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नेपाल के सबसे गरीब क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा है खाद्य संकट

पश्चिमी नेपाल में जलवायु आपदाओं की वजह से निर्वाह कृषि पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। नेपाल का ये क्षेत्र पहले से ही कुपोषण का शिकार है। वहां शिशु मृत्यु दर भी अधिक है और अब खाद्य संकट भी एक बड़ी समस्या बन कर खड़ी है।
<p><span style="font-weight: 400;">पश्चिमी नेपाल के मुक्तिकोट गांव में अपने बच्चों के साथ खड़ी कुछ महिलाएं। इस गांव की अधिकांश महिलाएं 3 से 10 बच्चों को जन्म देती हैं जिनमें से कई बच्चे कुपोषित हैं। </span><i><span style="font-weight: 400;">(फोटो: सृष्टि काफ्ले)</span></i></p>

पश्चिमी नेपाल के मुक्तिकोट गांव में अपने बच्चों के साथ खड़ी कुछ महिलाएं। इस गांव की अधिकांश महिलाएं 3 से 10 बच्चों को जन्म देती हैं जिनमें से कई बच्चे कुपोषित हैं। (फोटो: सृष्टि काफ्ले)

खुशी विश्वकर्मा अपनी तीन साल की बेटी को दुलार करती हैं। बच्ची का वज़न कम है और वो बेहद कमज़ोर लग रही है। यह बच्ची पश्चिमी नेपाल के बाजुरा जिले के मुक्तिकोट गांव से हैं। वहां रह रहे अपनी उम्र के अन्य बच्चों की तरह अभी वह स्पष्ट रूप से बोल नहीं सकती। वह किसी तरह की शारीरिक गतिविधि भी नहीं कर सकती। इस साल मार्च में द् थर्ड पोल से बात करते हुए खुशी ने बताया कि उनकी बेटी कुपोषित है। 

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मुक्तिकोट गांव में अपनी तीन साल की बेटी के साथ खुशी विश्वकर्मा (फोटो: सृष्टि काफ्ले)

खुशी खुद बहुत कमज़ोर हैं। कुछ हफ्ते पहले उनके आठ महीने के सबसे छोटे बच्चे की मौत हो गई थी। 

वह कहती हैं, “मैं अपने नवजात शिशु को ठीक से दूध नहीं पिला पाती थी क्योंकि मेरे पास खुद खाने के लिए भोजन उपलब्ध नहीं था। वह कुछ दिनों से बीमार था और फ़िर उसकी मृत्यु हो गई। मैंने कुल 13 बच्चों को जन्म दिया है। अब केवल आठ ही जीवित हैं।” खुशी अपनी सही उम्र नहीं जानती, लेकिन वह 40 की लगती हैं।

खुशी के पति पड़ोसी देश भारत में मजदूरी करते हैं। वो साल के 7 से 12 महीने वहीं रहते हैं। उनके दो बच्चों की शादी हो चुकी है। खुशी अपने बाकी छह बच्चों की देखभाल करती हैं। वह बताती हैं, “मेरे पति भारत से लौटने पर 10,000-20,000 नेपाली रुपये लाते हैं। इससे पूरे परिवार के लिए, एक साल तक के भोजन और कपड़ों का इंतजाम किया जाता है।”

मुक्तिकोट में 400 घरों की एक दलित बस्ती की यह एक आम कहानी है। जब द् थर्ड पोल के लिए इस संवाददाता ने क्षेत्र का दौरा किया तो ऐसा लगा कि पूरे गांव में केवल महिलाएं और कुपोषित बच्चे ही हैं। यहां के पुरुष रोजी-रोटी की तलाश में भारत चले जाते हैं।

दलित कौन हैं?

दलित समुदाय को पहले “अछूत” कहा जाता था लेकिन अब इस शब्द का इस्तेमाल नहीं होता है। दलित समुदाय वे हैं जिन्हें जाति व्यवस्था के अंतर्गत सबसे निचले स्तर पर रखा जाता है और उनसे अपमानजनक काम करवाया जाता रहा है। हालांकि ये प्रथाएं अब कानूनी नहीं हैं लेकिन सामाजिक बहिष्कार का दीर्घकालिक प्रभाव बना हुआ है। नवंबर-दिसंबर 2021 में नेपाल का दौरा करने के बाद, अत्यधिक गरीबी और मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत ने कहा: “भेदभाव एकमात्र सबसे महत्वपूर्ण कारक है जो यह बताता है कि दलित गरीबी से असमान रूप से प्रभावित क्यों हैं: लगभग 42 फीसदी दलित गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं। गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों में पहाड़ी दलितों का प्रतिशत 43.6 और तराई दलितों का प्रतिशत 38.2 है। राष्ट्रीय गरीबी दर 25.2 फीसदी है।”

