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कंक्रीट के लिए खोखली की जा रही एक नदी

एक छोटी हिमालयी नदी की दुर्दशा पूरे एशिया में गूँजती है, क्योंकि नदी के किनारे के अवैज्ञानिक खनन के कारण समुदायों की जान और माल की हानि होती है
<p>भारत के उत्तरी राज्य उत्तराखंड में गौला नदी से रेत, पत्थर और बजरी खनन करते श्रमिक (फोटो: मोनिका मंडल)</p>

भारत के उत्तरी राज्य उत्तराखंड में गौला नदी से रेत, पत्थर और बजरी खनन करते श्रमिक (फोटो: मोनिका मंडल)

एक छोटी हिमालयी नदी की दुर्दशा, पूरे एशिया में गूंज रही है। इस नदी के किनारों से ‘अवैज्ञानिक और अरक्षणीय’ खनन के कारण आसपास रहने वालों को जान-माल का नुकसान झेलना पड़ता है।

तारीख 19 अक्टूबर, 2021, समय सुबह के करीब 5 बजे, हिमालय की तलहटी में अंधेरा था, रिमझिम बारिश हो रही थी और काफी ठंड थी। उत्तराखंड में हल्द्वानी शहर के पास इंदिरापुरी गांव के एक किसान गोपाल दत्त शर्मा बताते हैं, “एक शोर ने मेरी पत्नी को जगा दिया। वह बाहर बरामदे में गईं और देखा कि उनके 1.6 हेक्टेयर गेहूं के खेत से सटे खेत रातों-रात गायब हो गए थे। देखते ही देखते शर्मा परिवार के खेत भी गौला नदी में समा गये।

उस दिन, शर्मा परिवार के साथ ही इंदिरापुरी के चार अन्य परिवारों ने भी अपने घरों को भी अचानक आई बाढ़ में खो दिया। हल्द्वानी में गौला पुल का एक हिस्सा उसी दिन गिर गया था। लगातार बेमौसम बारिश के बाद कई छोटे पुल ढह गए, जिससे उत्तर भारत के मैदानी इलाकों से पहाड़ों में नैनीताल शहर तक जाने वाला मुख्य मार्ग अवरुद्ध हो गया।

सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, 19 अक्टूबर, 2021 को आई बाढ़ ने खेतों और पुलों को बहा दिया। यह एक प्राकृतिक आपदा थी। पिछले पांच वर्षों में, उत्तराखंड में 37 से अधिक पुलों के ढहने की खबर है, और इससे अधिक गिरने के कगार पर हैं।

A house on the brink of collapse along the Gaula River, where riverbed mining has led to stronger and more destructive floods
गोपाल दत्त शर्मा का घर गौला नदी में गिरने की कगार पर। पूरे हिमालय की तलहटी में, कई लोगों ने अपने घरों को बाढ़ में खो दिया है। बाढ़ जैसी आपदाएं नदी के किनारे खनन से बढ़ रही हैं। (फोटो: मोनिका मंडल)

इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने 2012 में कहा था कि ग्लोबल वार्मिंग अनिश्चित वर्षा और बादल फटने का कारण बन रही है। यह बात इस क्षेत्र में 2021 के मानसून के मौसम के बाद अच्छी तरह से अनुभव की गई। बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और समुदायों को ऐसे जलवायु परिवर्तन प्रभावों के खिलाफ लोचशील बनाने में मदद करने के लिए बहुत कम प्रयास किये गये हैं। उत्तराखंड में और पूरे भारत में गौला व अन्य सैकड़ों नदियों में जो हो रहा है, वह लोचशील बनाने के विपरीत है। नदियों के किनारे इस तरह से खनन किया जा रहा है जिससे बाढ़ का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। गौला की स्थिति हिमालय की तलहटी और एशिया के बाहर की भी स्थिति को दर्शाती है।

गौला उन कई छोटी नदियों में से एक है, जो भारत में सबसे बड़ी नदी बेसिन, गंगा से जुड़ जाती हैं। गौला उत्तराखंड के मध्य पहाड़ों में शुरू होती है। यह व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण शहर हल्द्वानी के पास के मैदानों तक पहुंचती है और रामगंगा नदी में मिल जाती है, जो गंगा में बहने लगती है।

