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जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट प्रभाव हैं हिमालयी आपदाएं

दुनिया का तापमान बढ़ता जा रहा है। ग्लेशियर पिघलते और सिकुड़ते जा रहे हैं। ऐसे में बहुत जरूरी हो गया है कि खराब तरीके से नियोजित बांधों और सड़कों के निर्माण कार्यों की समीक्षा की जाए जिससे आपदाओं और उनके प्रभावों को कम से कम किया जा सके।
धौली गंगा बाढ़ [image courtesy: Uttarakhand information department]
धौली गंगा बाढ़ [image courtesy: Uttarakhand information department]

उच्च हिमालय में एक ग्लेशियर से टूटकर बर्फ की एक बहुत भारी चट्टान एक झील में गिरी। दरअसल, जलवायु परिवर्तन के कारण एक ग्लेशियर के मुहाने पर बर्फ और जमी हुई मिट्टी से इस चट्टान का निर्माण संभव हुआ। यह चट्टान झील के पास टूट गई और इससे 7 फरवरी की सुबह भारत के उत्तराखंड राज्य में ऋषि गंगा नदी में एक बहुत भयानक बाढ़ आई। एक दिन बाद, नीचे की तरफ दो जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के लिए सुरंगों के अंदर काम करने वाले 152 से अधिक लोग लापता थे। 25 लोगों को बचा लिया गया। 10 लोगों के शव बरामद हुए। परियोजना स्थलों पर कीचड़ और मलबों का ढेर लग गया। राहत और बचाव कार्य में लगी टीमें अभी भी सुरंगों को खोलने की कोशिश कर रही हैं। इस हादसे में एक बड़ा और दस छोटे पुल बह गए।

ग्लेशियोलॉजिस्ट्स, नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व के अंदर के ग्लेशियर की पहचान करने की कोशिश कर रहे हैं, जो जनवरी में जलवायु परिवर्तन के एक अन्य प्रभाव, छह-दशक के उच्च तापमान के कारण टूट गया था। इससे ग्लेशियर के भीतर पिघले पानी की मात्रा बढ़ गई थी और इसके टूटने में तेजी आई। इसका परिणाम यह हुआ कि झील में पानी की मात्रा बढ़ गई।

जब झील ढह गई, तो कीचड़ और कंकड़-पत्थर पानी के साथ बहकर एक तरह से बाढ़ के रूप में नीचे आ गये। जलविद्युत परियोजनाओं के लिए बनाए जा रहे बांधों में भारी मलबा फंस गया। सुरंगों में कीचड़ भर गया। यह सब तब तक फंसा रहा, जब बाढ़ के पानी का बहाव नीचे नहीं गुजर गया।

समुद्र तल से 3,700 मीटर ऊपर ऊंचाई पर बसे रैनी गांव के निवासियों ने पहली बार ऐसा देखा कि कुछ हद तक शांत होने से पहले गंगा की सहायक नदियों के जरिये बाढ़ का पानी 100 किमी नीचे खड़ी ढलान पर गुजर रहा था। इतना ही नहीं, भारत की सबसे लंबी नदी गंगा कुछ समय के लिए हरिद्वार में खतरे के निशान से ऊपर बह रही थी। गंगा हरिद्वार से मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है। यहां भी नदी तट के किनारे रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया।

उत्तराखंड की स्टेट डिजास्टर रेस्पॉन्स फोर्स (एसडीआरएफ) और पास में तैनात भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) की एक इकाई ने पन-बिजली परियोजना स्थलों पर बचाव कार्य शुरू किये। ये कार्य सुरंगों को अवरुद्ध करने वाले कीचड़ की मात्रा और बर्फ पिघलने के कारण रोजाना दोपहर में नदी के पानी में इजाफे के कारण काफी बाधित भी हुआ। नेशनल डिजास्टर रेस्पॉन्स फोर्स (एनडीआरएफ) के कर्मी भी रात में ही राहत और बचाव कार्य में जुट गये। सेना और भारतीय वायु सेना के हेलीकॉप्टर्स को भी तैयार रखा गया।