गरीबी और हाशिए पर रहने के अलावा भी हैं अन्य दिक्कतें

बाजुरा ज़िले में कुपोषण पर विश्वसनीय और नए आंकड़ों की कमी है। लेकिन दिसंबर 2021 और इस साल अप्रैल की शुरुआत के बीच स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने बाजुरा में 800 से अधिक बच्चों को कुपोषित का मोहर लगाया है। ज़िला स्वास्थ्य कार्यालय ने पुष्टि की है कि ज़िले में कुपोषण का स्तर पूरे नेपाल के औसत से अधिक है (नेपाल में 36 फीसदी बच्चों की वृद्धि कम है)। ज़िला स्वास्थ्य कार्यालय द्वारा 2019 में किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि स्वामी कार्तिक खापर नगरपालिका में कुपोषित बच्चों की संख्या सबसे अधिक थी। इसी नगरपालिका में मुक्तिकोट स्थित है।

पश्चिमी नेपाल लगातार गरीबी, बुनियादी ढांचे में कम निवेश और जाति-आधारित भेदभाव की घटनाओं से घिरा हुआ है। जलवायु परिवर्तन इन समस्याओं में से कई को बढ़ा रहा है। सूखा और बाढ़ जैसी समस्याओं के अलावा झरनों के सूखने की वजह से निर्वाह कृषि पर पड़ने वाला नकारात्मक प्रभाव भी चिंता का विषय है। 

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बाजुरा के कोलती गांव में पीने का पानी लेने के लिए अपनी बारी का इंतजार करती छात्राएं। हर साल पीने का पानी, महीनों के लिए दुर्लभ हो जाता है, जब एकमात्र झरना सूख जाता है। (फोटो: सृष्टि काफ्ले)

अक्सर महिलाओं और बच्चों को इन समस्याओं का सामना करना पड़ता है। चिरंजीवी शाही, स्वामी कार्तिक खापर नगरपालिका के अध्यक्ष हैं, वह द् थर्ड पोल को बताते हैं कि उच्च प्रजनन दरकी वजह से संकट बढ़ गया है। मुक्तिकोट में महिलाओं के 10-10 बच्चे हैं, जिनमें से दो से तीन शिशुओं की मृत्यु हो जाती है।

वैसे, नेपाल की कुल प्रजनन दर में कमी आई है। यह 2000 में 3.955 थी जो गिरकर 2020 में 1.845 हो गई है। लेकिन पश्चिमी नेपाल में ये बदलाव नजर नहीं आ रहे हैं। इस क्षेत्र में शिशु मृत्यु दर (जीवित जन्मे 1000 बच्चों में से प्रति वर्ष, एक वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु की संख्या) में भी कमी नहीं आई है। शाही के आंकड़ों के मुताबिक इस क्षेत्र में प्रत्येक 10 जन्मे शिशुओं में दो की मृत्यु एक साल से कम उम्र में ही हो जाती है। इसका मतलब शिशु मृत्यु दर 200 है। यह नेपाल के राष्ट्रीय औसत 25 से आठ गुना ज़्यादा है।

जलवायु परिवर्तन ने पश्चिमी नेपाल में कृषि को किया प्रभावित

नेपाल स्वास्थ्य अनुसंधान परिषद के सरकारी संस्थान के मुख्य शोध अधिकारी मेघनाथ धीमाल कहते हैं: “सुदूर पश्चिमी नेपाल में जलवायु परिस्थितियों के कारण हाशिए पर रहने वाली आबादी के बीच कुपोषण अधिक है। हम स्थिति से वाक़िफ़ हैं, लेकिन दुर्भाग्य से हम इस विषय पर कोई शोध नहीं कर पाए हैं।”

शोधकर्ताओं का कहना है कि साल 1975 और 2010 के बीच, पश्चिमी नेपाल वैश्विक औसत से दोगुना ज़्यादा गर्म हुआ है। करनाली नदी बेसिन में औसत वर्षा 1981 और 2012 के बीच एक वर्ष में लगभग 5 मिलीमीटर कम हो गई थी। इन परिवर्तनों का मतलब है कि 2016 में अत्यधिक सूखे के साथ, यह क्षेत्र विशेष रूप से जलवायु आपदाओं की चपेट में है।

