शेखर हैं। अपनी सेवानिवृत्ति से एक सप्ताह पूर्व www.thethirdpole.net के साथ  उन्होंने बातचीत की। इस निष्पक्ष साक्षात्कार में मंत्रालय के सर्वोच्च अधिकारी ने बताया भारत के जल क्षेत्र की समस्याओं और संभावनाओं के बारे में…

प्रश्न: बस कुछ दिन पहले, भारत नदी सप्ताह की समाप्ति पर आपने कहा था कि देश के जल क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या राजनेतानौकरशाहठेकेदार की सांठगांठ है। क्या आप इसे विस्तार से बात सकते हैं?

शशि शेखर: देखिए, सिंचाई कैसे होती है। निर्माण कार्य में पैसा है। काफी ज्यादा भू-कार्य (जैसे सिंचाई के लिए जलाशय और नहर बनाना) के साथ कोई भी निर्माण कार्य बिल्डरों को अधिक आकर्षित करता है और यह वहां ज्यादा होता है, जहां जवाबदेही कम होती है। मैं कहता हूं कि मैं सिंचाई निर्माण कर रहा हूं, लेकिन मूल रूप से मैं संपत्ति निर्माण कर रहा हूं। वास्तविक सिंचाई और सिंचाई संभावना के बीच का अंतर देखिए, और आप खुद समझ जाएंगे कि मैं किस बारे में बात कर रहा हूं। दोनों के बीच औसत अंतर लगभग 45 प्रतिशत है। लोगों की दिलचस्पी सिंचाई में नहीं, बल्कि निर्माण कार्य में हैं क्योंकि उसी में पैसा है। सभी राज्यों के पास इसके लिए बड़ा बजट है। आखिरकार, देश में कुल (नहर) सिंचित क्षेत्र 10-15 प्रतिशत है। तो क्यों इन सबको इतना ज्यादा संसाधन मिलता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इसमें ठेकेदार रुचि रखते हैं और मेज के नीचे लेन-देन होता है। यह समस्या है।

प्रश्न: इस समस्या का समाधान क्या है?

शशि शेखर : इसका समाधान यह है कि जो लोग सिंचाई के पानी का प्रयोग करते हैं यानी किसानों को सिंचाई-सतह और भूमिगत जल का पूरा नियंत्रण दिया जाए। पानी बहुत महत्वपू्र्ण है। हमारे जीवन के लिए बहुत जरूरी है, इसे दूसरों के लिए नहीं छोड़ा जा सकता है। इसका नियंत्रण पंचायत के हाथ में हो। वही लोग यह तय करेंगे कि पानी को कैसे प्रयोग करना चाहिए, पहले मानवीय जरूरतों के लिए, फिर जानवरों के लिए और फिर सिंचाई के लिए। और जब पंचायत या स्थानीय जल प्रयोगकर्ता समूहों के पास जल की उपलब्धता की जानकारी है, तब वे सही निर्णय लेते हैं। जब उन्हें भंडार का पता है, तब वे मांग को प्रबंधित कर लेते हैं। महाराष्ट्र और तमिलनाडु के पेन्नागरम में इस तरह का उदाहरण मौजूद है। यह पूरे देश में लागू करने की जरूरत है।

प्रश्न: लेकिन वर्तमान स्थिति विशेषकर तब भूमिगत जल की कमी है, तब भूमिगत जल की निकासी को विनियमित करने वाले बिना किसी कानून के क्या पंचायत कोई प्रभावी निर्णय ले पाएंगी?

शशि शेखर: हम आज भी इन चुनौतियां का सामना कर रहे हैं। सवाल यह है कि हमें इसे जारी रखने के लिए अनुमति चाहिए? जवाब है नहीं। हमें भूमिगत जल और सतही जल का संयुक्त प्रयोग करना है और उन्हें एक छत के नीचे लाना है। यही हम (योजनाबद्ध) राष्ट्रीय जल आयोग के साथ कर रहे हैं। हमें 90 दिनों में पूरा पानी मिल जाता है, जो 365 दिन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। हमें पानी को संग्रहित करना है। लेकिन किस कारण से मैंने कहा कि सतह पर इसका भंडारण करना, इसका उपयुक्त तरीका नहीं है। भारत में भूमि का अभाव होने के कारण आप अधिक सतही जलाशय नहीं बना सकते, इसलिए भंडारण केवल जमीनी स्तर के नीचे हो सकता है। इसके साथ ही भूमिगत जल वाष्पित यानी सूखते भी नहीं हैं। इसलिए हमें पानी का भंडारण भूमिगत करना होगा, और उसे समझदारी से प्रयोग करना होगा। वैसे भी, सिंचाई के लिए कितने पानी की जरूरत होती है? खरीफ (गर्मी) की फसलें मानसून के दौरान बढ़ती है, जब बारिश होती है। रबी (सर्दी) की फसलों को ज्यादा से ज्यादा तीन बार पानी देना होता है।