सुरंगों को खाली करने और लापता का पता लगाने के प्रयास

प्रत्यक्षदर्शी

ऋषि गंगा के ऊपरी ढलानों पर बसे गांव रैनी के निवासी विजय सिंह ने The Third Pole को बताया कि ऋषि गंगा जल विद्युत परियोजना पूरी तरह से तबाह हो गई। एक भयंकर बहाव में यह परियोजना नष्ट हो गई। यह सब इतनी तेजी से हुआ कि निर्माण स्थल पर काम करने वाले लोगों के पास बचने का कोई मौका नहीं था और वे बह गए। नदी (ऋषि गंगा) का जल स्तर सेकेंड भर में कम से कम दो मीटर तक बढ़ गया। कुछ सुदूर गांवों को जोड़ने वाला एकमात्र पुल भी बह गया।

1970 के दशक में प्रसिद्ध पर्यावरण आंदोलन, चिपको, रैनी में ही फला-फूला था। उस आंदोलन में ग्रामीण सामाजिक कार्यकर्ता, जिसमें मुख्य रूप से महिलाएं शामिल थीं, मानव श्रृंखला बनाकर पेड़ के चारों तरफ चिपक कर आंदोलन और विरोध प्रदर्शन करते थे।

रैनी से थोड़ा नीचे ऋषि गंगा, धौली गंगा से मिल जाती है। भयानक बाढ़ धौली में भी रही। अपना नाम न छापने की शर्त पर इस क्षेत्र में काम करने वाले एक अधिकारी ने बताया कि धौली गंगा पर, तपोवन विष्णुगढ़ जल विद्युत परियोजना के बांध में ऋषि गंगा परियोजना से भारी मात्रा में टूट कर आया हुआ कंक्रीट और मलबा समा गया। यह क्षति बहुत व्यापक है।

यह पहली बार नहीं है कि धौली गंगा में अचानक, अत्यधिक प्रवाह के कारण इस परियोजना को नुकसान पहुंचा है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनके कारण 520 मेगावाट की परियोजना को बार-बार देरी का सामना करना पड़ा है। इस अधिकारी ने कहा कि यह झटका बहुत गंभीर है और इसके पुनर्निर्माण में कई साल लग सकते हैं। क्षति का प्रारंभिक अनुमान 5 बिलियन रुपये (68.6 मिलियन अमेरिकी डॉलर) के करीब आंका गया है।

तपोवन विष्णुगढ़ जलविद्युत परियोजना पर काम 2005 में शुरू हुआ था। इसे वित्त वर्ष 2020-21 में चालू किया जाना था। परियोजना से विस्थापित क्षेत्र के लोग और अब आपदा से प्रभावित लोग पुनर्वास की मांग करते हुए धरना और विरोध प्रदर्शन शुरू कर चुके हैं।

हिमस्खलन, हिमनद और झील

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक प्रदीप श्रीवास्तव ने The Third Pole को बताया कि नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व के क्षेत्र में कम से कम 25 ग्लेशियर थे, जहां हिमस्खलन शुरू हो गया था और यह अभी तक ज्ञात नहीं हुआ है कि कौन सा ग्लेशियर आंशिक रूप से ढह गया। ग्लेशियरों का नंदा देवी समूह लगभग 690 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला हुआ है और ऋषि गंगा का जलग्रहण क्षेत्र बनाता है।

श्रीवास्तव ने भारत के मौसम विज्ञान विभाग की रीडिंग की पुष्टि करते हुए बताया कि छह दशकों में जनवरी 2021 उत्तराखंड में सबसे गर्म जनवरी रहा है। उच्च हिमालय में मार्च और अप्रैल को हिमस्खलन का मौसम माना जाता है क्योंकि सर्दियों के बाद हिमपात में तेजी आती है। वैज्ञानिकों को आशंका है कि जलवायु परिवर्तन के चलते यह अब समय से पहले शुरू हो गया है। फरवरी की शुरुआत में भारी बर्फबारी का एक दौर तत्काल हिमस्खलन को शुरू कर सकता है।