ग्राफिक: The Third Pole

गौला और अन्य नदियां मैदानी इलाकों में पहुंचने पर भारी मात्रा में पत्थर, कंक्रीट, बजरी और रेत जमा कर देती हैं जिसे वे पहाड़ों से नीचे लेकर आती हैं। नदी के किनारों का खनन किया जाता है। इन सामग्रियों का निर्माण उद्योग में इस्तेमाल होता है। इन्हें यहां से बिक्री के लिए ले जाया जाता है। कभी-कभी ऐसा करने वालों के पास लाइसेंस होता है; कभी-कभी वे अवैध रूप से ये काम करते हैं।

इन सारी सामग्रियों को हटाने का मतलब है कि नदी की पानी का प्रवाह तेज हो जाएगा, जो बाढ़ को और अधिक खतरनाक बना देता है। लेकिन ऐसे खनन पर आपत्ति खतरनाक हो सकती है। यहां तक कि नौकरशाहों और पत्रकारों पर कुछ हमले भी हो चुके हैं। राज्य सरकारें नदी तल खनन लाइसेंस जारी करती रहती हैं।

नदी के तल की लूट

गौला नदी पर्वतीय झरनों पर निर्भर है। अधिकांश वर्ष के लिए, वसंत पर निर्भर गौला में बहुत कम या कोई पानी नहीं होता है। नैनीताल स्थित पर्यावरण इतिहासकार शेखर पाठक कहते हैं, “ऐसी नदियां ज़्यादा पानी नहीं ले जातीं; फिर भी, बारिश होने पर मात्रा 800 से 1,000 गुना तक बढ़ सकती है। ” नतीजतन, हर मानसून में गौला नदी इन सामग्रियों को हल्द्वानी तक नदी के किनारे तक ले जाती है। इस तरह, बाकी साल, नदी के किनारे पर रेत, बजरी और पत्थरों को बाहर निकालने का काम चलता रहता है। फिर इसे खच्चरों, घोड़ों या ट्रकों पर लादा जाता है।

नदी तल की इन सामग्रियों के मौद्रिक मूल्य का एहसास तब हुआ जब दुनिया कंक्रीट निर्माण की ओर बढ़ी। पाठक कहते हैं, “जैसे-जैसे देश शहरीकरण की ओर बढ़ा, निर्माण गतिविधियों के लिए आरबीएम [नदी की सामग्री] की मांग में विस्फोट हुआ।” हल्द्वानी में गौला पुल, जो पिछले साल ढह गया था, उसकी मरम्मत कर दी गई है, और अब एक बार में कई वाहन इस पर चलते हैं।

A mule cart carrying material mined from the riverbed of the Gaula, Uttarakhand
गौला नदी के किनारे एक गड्ढे में इन सामग्रियों को खच्चर गाड़ी में डालते दो व्यक्ति। इस सामग्री को लगभग 5 किमी दूर स्थित एक व्यापारी के पास ले जाया जाएगा। (फोटो: मोनिका मंडल)

जनवरी 2022 के अंतिम सप्ताह में जब द् थर्ड पोल ने इस क्षेत्र का दौरा किया, तो पुल के ढहने वाली जगह से कुछ मीटर की दूरी पर नदी के किनारे खनन फिर से शुरू हो गया। कुछ ट्रक गड्ढों में गहरे खड़े थे, जबकि कुछ जमीन के स्तर पर थे। 10-12 लोगों का समूह, प्रत्येक ट्रक के पिछले हिस्से को घेरकर नदी के किनारे की सामग्रियों को वाहन में डालते हैं। खच्चर और घोड़े, कुछ खींचने वाली गाड़ियां, जमीन के स्तर पर या उसके पास रहती हैं।

एक मजदूर बताता है, “यह तो बस शुरुआत है। पिछले साल के खनन के गड्ढे बाढ़ के साथ आए मलबे से भर गए हैं। कुछ महीनों में लौटिए और आप फिर से बड़े-बड़े गड्ढों को देखेंगे।”

हल्द्वानी के हृदय, गौला की नब्ज किस तरह से बदल रही है

पाठक बताते हैं, “ये गड्ढे बाढ़ की वजह से हैं। जब भी खनन का काम अवैज्ञानिक तरीके से किया जाता है, तो गड्ढों और खाली जगहों को छोड़ दिया जाता है। ऐसे में नदी बहुत पानी ले जाने की स्थिति में अपना रास्ता बदल सकती है।” अक्टूबर 2021 में उत्तराखंड की बारिश ने रिकॉर्ड तोड़े। दो दिनों में 500 मिमी बारिश हुई। गौला ने रास्ता बदल लिया और हल्द्वानी के बगल में काठगोदाम स्टेशन पर रेलवे पटरियों को तबाह कर दिया। साथ ही, शर्मा परिवार जैसे कई लोगों के खेतों और घरों को भी चपेट में ले लिया।