जब एक गांव को पता है कि इसके पास 100 यूनिट सतह और भूमिगत जल उपलब्ध है, तब उसे यह भी पता होता है कि वह 400 यूनिट जल इस्तेमाल नहीं कर सकता है। हमें अपने सीमित साधनों में रहना सीखना चाहिए। देश के करीब 6,50,000 गांवों में मात्र लगभग 1,00,000 गांवों को नहरों से पानी मिलता है। बाकी के 5,50,000 गांवों को खुद के लिए जुगाड़ करना पड़ता है। इसलिए पानी के प्रयोग की प्राथमिकता निर्धारित करने की जरूरत है और यह ग्राम पंचायत स्तर पर किया जा सकता है। इसके लिए ग्राम पंचायत की क्षमता निर्धारित करना सबसे जरूरी है। यह एक बहुत बड़ा काम है।

पानी के समान वितरण के लिए पंचायतें बैठें और फैसला करें। इसमें कानून कोई मदद नहीं कर सकता है। और यह कारगर भी है। पेन्नागरम में प्रथम वर्ष में ही 20 गुना अधिक आय दर्ज की गई। लेकिन ग्रामीणों को जल बजट बनाने के लिए, उनके पास कितना पानी है पता होना जरूरी है। यहीं सरकार की भूमिका होती है। हम प्रत्येक 20 किलोमीटर पर अतिरिक्त 20 किलोमीटर के क्षेत्र के लिए एक पेईजोमीटर (Piezometer) (भूमिगत जल दबाव मापने का यंत्र) दे रहे हैं। अब हम इसे प्रत्येक 5 किलोमीटर से अतिरिक्त 5 किलोमीटर के लिए बढ़ा रहे हैं। मुझे लगता है कि हमें प्रत्येक दो किलोमीटर पर अतिरिक्त दो किलोमीटर के लिए एक पेईजोमीटर देना चाहिए। तब लोगों को जानकारी होगी कि उनके पास कितना पानी है और वे निर्धारित करेंगे कि उसे कैसे प्रयोग करना है, अगर अगले वर्ष सूखा पड़े तो उससे निपटने के लिए इसे कैसे बचाना है। तब आपके पास गन्ना जैसी गहन पानी वाली फसलों को कम जल वाले क्षेत्र में पैदा करने की स्थिति नहीं होगी।

नदियां का प्रदेश

प्रश्न: आप जिस बारे में बात कर रहे हैं, उसके लिए साफसुथरी नदियों की भूमिका अहम है। नदियों को पुन: साफसुथरा बनाने के लिए आपका मंत्रालय क्या कर रहा है, वह भी विशेषकर तब, जब अंतरराज्यीय विवाद दिनप्रतिदिन और उलझते जा रहे हैं?

शशि शेखर: हमारे देश में बिना पानी की नदियां है। वह नौ महीने के लिए सूख जाती हैं और इसलिए वे अपने पारिस्थितिकीय कार्य पूरे नहीं कर पा रही हैं। और इसमें हमारी राष्ट्रीय नदी गंगा भी शामिल है। नदियां और मानव एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा में है। जब यह बात अंतरराज्यीय विवादों पर आती है, तब कोई भी पारिस्थिति तंत्र के तौर पर नदी के बारे नहीं सोचता। वे केवल पानी के लिए लड़ाई करते रहते हैं। आंकड़ों की कमी के कारण (नदी के पानी के बहाव और साफ-सफाई के बारे में) यह एक बड़ी समस्या बन गई है।

प्रश्न: लेकिन क्या कावेरी की तरह हमारे पास अन्य बड़ी विवादित नदियों के आंकड़े हैं?

शशि शेखर: नहीं, हमारे पास नहीं है। कावेरी समझौता 1920 में किया गया था, तब कुर्ग में इसका अधिकांश पानी वन क्षेत्रों में बहता था। अब उन जंगलों को कॉफी बगान, सड़कों और अन्य परियोजनाओं में बदल गए हैं। कुर्ग में अब उतना पानी उपलब्ध नहीं होता है और हमारे पास कोई आंकड़े नहीं है।

आंकड़े

प्रश्न: और आंकड़े बनाने और इसे पारदर्शी बनाने, सभी के लिए उपलब्ध करने के लिए आप क्या कर रहे हैं?

