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कोरोना वायरस: पहाड़ी शहरों की झुग्गियों में रहने वालों के लिए सोशल डिस्टेंसिंग एक क्रूर मजाक

बामुश्किल मीटर भर चौड़ी गलियों में छोटी-छोटी झुग्गियों में ठुंसे गरीबों के लिए कॉविड-19 अनेक मुसीबतें लेकर आया है। सोचने वाली बात है कि ऐसे लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कैसे कर सकते हैं?
What distance is possible in places like Ganj Road, Shimla, Himachal Pradesh? [image: Alamy]
What distance is possible in places like Ganj Road, Shimla, Himachal Pradesh? [image: Alamy]

सुमिता सिंह कहती हैं, “प्रधानमंत्री, दूर रहने यानी सोशल डिस्टेन्सिंग के बारे में बात कर रहे हैं वह हम जैसे लोगों के लिए बहुत दूर की बात है। वह चाहते हैं कि हम एक मीटर की न्यूनतम दूरी रखें। हमारे घर को देखो। छह लोग एक घर में रहते हैं जो पांच मीटर चौड़ा और तीन मीटर अंदर तक है। क्या हम इस सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर सकते हैं?” विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अब “सोशल डिस्टेसिंग” के बजाय “फिजिकल डिस्टेसिंग” पर जोर देना शुरू कर दिया है, लेकिन सिंह के लिए दोनों समान रूप से असंभव हैं।

सिंह ने अपने फोन के कैमरे को अपने तंग घर के चारों तरफ घुमाया और दरवाजे से बाहर आकर उन्होंने बामुश्किल एक मीटर चौड़ी कच्ची गली दिखाई जिसमें इसी तरह के भरे हुए घरों के अलावा महिलाओं की एक कतार नजर आई। पृष्ठभूमि में एक वन पहाड़ी दिखाई दी, जिससे शिमला की इस झुग्गी बस्ती के इन निवासियों को एक दिन में केवल 30 मिनट तक पानी की आपूर्ति मिलती है। सिंह ने कहा, “शुक्र है, बारिश हो रही है, जिससे आम दिनों की तुलना में पानी की कतार छोटी है। और आप देख सकते हैं कि ज्यादातर लोग मास्क पहने हुए हैं। हम कोरोना वायरस बीमारी के बारे में जानते हैं। हम जानते हैं कि यह कितना खतरनाक है। हम जानते हैं कि हमें अलग-अलग रहना चाहिए। लेकिन हम यह कैसे कर सकते हैं? हम लोगों के लिए एक ही सार्वजनिक शौचालय है, तो किसी भी हालात में हर किसी को वहीं जाना है।

दक्षिण एशिया में कॉविड-19 महामारी का डर बड़े शहरों से छोटे शहरों, कस्बों और गांवों तक फैल रहा है और इस वजह से हजारों-हजारों प्रवासी कामगारों को अपने घर लौटना पड़ा है। सिंह के पति नई दिल्ली में जूते के एक स्टोर में सेल्समैन का काम करते थे लेकिन वह स्टोर बंद हो गया। सुमिता सिंह कहती हैं कि वे भाग्यशाली हैं क्योंकि स्टोर के मालिक ने उनके पति के वेतन का भुगतान करते रहने का वादा किया है। और वह 24 मार्च की आधी रात को पूरे भारत में लॉकडाउन लागू होने से पहले अपने घर शिमला आने में कामयाब रहे।

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला और अन्य पहाड़ी शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के लिए ये समय खासतौर पर कठिन है। समतल भूमि की कमी का मतलब है कि मैदानी इलाकों की मलिन बस्तियों की तुलना में यहां- जहां पर कई झुग्गियां तो ढलान वाली जगह पर हैं- लोग ज्यादा बुरी तरह से ठुंसे हुए अपना जीवन काट रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में पहाड़ी के ढलान पर भीड़भाड़ वाले मकान [image: Alamy]
घर वापसी

