प्रकृति

जलवायु परिवर्तन और सीमा तनाव से नष्ट होते पश्मीना बकरियों के ठौर-ठिकाने

जलवायु परिवर्तन के कारण चारागाह सिकुड़ते जा रहे हैं। ऐसे में पहले से ही अपने जानवरों के लिए चारे के संकट का सामना कर रहे लद्दाख के चरवाहों की समस्याएं भारत और चीन के बीच जारी सीमा पर तनाव से काफी ज्यादा बढ़ गई हैं।
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<p>अपने जानवरों के झुंड पर नजर रख रही हैं तेशरिंग [image by: Stanzin Dorjai Gya]</p>

अपने जानवरों के झुंड पर नजर रख रही हैं तेशरिंग [image by: Stanzin Dorjai Gya]

आकस्मिक ढंग से बर्फबारी और बारिश के चलते लद्दाख के पश्मीना बकरियों के चरवाहों का संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है। इसकी वजह से चारागाह सिमटते जा रहे हैं। चारागाहों की जगह भी बदलती जा रही है। इसके अलावा, भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव बढ़ने की वजह से चारागाह की उपलब्धता और भी कम हो गयी है। गया-मीरू की 57 वर्षीय महिला चरवाहा तेशरिंग की जिंदगी और दिनचर्या पहले ही काफी बदल चुकी है। गया-मीरू का अधिकांश क्षेत्र 3,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर है।  

2016 में, तेशरिंग अवॉर्ड जीतने वाली डॉक्यूमेंटरी “शेफर्ड्स ऑफ द् ग्लेशियर” का हिस्सा थीं। उस समय उनके पास 330 भेड़ें और पश्मीना बकरियां थीं। तब से, उनके झुंड में जानवरों की संख्या में लगातार कमी आयी है। इसका कारण घास में कमी और घटते जल संसाधन हैं। ग्लेशियर्स भी सिकुड़ रहे हैं। लद्दाख का सबसे बड़ा ग्लेशियर द्रांग द्रुंग है, जो 1971 से 2017 तक 13.84 फीसदी तक घट गया है।

The shepherds and their flocks are critically dependent on dwindling water sources [image by: Stanzin Dorjai Gya]
चरवाहे और उनके जानवर पूरी तरह से जल स्रोतों पर निर्भर हैं [image by: Stanzin Dorjai Gya]

तेशरिंग ने अपनी 13 साल के उम्र से लेकर पिछले चार दशक में अपने चारों ओर की घाटियों को तबाही वाले बदलाव के रूप में देखा है। वह कहती हैं कि जब मैं युवा थी, उस समय घाटियों में चारागाह और जल स्रोत प्रचुर मात्रा में थे। अब हम धीरे-धीरे दोनों नष्ट किये जा रहे हैं। 

तेशरिंग की विस्तृत जानकारी का आधार जानवरों के झुंड के साथ 6,000 मीटर ऊंचाई पर चहलकदमी से है। वह कहती हैं कि जलवायु परिवर्तन का सबसे दिखाई पड़ने वाला बदलाव यह है कि जल स्रोत सूख रहे हैं क्योंकि पहले की तुलना में कम वर्षा हो रही है।  

स्नो लेपर्ड कंजर्वेंसी इंडिया ट्रस्ट के निदेशक और वरिष्ठ वैज्ञानिक त्सेवांग नामगेल कहते हैं कि लद्दाख में जीवन बर्फ के ऊपर ही निर्भर है। इस क्षेत्र में पानी बर्फ के पिघलने से मिलता है। इसी से खेतों और चारागाहों को पानी उपलब्ध होता है। बर्फ से बनने वाले ग्लेशियर्स उन जल स्रोतों को पानी उपलब्ध कराते हैं जो छोटी-छोटी बस्तियों की जीवन रेखा हैं।

नामगेल कहते हैं, “दूसरी ओर, गर्मियों में असामान्य रूप से भारी वर्षा लद्दाख की एक नई सच्चाई है, लेकिन इससे इस क्षेत्र को फायदा नहीं हो  रहा है। इससे यहां का जल स्तर समृद्ध नहीं हो रहा है। लद्दाख के चट्टानी इलाके बारिश के पानी को संभाल नहीं पाते हैं। यह पानी बाढ़ के चलते नीचे चला जाता है।”