हिंदू कुश हिमालय पर असामान्य रूप से हल्की सर्दी रही है और नासा के उपग्रहों ने इस जनवरी में माउंट एवरेस्ट के पास बर्फ से मुक्त ग्लेशियरों की तस्वीरें भी हासिल किया है। एक तरफ हिंदू कुश हिमालय में ग्लेशियर जलवायु परिवर्तन के कारण सिकुड़ते जा रहे हैं, वहीं तेजी से बर्फ की पिघलती दर के कारण मुहानों पर पहले से ज्यादा बड़ी झीलों का निर्माण हो रहा है। इन क्षेत्रों में कंकड़, बजरी, मलबे और कीचड़ अस्थिरता पैदा हो रही है।

ग्लेशियर के पिघलने का कारण आने वाली बाढ़ (GLOF) का सामना तब करना पड़ता है जब पानी की इस मात्रा को एक अस्थिर मिश्रण, जिसे मरैन या हिमोढ़ कहते हैं, के कारण नियंत्रित कर पाना संभव नहीं होता है। अब तक, इस घटना की सबसे व्यापक रिपोर्ट और इसके द्वारा उत्पन्न जोखिमों को काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) द्वारा तैयार किया गया है। साल 2013 की आपदा, जिसने उत्तराखंड के एक बड़े हिस्से को प्रभावित किया और 5,700 से अधिक लोग मारे गए, भी एक GLOF के कारण हुई थी। इसके बाद से भारत, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान में इस तरह के कई हादसे हुए हैं।

ICIMOD के निष्कर्षों को, जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (IPCC) द्वारा बदलती जलवायु में महासागरों और क्रायोस्फीयर पर विशेष रिपोर्ट में दुनिया भर के वैज्ञानिकों द्वारा समर्थन मिला है। हैदराबाद स्थित इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आईएसबी) के अंजल प्रकाश, जो उस रिपोर्ट के प्रमुख लेखक समन्वयक थे, ने कहा, “हिंदू-कुश हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ रहा है और हिमालयी क्षेत्र में वैश्विक तापमान में वृद्धि का प्रभाव अधिक होगा। अगर दुनिया में तापमान में वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम होती है, तो एचकेएच क्षेत्र में कम से कम 1.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होगी। कुछ स्थानों पर, 2.2 डिग्री सेल्सियस से ऊपर की भी वृद्धि हो सकती है।

वह कहते हैं,“हिमालयी क्षेत्रों में कम से कम निगरानी की जाती है और यह घटना वास्तव में दिखाती है कि हम इन खतरों को लेकर कितने ज्यादा संकट में आ सकते हैं। मैं सरकार से इस क्षेत्र की निगरानी में अधिक संसाधन खर्च करने का अनुरोध करूंगा ताकि हमें परिवर्तन प्रक्रिया के बारे में अधिक जानकारी हो। इसका परिणाम यह होगा कि हम अधिक जागरूक हो सकेंगे और बेहतर अनुकूलन के तरीकों का विकास कर सकेंगे। ”

ग्लेशियोलॉजिस्ट डी.पी. डोबाल, जो वाडिया संस्थान में हुआ करते थे, ने कहा कि 2013 की आपदा के बाद, गंगा के कैचमेंट में अधिक ग्लेशियरों का अध्ययन किया जा रहा था, लेकिन नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व में ग्लेशियरों पर बहुत कम जानकारी थी क्योंकि इस क्षेत्र तक पहुंचना बहुत मुश्किल था। उन्होंने कहा, “उत्तराखंड में लगभग 1,000 ग्लेशियरों में से केवल 10-15 की निगरानी की जा रही है।”