सोनाली थापा ने दार्जिलिंग की ऐसी ही झुग्गी बस्ती से बाहर निकलने के लिए पढ़ाई में बहुत मेहनत की। वह ईसाई मिशनरियों द्वारा चलाए जा रहे एक स्थानीय स्कूल में गईं और अपना पूरा फोकस अंग्रेजी बोलने पर किया। इससे स्कूली पढ़ाई खत्म करने के बाद उन्हें कोलकाता के पार्क स्ट्रीट (अब आधिकारिक तौर पर मदर टेरेसा सारानी) में एक फैशनेबल रेस्तरां में ‘गेट पर लोगों का स्वागत करने वाली’ के रूप में नौकरी मिल गई।

थापा ने पिछले दस वर्षों में रेस्तरां प्रबंधन टीम का सदस्य बनने के लिए प्रगति की और जब कॉविड-19 महामारी के चलते रेस्तरां बंद हुआ, उस वक्त वह अपने माता-पिता, दादा-दादी और छोटे भाई को दार्जिलिंग के बेहतर इलाके में, एक बेहतर घर में ले जाने की योजना बना रही थीं। खैर, उस वक्त उनको जो भी परिवहन का अगला साधन उपलब्ध हुआ, उससे वह वापस दार्जिलिंग आ गईं।

थापा कहती हैं, “मैंने पढ़ा है कि कैसे यह वायरस दूषित सतहों के जरिये हवा के माध्यम से भी अधिक फैल रहा है। इसलिए कोलकाता छोड़ने से पहले, मैंने घर में हर किसी के लिए दस्ताने और मास्क खरीदे। ” वह कहती हैं, “आप तो जानते हैं कि एक रेस्तरां में हमें हर जगह से आपूर्ति मिलती है। हमें हर जगह से ग्राहक मिलते हैं। इसलिए अगर मैं संक्रमित हो जाती तो ये कहां से हुआ, ये बताने के लिए मेरे पास कोई रास्ता नहीं था। और अगर मैं कॉविड वायरस को अपने घर ले आती, तो मैं निश्चित रूप से ये नहीं चाहती थी कि कोई और इससे संक्रमित हो। मुझे पता है कि हमारा घर कितना छोटा है। दो छोटे कमरों में सभी लोग पैक रहते हैं। ऐसे में एक ही सुरक्षित तरीका है कि हर वक्त दस्ताने और मास्क पहने जाएं।

अब उनकी दो समस्याएं हैं। सबसे पहली दिक्कत ये है कि उन्होंने एक केमिस्ट की दुकान से दस्ताने और मास्क लिये थे, ये डिस्पोजेबल होना चाहिए थे, लेकिन उनको रिप्लेसमेंट नहीं मिल सका। इसी से उनकी दूसरी समस्या शुरू होती है। दरअसल, उनके पिता रिप्लेसमेंट के लिए हर समय शहर जाना चाहते हैं। वह हंसते हुए कहती हैं, “मैं उन्हें बताती रहती हूं कि यह सब ठीक है। हम हर दिन उबलते पानी में मास्क और दस्ताने धो रहे हैं। लेकिन उनको घर में रोक कर रखना बहुत मुश्किल है। उनको इसकी आदत नहीं है। मेरे कुछ दोस्तों को भी इन बूमर (1946 से 1964 की बीच जन्म लेने वालों के लिए ये शब्द इस्तेमाल किया जाता है) पैरेंट्स से इसी तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।“

मुझे अपना वेतन कैसे मिलेगा?