Wool from their goats are the wealth of the shepherds in Ladakh [image by: Stanzin Dorjai Gya]
पश्मीना बकरियों से मिलने वाला ऊन लद्दाख के चरवाहों के लिए संपत्ति है। [image by: Stanzin Dorjai Gya]

2005 के बाद से लद्दाख ने आठ बाढ़ें देखी हैं।  अगस्त 2014 में, एक ग्लेशियर वाली झील में बाढ़ आने से तेशरिंग का गया गांव बह गया था। घर, पुल, खेत इत्यादि सब तबाह हो गये थे। 

अगस्त 2010 में आई घातक बाढ़ से लद्दाख की राजधानी, लेह सहित 70 से अधिक गांवों और कस्बों में भारी तबाही हुई थी। इसमें 255 लोगों की मौत हो गई थी। बादल फटने से आई बाढ़ में 350 मिलीमीटर पानी गिरा जो सालाना होने वाली बारिश का तीन गुना है।

इस बीच, बर्फबारी में बहुत तेजी से गिरावट आई है। ग्लेशियरों को फिर से भरने में समस्या देखी जा सकती है। यहां तक कि जलवायु परिवर्तन से बचाव के लिए गांवों के पास बर्फ को जमा करने के लिए बनाए गए कृत्रिम ग्लेशियर भी पिघल रहे हैं। इस अनुकूलन तकनीक का नेतृत्व करने वाले सिविल इंजीनियर चेवांग नोरफेल ने कहा कि उनके 15 कृत्रिम ग्लेशियरों में से केवल पांच जीवित हैं। नॉरफेल कहते हैं, “इसका कारण कम ऊंचाई पर बर्फ में कमी है।”

कुछ गांवों से लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा है क्योंकि अब उनके गांव में बारिश इतनी ज्यादा कम होने लगी है कि वे फसलें भी नहीं उगा सकते।

लेह से 50 किलोमीटर दक्षिण में कुलम, लद्दाख के छह ऐसे गांवों में से एक है।  2012 में, कुलुम का मुख्य जलस्रोत सूख गया। इसकी वजह से यहां के   11 परिवारों के पास घर छोड़कर दूसरी जगह जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

The flocks range tremendous distances in the cold desert of Ladakh [image by: Stanzin Dorjai Gya]
लद्दाख के ठंडे रेगिस्तान में जानवरों के झुंड [image by: Stanzin Dorjai Gya]

जन्सकार क्षेत्र के पीशू में ग्रामीण भी पलायन कर रहे हैं।  2018 में, पानी की कमी के चलते उनकी फसलें नहीं उग पाईं। जम्मू-कश्मीर की तत्कालीन राज्य सरकार, जिसमें लद्दाख एक हिस्सा था, ने प्रत्येक परिवार को 1000 रुपये (लगभग 14 अमेरिकी डॉलर) की सहायता की पेशकश की थी, जिसे सबने अस्वीकार कर दिया क्योंकि यह रकम किसी की मदद के लिहाज से बहुत कम थी।

जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख में हाल ही में एक क्षेत्रवार अध्ययन से पता चला है कि ग्लेशियर द्रव्यमान में तकरीबन 70.32 गीगाटन की कमी आई है। यह अध्ययन बेहद ऊंचाई वाले सीमावर्ती क्षेत्रों में किया गया है क्योंकि ऐसे क्षेत्र बर्फबारी और ग्लेशियरों के निर्माण के मामले में बहुत महत्वपूर्ण हैं। इस अध्ययन में भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा (एलओसी) और भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के दोनों तरफ से क्षेत्रों को भी शामिल गया है। 