उत्तराखंड वन विकास निगम (यूएफडीसी) राज्य सरकार की वैधानिक संस्था है जो राज्य वन उपज के वाणिज्यिक शोषण के लिए जिम्मेदार है, जिसमें गौला की नदी के किनारे शामिल हैं, और इसलिए नदी के किनारे खनन के लिए लाइसेंसिंग है। यूएफडीसी के क्षेत्रीय प्रबंधक के.एन. भारती ने  द् थर्ड पोल को बताया, “गौला पुल के ढहने का खनन से कोई लेना-देना नहीं था। यदि पुल के गिरने का एक कारण खनन भी था, तो नदियों पर बने सभी पुल अब तक ढह चुके होते।”

गौला पुल से कुछ किलोमीटर नीचे, जहां शर्मा परिवार का खेत नदी में समा गया, एक मजदूर सुभाष, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के कई अन्य प्रवासी मजदूरों के साथ रहते हैं। ये सभी नदी के किनारे पॉलिएस्टर के टेंट में रहते हैं। सुभाष, पिछले 15 वर्षों से इस स्थान पर गौला की नदी के तल की खुदाई कर रहे हैं। हर साल, कई अन्य मजदूरों की तरह, वह दीवाली (अक्टूबर या नवंबर में) के बाद हल्द्वानी आते हैं और जून में मानसून आने से पहले घर लौटते हैं।

यह पूछे जाने पर कि एक ट्रक को भरने में कितना समय लगता है, सुभाष कहते हैं, “यह किसी आदमी की ताकत पर निर्भर करता है। कभी-कभी हममें से 10-12 लोगों को एक ट्रक भरने में लगभग एक घंटा लग जाता है। कभी-कभी इसमें अधिक समय भी लग सकता है।” अपने द्वारा देखे गए परिवर्तनों के बारे में पूछे जाने पर, सुभाष जवाब देते हैं, “पहले कुछ मीटर तक खोदना बहुत आसान था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हम कुछ फीट से ज्यादा नहीं खोद सकते। इसके नीचे खुदाई करने पर हम अक्सर भूजल स्तर तक पहुंच जाते हैं। नदी न केवल गहरी,  बल्कि बहुत चौड़ी हो गई है।”

शर्मा परिवार के इंदिरापुरी के पड़ोसी भुवन द् थर्ड पोल को बताते हैं कि उन्होंने पिछले 15-20 वर्षों के दौरान गौला के स्तर में गिरावट को देखा है। वे कहते हैं, “पहले, नदी और हमारी जमीन एक ही स्तर पर थी, लेकिन जब लगभग 15-20 साल पहले खनन शुरू हुए, तो धीरे-धीरे और लगातार नदी का तल नीचे चला गया। अंत में यह लगभग 20 फीट गहरा हो गया।”

लेकिन यह निचला स्तर भी नदी के ऊपर और नीचे की ओर नदी के तल से अधिक है। शर्मा परिवार के घर के पास कुछ साल पहले खनन बंद कर दिया गया था। इसका मतलब था कि नदी के तल का एक छोटा हिस्सा बरकरार था जबकि ऊपर और नीचे गहरे गड्ढे थे। भुवन को लगता है कि इस अपेक्षाकृत ऊंची नदी तल ने इंदिरापुरी गांव में बाढ़ को बदतर बना दिया। उत्तराखंड सरकार ने अपनी “नदी प्रशिक्षण नीति” पेश करते समय उसी तर्क का इस्तेमाल किया कि तलकर्षण से बाढ़ कम होगी। लेकिन इसने काम नहीं किया।

विश्व संसाधन संस्थान के एक भू-स्थानिक विश्लेषक, राज भगत पलानीचामी ने उपग्रह चित्रों का उपयोग यह पता लगाने के लिए किया कि पिछले 20 वर्षों में गौला ने अपना मार्ग कैसे बदला है। वह बताते हैं, “नक्शे में नदी के किनारों के साथ छाया आपको बताती है कि इस अवधि में नदी की गहराई कैसे बढ़ी है, और आप देख सकते हैं कि नदी ने अपने पैटर्न को कैसे बदल दिया है।”

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की में पृथ्वी विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर प्रदीप श्रीवास्तव, द् थर्ड पोल को बताते हैं, “यह खराब खनन का मामला नहीं है; यह अत्यधिक खनन का मामला है।”