बांधों और सड़कों ने हालात ज्यादा खराब किये हैं

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बाढ़ – जिसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है – जलवायु परिवर्तन का प्रत्यक्ष प्रभाव है। बांधों और खराब तरीके से नियोजित सड़कों के निर्माण से बहाव बुरी तरह प्रभावित हुआ है। पनबिजली परियोजनाओं के लिए बांध और सुरंगों के निर्माण के साथ-साथ क्षेत्र में सड़कें भी बनाई जा रही हैं। पहाड़ की ढलानों पर अस्थिर प्रभाव को अनदेखा करते हुए हिंदू कुश हिमालय में इस तरह के निर्माण कार्य बहुत ज्यादा हो रहे हैं। ऐसे में इस भयानक बाढ़ से बहुत अधिक मलबा नीचे पहुंच गया और भारी नुकसान हुआ।

निचले इलाकों में 100 किलोमीटर के आसपास सभी पनबिजली परियोजनाओं को बंद करना पड़ा। परिणामस्वरूप, एक दिन बाद भारत की बिजली ग्रिड 200 मेगावाट कम थी। उच्च हिमालय में बांध, सुरंग और खराब तरीके से नियोजित सड़कों के निर्माण के खिलाफ विशेषज्ञ बार-बार चेतावनी देते रहे हैं। देहरादून स्थित पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट के रवि चोपड़ा ने The Third Pole को याद दिलाया कि 2013 की आपदा के बाद भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एक समिति ने सिफारिश की थी कि कोई भी बांध 2,000 मीटर की ऊंचाई से ऊपर नहीं बनाया जाना चाहिए।

यह एक “पैरा-ग्लेशियल” क्षेत्र है, जिसमें ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं, लेकिन वे मिट्टी और चट्टानों के मिश्रण को छोड़ देते हैं जो कि बांधों और सुरंगों के लिए भारी खतरा हैं। समिति ने विशेष रूप से कहा था कि धौली गंगा पर प्रस्तावित छह बांध नहीं बनने चाहिए। इस GLOF द्वारा जलप्लावित हुई परियोजना को सरकार के स्वामित्व वाली NTPC द्वारा इस सिफारिश के बावजूद बनाया जा रहा था। कुल मिलाकर, समिति ने अध्ययन किए गए 24 बांध परियोजनाओं में से 23 को हटाने की सिफारिश की थी।

बर्बाद हुई परियोजनाएं

7 फरवरी की भयानक बाढ़ का सीधा असर स्थानीय निवासियों पर नहीं पड़ा क्योंकि गांव नदी के ऊपर पहाड़ की ढलान पर स्थित हैं। पहली रिपोर्ट ग्रामीणों द्वारा पहाड़ी पर खड़े होने और उनके फोन पर वीडियो शूट करने से आई। यह सूचना सोशल मीडिया पर तुरंत फैल गई, लेकिन इतनी तेजी से नहीं कि पानी, मिट्टी और मलबे से घिरने से पहले ऋषि गंगा और तपोवन पनबिजली परियोजनाओं की सुरंगों में काम करने वाले मजदूरों को निकाला जा सके।

दोनों पनबिजली परियोजनाएं रन-ऑफ-द-रिवर हैं, जिसका मतलब है कि नदी को सुरंग में बांधने के लिए एक बांध बनाया जाता है जो आठ से दस किलोमीटर लंबा हो सकता है, फिर टर्बाइनों को चलाने के लिए पानी को लंबवत गिराया जाता है जिससे बिजली पैदा होती है। इसके बाद फिर पानी को नदी में वापस ले जाया जाता है। वीडियो में देखने को मिला कि पानी के भयानक बहाव के कारण बांध और स्पिलवेज तबाह हो गये।

बाद में ऐसे वीडियो भी सामने आए जिसमें बचाव कर्मी सुरंगों में तोड़ते हुए दिखे ताकि अंदर फंसे श्रमिकों को बाहर निकाला जा सके। बांध बनाने वालों द्वारा उपयोग की जाने वाली सारी मशीनें नीचे की ओर बह गईं  और नदी के किनारे खड़ी ढलानों के नीचे और मशीनें प्राप्त करने की एक दर्दनाक धीमी प्रक्रिया का सामना करना पड़ा। वहां काफी संख्या में बचाव कर्मियों ने सुरंगों के छोर से कीचड़ और मलवा हटाने के लिए काम किया।