कश्मीर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने मोटाई के लिए 12,243 ग्लेशियरों का अध्ययन किया। इसमें उपग्रह अवलोकनों के दो सेटों का उपयोग किया गया जो 2000 में नासा द्वारा और 2012 में जर्मन अंतरिक्ष एजेंसी डीएलआर द्वारा बनाये गये थे। इस अनुसंधान दल का नेतृत्व करने वाले शकील रामशू का कहना है कि ग्लेशियरों के नष्ट होने का दूरगामी परिणाम है। निश्चित रूप से लद्दाख के घास के मैदानों की गुणवत्ता में गिरावट आई है। तेशरिंग जैसी बुजुर्ग महिलाओं को सूखे और बहुत तुच्छ चारागाहों की वजह मजबूरी में लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, ज्यादा ऊंचाई पर जाना पड़ता है ताकि वह अपने जानवरों के झुंड के लिए भोजन की व्यवस्था कर सकें। जानवरों को चराने के मामले में वह सदियों से चली आ रही व्यवस्था का अब तक पालन करती आ रहीं थी जिसमें साल की शुरुआत में विंटर वैली (या गुनलुंग) में चारे का इंतजाम हो जाता था और फिर गर्मियों वाले चारागाह (या यारलुंग) की तरफ रुख कर लेती थीं। 

तेशरिंग कहती हैं कि अब बर्फ ज्यादा ऊंचाई पर है, तो नमी भी ज्यादा ऊंचाई पर ही रहेगी। ऐसे में हरियाली भी ज्यादा ऊंचाई पर होना स्वाभाविक है। इस वजह से उनको अपने घर से कई बार 20 से 40 किमी तक का सफर करना पड़ता है। 

There is little pasture land left for the goats in Ladakh [image by: Stanzin Dorjai Gya]
लद्दाख में पश्मीना बकरियों के लिए थोड़ी चरागाह भूमि बची है [image by: Stanzin Dorjai Gya]

गया, लेह-मनाली हाई-वे पर सिंधु नदी घाटी और तांगलांग ला दर्रे के बीच, 140 घरों और लगभग 668 आबादी वाला (2011 की जनगणना के अनुसार) एक बेहद ऊंचाई पर बसा एक गांव है। 

मिरू थोड़ा छोटा है। यहां की आबादी करीब 500 है। ये दोनों गांव अपने प्राचीन ग्रामीण जीवन के लिए जाने जाते हैं, जिनकी वजह से यहां पर्यटक भी आते हैं और गांव वालों को पर्यटन से आय होती है। लेकिन अब ख़ानाबदोश परिवारों की संख्या में भी लगातार कमी आती जा रही है। 

परिवार और जानवर खतरे में हैं

बदलती जलवायु से लोगों के जानवरों के झुंड को खतरा पैदा हो गया है और इसके साथ ही उनका पर्यटन राजस्व भी प्रभावित हो रहा है। खानाबदोश परिवारों की संख्या गिर रही है। स्थानीय पशुपालन अधिकारी टुंडुप बबू के अनुसार, गया-मिरू में 2018 में 18 परिवार थे जो 2020 में कम होकर 13 रह गये।

बबू, गया और मिरू के स्थानीय पशुधन आंकड़े को रखते हुए कहते हैं कि स्थानीय स्तर पर जानवरों के झुंड में इजाफा हुआ है। साल 2011 में 1,380 भेड़ें और 3,951 पश्मीना बकरियां थीं, जो बढ़कर 2020 में 1821 भेड़ें और 4,905 पश्मीना बकरियां हो गईं। हालांकि, कुल पशुधन की संख्या लद्दाख के चांगथांग क्षेत्र में घट गई है। लेह के जिला पशुपालन अधिकारी मोहम्मद अब्बास ने कहा कि चांगथांग क्षेत्र में लगभग 320,000 भेड़ें और बकरियां हैं, जिनमें से 220,000 पश्मीना बकरियां हैं। लेकिन अब्बास के अनुसार, एक दशक पहले उनके कार्यालय दर्ज जानवरों की संख्या की तुलना में इसमें तकरीबन 5 लाख जानवरों की संख्या कम हो गई है। सबसे ज्यादा कमी पश्मीना बकरियों की संख्या में आई है।