गुवाहाटी में दीपोर बील के करीब एक झुग्गी बस्ती की शिप्रा दास को अपने माता-पिता के साथ ये वाली समस्या नहीं है। उनके माता-पिता इतने कमजोर हैं कि वे ज्यादा इधर-उधर नहीं जा सकते। बिना सीमेंट लगी ईंट और टिन वाली छत की झोपड़ी में जिंदगी बसर करने वाली और गुवाहाटी के चार घरों में इस अंशकालिक घरेलू कामकार की असली चिंता उसका पैसा है। मैं तब तक काम पर जा रही थी, जब तक जा सकती थी। लेकिन पहले एक घर में और फिर अन्य घरों में मुझसे न आने के लिए कहा गया। और अब मैं उन घरों में नहीं जा सकती, जहां मैं काम करती हूं क्योंकि पुलिस हमें जाने नहीं दे रही है। सभी घरों से मुझे कहा गया है कि मुझे मेरा वेतन मिल जाएगा। लेकिन अपना पैसा लेने के लिए मैं कैसे जाऊं?

इस बीच, हमेशा की तरह घर पर खाने-पीने के सामान की आपूर्ति कम हो रही है। झुग्गी बस्ती की जरूरतों को पूरा करने वाले किराने की छोटी दुकानें तो खुली हैं, लेकिन कीमतें बढ़ गई हैं। दास, पूरे देश में लॉकडाउन की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद पुलिस द्वारा जबरन दुकानें बंद करवाने को लेकर चिंतित हो रही थीं, लेकिन अचानक उन्होंने कॉल को होल्ड पर डाल दिया। जब वह वापस आईं तो उन्होंने बताया कि वह अपने किशोर बेटे को डांट रही थीं क्योंकि वह क्रिकेट खेलने के लिए गली में बाहर जाना चाहता था। वह कहती हैं, “मैंने इस नई बीमारी के खतरे के बारे में सुना है। लेकिन जितना संभव हो उतना कम बाहर जाने के अलावा, हम गरीब लोग क्या कर सकते हैं? और पांच अन्य लोगों के साथ, खासकर युवाओं के लिए, इतने छोटे से कमरे में कैद रहना बेहद मुश्किल है। और सबसे बड़ी बात, इतना करीब रहने के कारण अगर हम लोगों को ये बीमारी एक-दूसरे से ही मिल जाए तो मरने के सिवा हम कुछ भी नहीं कर सकते।

यह केवल भारत की समस्या नहीं है

55 वर्षीय मुहम्मद नईम पाकिस्तान के ऐबटाबाद शहर के मलिक पुरा इलाके में एक संयुक्त परिवार के मुखिया हैं। वह चार कमरों के मकान में रहते हैं, जिसे वह अपने छोटे भाई के परिवार (पति-पत्नी और तीन बच्चे) के साथ शेयर करते हैं। नईम के खुद चार बच्चे हैं। इस तरह एक छोटे से स्थान में 11 लोग रहते हैं। नईम फल और सब्जी विक्रेता हैं, जबकि उनके भाई, दैनिक मजदूर के रूप में निर्माण कार्य करते हैं। हालांकि वह सुरक्षात्मक उपायों की सलाह के बारे में सचेत हैं, लेकिन वह ये सब कैसे करें, इसको लेकर संघर्ष कर रहे हैं।

मास्क की तरह ही सैनिटाइजर बहुत महंगे हैं। वे साबुन और पानी के उपयोग की कोशिश करते हैं, लेकिन 10 पैदल चलने के बाद उनको पानी का स्रोत मिलता है क्योंकि उनके घर में पाइप से पानी की आपूर्ति नहीं है। छोटी सी जगह में रहने और काम की प्रकृति को देखते हुए फिजिकल डिस्टेंसिंग का पालन कर पाना बहुत मुश्किल है।

नईम और उनके भाई काम के चक्कर में अपना ज्यादातर समय बाहर बिताते हैं, जबकि उन दोनों की पत्नियों के लिए सात बच्चों को घर की छोटी सी जगह में संभालना, जब दोनों के पति काम के लिए घर से बाहर हों, बेहद कठिन काम है।

बच्चों को खेलने के लिए घर के अंदर जगह बहुत कम है और गली उनके लिए खेल का मैदान रहा है।

(पाकिस्तान से एम जुबैर खान से अतिरिक्त जानकारी के साथ)

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