श्रीवास्तव बताते हैं, “नदी का प्राकृतिक व्यवहार, तलछट का परिवहन है। जब खनन द्वारा तलछट को हटा दिया जाता है, तो पानी को इसे ले जाने की आवश्यकता नहीं होती है, जिसका अर्थ है कि यह तेजी से आगे बढ़ता है और नदी के किनारे को काटता है। इसने ऐसी परिस्थितियां पैदा कीं, जिनमें शर्मा परिवार और उनके जैसे अन्य लोगों ने अपने खेतों को खो दिया।

श्रीवास्तव कहते हैं कि इससे क्षेत्र में भूजल स्तर भी प्रभावित होता है। जैसे-जैसे पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है, इसका कम हिस्सा भूमिगत पुनर्भरण के लिए रिसता है। श्रीवास्तव का कहना है कि “भूदृश्य और सतह प्रक्रियाओं की सावधानीपूर्वक जांच के बाद नदी के कुछ हिस्सों में रेत खनन की अनुमति दी जा सकती है। हिमालय एक ऐसा क्षेत्र है जो भारी मात्रा में तलछट पैदा करता है। ऐसी नदियां जो तलछट भंडारण के हॉटस्पॉट के रूप में कार्य करती हैं, वहां तकनीकी रूप से नियोजित तरीके से तलकर्षण किया जा सकता है। लेकिन उत्तराखंड में जो हो रहा है वह “अवैज्ञानिक और अरक्षणीय” है।

हालांकि, हल्द्वानी में स्थानीय व्यवसायों के लिए महत्वपूर्ण होने के साथ ही, गौला, राज्य सरकार को खनन के कारण मिलने वाले लाइसेंस शुल्क के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। नैनीताल जिले में 22 पंजीकृत स्टोन क्रशर में से 17 शहर के आसपास स्थित हैं। इसलिए नदी तल का खनन जारी है।

क्या कानूनी है, क्या नहीं है

मजदूर रोज सुबह 6 बजे नदी के किनारे काम शुरू करते हैं। इस संवाददाता ने जिन मजदूरों से बात की, उनमें से किसी को भी इस नियम के बारे में पता नहीं था, जो कहता है कि खुदाई की अनुमति केवल तीन मीटर की गहराई तक है। इससे गहरे की खुदाई को अवैध खनन माना जाएगा। एक मजदूर ने कहा, “हम 9-10 फीट तक खुदाई करते हैं, जो लगभग तीन मीटर है। एक अन्य ने बताया, “हम तब तक खुदाई करते हैं जब तक हम जल स्तर तक नहीं पहुंच जाते। इसका मतलब कितने भी गहरे तक खुदाई हो सकती है।” 2020 से पहले, खुदाई के लिए 1.5 मीटर की गहराई तक अनुमति दी गई थी। राज्य सरकार की कैबिनेट के एक निर्णय से इसे तीन मीटर तक बढ़ा दिया गया था।

एक एनजीओ, साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर एंड पीपल के एसोसिएट को-ऑर्डिनेटर भीम सिंह रावत कहते हैं, “नियमों को संशोधित करने से पहले कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया गया था।”

देहरादून में वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के सेवानिवृत्त वरिष्ठ वैज्ञानिक एस.के. बरतारिया ने 1980 के दशक में गौला का अध्ययन किया था। उन्होंने द् थर्ड पोल को बताया कि अध्ययन में पता चला था इस नदी का तेजी से क्षय हो रहा है। क्षय की दर इस क्षेत्र में किसी अन्य नदी से काफी ज्यादा है। यह क्षेत्र विवर्तनिक रूप से काफी सक्रिय है और नदी के तल पर तीन मीटर का एक समान निष्कर्षण खतरनाक हो सकता है। बरतरिया बताते हैं कि इस क्षेत्र के विशेषज्ञों के लिए, गिरावट एक ऐसा शब्द है, जिसमें वनों की कटाई, प्रदूषण, क्षरण और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट करने वाली अन्य प्रक्रियाएं शामिल हैं।

रेत व्यापार में माफिया मौजूद है, इस तथ्य को पहचानने में सरकार को पिछले साल तक का समय लगा
सुमैरा अब्दुलाली, एनजीओ आवाजी की संस्थापक

भारत के सर्वोच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करने वाले पर्यावरण वकील संजय उपाध्याय कहते हैं, “इन सामग्रियों के परिवहन के दौरान बहुत सारे अवैध खनन होते हैं।” भारत सरकार के सैंड माइनिंग फ्रेमवर्क का यह भी कहना है कि अवैध खनन के अधिकांश दर्ज मामले, वैध परमिट के बिना  परिवहन या अवैध परिवहन से संबंधित हैं।