शशि शेखर: 7 दिसंबर, 2016 की कैबिनेट बैठक में यह फैसला लिया गया है कि प्रत्येक नदी घाटी का नि:शुल्क (जल प्रवाह) आंकड़े जल्द उपलब्ध कराएं जाएंगे। इसे अपनी वेबसाइट पर डालेंगे और इसे कोई भी प्रयोग कर सकेगा। यह भी निर्णय लिया गया कि जल्द ही प्रत्येक 25 वर्ग किलोमीटर के लिए भूमिगत जल आंकड़े उपलब्ध कराए जाएंगे।

प्रश्न: क्या जल प्रवाह आंकड़ों के लिए यह ट्रांसबाउंड्री नदी घाटियों के साथ साथ सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी घाटियों में भी लागू किया जाएगा?

शशि शेखर: यह अगला चरण होगा।

गंगा संरक्षण

प्रश्न: नमामि गंगे (गंगा के संरक्षण पर सरकार का अभियान) पर आते हैं, इसकी वर्तमान स्थिति क्या है?

शशि शेखर : इस सवाल का जवाब देना बहुत मुश्किल है। इसका जवाब मैं घुमाकर देना पसंद करूंगा। पुनर्जीवित करने के लिए कोई भी नदी नहीं ली गई है, डेन्यूब या मर्रे नदी हो, और से गंगा की तुलना में संकीर्ण नदियां हैं, ने कम से कम 30-40 साल ले लिया है। तब हम पांच वर्ष की बात क्यों कर रहे हैं?

जहां तक सफाई का संबंध है, तो प्रदूषण कई तरह के होते हैं जैसे कि विभिन्न घरों से निकलने वाले सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, कूड़ा-कचरा की नालियां जो नदी में खाली होती है, को रोकने की जरूरत है। 1980 से (जब पहला गंगा एक्शन प्लान प्रारंभ किया गया था) मोटे तौर दो चीजों – एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स) और रिवरफ्रंट विकास को केंद्रित किया गया है। जहां तक एसटीपी की बात करें, तो उनमें से अधिकांश या तो बेकार पड़ी है या फिर उनकी अनदेखी की जा रही है। ऐसा इसलिए है क्योंकि (बिल्डरों की) रुचि एसटीपी बनाने में है और उनका संबंध मात्र इसके निर्माण कार्य से है। यहां भी ठीक वैसी ही परिस्थिति है, जैसी सिंचाई के लिए है। एक बार इसका निर्माण हो जाता है, तब यह बिल्डरों के लिए महत्व नहीं रखता है। लेकिन अगर वेतन ओ एंड एम (परिचालन और रख-रखाव) के आधार पर दी जाए, तो कुछ जवाबदेही होगी। पीपीपी (सार्वजनिक-निजी साझेदारी) ज्यादा विवेकपूर्ण होता है।

सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए एक रणनीति तैयार की है। लेकिन एक नदी की वास्तविक परीक्षा यह है कि वह पर्याप्त पानी वहन करती है या नहीं। और इसके साथ नदी का पारिस्थितिकीय तंत्र पुनर्जीवित होता है, रोहू और काटला जैसी मछलियों की प्रजातियां पुनर्जीवित हो जाती हैं, तो यह एक अच्छा सबूत होगा।

प्रश्न: भारतीय संविधान में मोटे तौर पर पानी एक राजकीय (अपेक्षाकृत केंद्र के) विषय है, इसलिए जब आप नदियों को पुनर्जीवित करने की बात करते हैं, तब क्या आपको दिक्कतों का सामना करना पड़ता है?

शशि शेखर: हां, यह एक समस्या है। यहां तक कि जब विवादों को हल करने की बात की जाती है, तब केंद्र केवल तभी कदम बढ़ा सकता है कि जब संबंधित राज्य सहमत हो। कोई भी राज्य, संसद के उस अधिनियम को लागू नहीं किया है। अभी पंजाब (सतलुज यमुना लिंक विवाद पर) क्या कर रहा है। संविधान में एक संशोधन की जरूरत है। इसकी मांग लोगों को करनी चाहिए। केवल तभी राजनेता सुनेंगे।

प्रश्न: नदियों को जोड़ने की योजना के बारे में आपका क्या विचार है?

शशि शेखर: मैं इसके बारे में कुछ नहीं बोलूंगा।