पश्मीना, जिसे चांगथंगी बकरियों के रूप में भी जाना जाता है, इस क्षेत्र के लिए अद्वितीय हैं। इनसे निकाले जाने वाले ऊन पूरी दुनिया में सबसे बेशकीमती हैं। इस क्षेत्र में बनने वाले खूबसूरत शॉल यहां की पहचान हैं। हालांकि कुछ ही शॉल 100 फीसदी पश्मीना ऊन से बनते हैं। ये अब और भी दुर्लभ होते जा रहे हैं क्योंकि बकरियों के लिए चरने वाले मैदान गायब होते जा रहे हैं।

अब्बास ने कहा कि एक ही समय अवधि में यहां परिवारों की संख्या 2,600 से गिरकर 2,000 हो गई है। वह कहते हैं, “कम बर्फबारी से नमी में कमी हो जाती है जिससे घास की वृद्धि प्रभावित होती है। इससे घास के मैदान कम होते जा रहे हैं और जानवरों के लिए चारा न होने की वजह से जानवरों की संख्या में कमी होती जा रही है।”

सीमा पर तनाव

वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के साथ चल रहे सैन्य गतिरोध ने चांगथांग में चरवाहा परिवारों के लिए चारागाह की कमी की समस्या को और बढ़ा दिया है। 3,400 किलोमीटर की डिमार्केशन लाइन दरबोक प्रशासनिक उप-जिले से होकर गुजरती है। हाल की तनावपूर्ण घटनाओं ने मेरक, फोब्रंग, लुकुंग और चुशुल गांवों में खानाबदोशों को बुरी तरह प्रभावित किया है।

भारत और चीन के बीच 1962 के युद्ध के दौरान सीजफायर लाइन बिना किसी शांति संधि के बना दी गई। जून 2020 में दशकों में पहली बार लड़ाई हुई, जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए और मारे गये चीनी सैनिकों की संख्या का खुलासा नहीं हो पाया है। इसके बाद दोनों पक्षों ने इस लाइन पर अपना जमावड़ा बढ़ा दिया, इससे चरवाहों का आना-जाना असंभव हो गया। दोनों देशों के बीच सबसे हालिया झड़पें जनवरी में पूर्वी हिमालय के सिक्किम प्रांत में LAC पर हुईं।

चुशुल के पार्षद कोंचोक स्टैनज़िन ने कहा, “हमने चीन के कारण सर्दियों के चारागाह खो दिए। सीमा से लगे सर्दियों वाले चारागाह क्षेत्र हमारी पहुंच से बाहर हैं। हम गर्मियों के चारागाहों में अपने झुंड को नहीं ले जा सकते क्योंकि वे भारी बर्फ के नीचे हैं।”

बहुमूल्य ऊन

क्षेत्र में पश्मीना बकरियों की घटती संख्या से चिंतित, सरकार ने चरवाहों को प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया है। पश्मीना बकरियां पालने के इच्छुक किसानों को सरकार की तरफ से 20 बकरियां मुफ्त दी जा रही हैं। अब्बास ने बताया कि हमने अब तक चांगथांग में लगभग 400 इकाइयां स्थापित की हैं। बकरी का क्लोन बनाने की कोशिश की गई है। लेकिन अगर निवास स्थान ही नहीं रह गया, तो इसमें से कुछ भी मायने नहीं रखता है।

चारागाह में कमी से जानवरों की संख्या में वृद्धि को बनाए रखना मुश्किल हो गया है। पशु अधिकारियों का कहना है कि एक क्षेत्र जहां चारागाहों पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा है वह कोरज़ोक क्षेत्र है। 15,000 फीट (4,572 मीटर) की ऊंचाई पर, कोरज़ोक को दुनिया की सबसे ऊंची स्थायी बस्ती माना जाता है। गया में, तेशरिंग अपने तरीके से अपना जीवन जीने पर दृढ़ हैं जबकि उनके आसपास की प्राकृतिक घाटियां धीरे-धीरे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण दम तोड़ रही हैं। तेशरिंग को उम्मीद है कि भारी बर्फबारी की वापसी होगी और घास के मैदान फिर से पनपेंगे। तेशरिंग कहती हैं कि मैंने अपने जानवरों की संख्या में कटौती की है। जब तक चारागाह सिकुड़ते रहेंगे, तब तक हमें जानवरों की संख्या में कटौती के लिए मजबूर रहना पड़ेगा।