उपाध्याय कहते हैं, शुरुआत में, “रेत का खनन, पुनःपूर्ति दर के भीतर होना चाहिए।” पुनःपूर्ति दर, वह दर है जिस पर एक नदी मानसून में तलछट नीचे लाती है, जिसे स्थायी रूप से निकाला जा सकता है।

उत्तराखंड में सबसे अधिक खनन की जाने वाली नदियों में से एक, गौला की पुनःपूर्ति दर क्या है? इसको लेकर सार्वजनिक तौर पर कोई अध्ययन नहीं है। इस बारे में पूछे जाने पर, यूएफडीसी की भारती का कहना है, “इस तरह के अध्ययनों को सार्वजनिक करने की कोई आवश्यकता नहीं है।”

केंद्र सरकार के नियम कहते हैं कि हर राज्य सरकार को यह बताना चाहिए कि वह हर साल कितने रेत का उत्पादन करती है। उत्तराखंड उन राज्यों में से एक है जो यह आंकड़ा नहीं बताता है। 2017 में, उत्तराखंड रेत की बिक्री से उत्तर भारत में सबसे अधिक राजस्व प्राप्त करने वाला राज्य था। केंद्र की सैंड माइनिंग फ्रेमवर्क रिपोर्ट कहती है कि वित्त वर्ष 2014-15 में उत्तराखंड में रेत की बिक्री से राजस्व 1.735 बिलियन रुपये (लगभग 2.3 करोड़ डॉलर) था। यह 2016-17 में लगभग दोगुना होकर 3.353 बिलियन रुपये हो गया। सबसे नवीनतम उपलब्ध आंकड़ा यही है।

भारत की पर्यावरण अदालत, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 2016 में गौला में नदी के किनारे खनन के खिलाफ एक याचिका स्वीकार की और जांच का आदेश दिया। जांच में गंभीर उल्लंघन पाए गए और यूएफडीसी को भारी जुर्माना भरना पड़ा। 2017 में तीन महीने के अंदर अवैध खनन के 32 मामले दर्ज किए गए। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने इस क्षेत्र में अस्थायी रूप से खनन पर प्रतिबंध लगा दिया है। अब, यूएफडीसी के भारती कहते हैं, “गौला नदी में संचालन ऐसा है कि क्षेत्र में अवैध खनन का कोई सवाल ही नहीं है। इस तरह का व्यवस्थित खनन देश में शायद ही कहीं [और] चल रहा हो।

समावेशी रेत खनन फ्रेमवर्क के लिए सरकार के 2018 के नियम “नियामक निकाय और संचालन की जिम्मेदारी संभालने वालों के बीच खनन और संबंधित पर्यावरणीय चिंताओं के तकनीकी पहलुओं में अंतर” को पहचानते हैं।

पूरे उत्तराखंड में, नदी तल खनन के खिलाफ विभिन्न अदालतों में याचिकाएं दायर की जाती हैं, लेकिन राज्य सरकार ने हमेशा इस तरह के खनन का बचाव किया है। अधिकारियों ने उन हिंदू साधुओं के खिलाफ भी कार्रवाई की है जो नदी के किनारे खनन और बांध निर्माण के खिलाफ भूख हड़ताल पर चले गए थे।

एनजीओ आवाज की संस्थापक और रेत खनन पर ध्यान केंद्रित करने वाली एक पर्यावरण कार्यकर्ता सुमैरा अब्दुलाली कहती हैं, “सरकार ने तो पिछले साल स्वीकार किया है कि देश में रेत व्यापार में एक माफिया मौजूद है। यह तब हुआ जब इतने सारे लोग मारे गए हैं। सरकारी अधिकारियों पर हमले हुए हैं। इसलिए इस तरह के अवैध खनन को नियंत्रित करना इतना मुश्किल है, ”

लाइसेंस प्राप्त और अवैध नदी तल खनन के बीच अंतर के बारे में पूछे जाने पर, अब्दुलाली कहती हैं, “कानूनी और अवैध मानव निर्मित शर्तें हैं, लेकिन क्या नियम नदी के किनारे को बचाने के उद्देश्य से काम कर रहे हैं? क्या यह [नदी में खनन] अल्पावधि में लोगों के लिए अच्छा है [क्योंकि यह उन्हें रोजगार देता है]? इसका जवाब हां है। लेकिन क्या यह सुनिश्चित करना सरकार का कर्तव्य नहीं है कि लोगों का जीवन और पर्यावरण खतरे में न पड़े?

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