नेपाल सरकार के 2021 के जोखिम और अतिसंवेदनशीलता के आकलन ने बाजुरा को दूसरे सबसे कमज़ोर ज़िले के रूप में स्थान दिया। इस सूची में उत्तर-पश्चिम में हुमला, सबसे कमज़ोर ज़िला था। अतिसंवेदनशीलता को “हानि के प्रति संवेदनशीलता या उस हानि का सामना करने में असमर्थ होना या अनुकूलन करने की क्षमता की कमी” के रूप में परिभाषित किया गया था। 

“यह कई पहलुओं से प्रभावित हो सकता है जैसे: जनसांख्यिकीय, सामाजिक आर्थिक, पारिस्थिति से जुड़ी, भौतिक और भूवैज्ञानिक कारण। साथ-साथ यह संसाधनों और बुनियादी ढांचे की स्थिति और परिस्थिति से भी प्रभावित होता है। 2021 ज़िला आपदा तैयारी और प्रतिक्रिया (डीडीपीआर) रिपोर्ट में कहा गया है कि बाजुरा, अप्रत्याशित मानसून वर्षा पैटर्न के साथ वर्ष के आठ महीने सूखा झेलता है। 

स्वामी कार्तिक खापर नगरपालिका के अध्यक्ष शाही कहते हैं, “हमारे पास एक जटिल भूगोल है और उपजाऊ भूमि की कमी है। इसके अलावा, पिछले सात से आठ वर्षों से सूखा पड़ रहा है, वर्षा अनियमित है और भूदृश्य ऐसा है जहां सिंचाई सुविधाओं की व्यवस्था मुश्किल है। खाद्य संकट गंभीर है।”

बाजुरा में कृषि ज्ञान केंद्र (कृषि और पशुधन विकास मंत्रालय का हिस्सा) के एक अधिकारी द् थर्ड पोल को बताते हैं कि पिछले पांच वर्षों में, बूढ़ीगंगा, वौली, मालागढ़ और दंसंगु नदियों की बाढ़ के कारण बाजुरा जिले में 200 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि बह गई है। कृषि ज्ञान केंद्र के एक अधिकारी मिन प्रसाद जायसी ने द् थर्ड पोल को बताया कि केंद्र की गणना के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में फसल उत्पादन (जिसमें ज्यादातर सरसों, सोयाबीन, चावल और दाल शामिल हैं) में 15-20 फीसदी की गिरावट आई है।

“केवल 12.23 फीसदी भूमि [बजुरा में] खेती योग्य है।”

डीडीपीआर की रिपोर्ट में कहा गया है कि बाजुरा में केवल 4 फीसदी परिवार अपने लिए पर्याप्त भोजन का उत्पादन करते हैं। लगभग 40 फीसदी लोग केवल उतना ही उत्पादन कर पाते हैं जिससे वे तीन महीने तक अपने परिवार का पेट भर सकें। 

शाही कहते हैं, “हम स्थानीय संसाधनों और बजट से प्रबंधन करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। अब तक, हमने जलवायु परिवर्तन पर केंद्रित केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया है।”

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पश्चिमी नेपाल में तापमान में वृद्धि जारी रहेगी। साथ ही, जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा भी होगी। लगातार और तीव्र सूखा व बाढ़, मौजूदा वर्षा आधारित कृषि प्रथाओं को और चुनौती देंगे।

गांवों के जल स्रोत सूखे पड़ चुके हैं

मुक्तिकोट के पास रूधि गांव में लोग द् थर्ड पोल को बताते हैं कि वे दो साल पहले हुए भूस्खलन के बाद से अभी तक संघर्ष कर रहे हैं। उस आपदा ने एक झरने को बाधित कर दिया जो लगभग 160 घरों का एकमात्र जल स्रोत था।

रूधि की रहने वाली रत्ना धामी कहती हैं, ‘पीने के पानी के लिए हम मजबूर होकर चिंदे नदी पर निर्भर हैं, जो एक घंटे की दूरी पर है।

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एक रास्ता जो बाजुरा जिले के मुक्तिकोट गांव की ओर जाता है। यह क्षेत्र भूस्खलन और सूखे की चपेट में है। (फोटो: सृष्टि काफ्ले)

ग्रामीणों का कहना है कि पानी की कमी के कारण उन्होंने मवेशी पालना बंद कर दिया है। धामी कहती हैं, “हम ज्यादातर गेहूं, जौ और अनाज उपजाते हैं, लेकिन सिंचाई बाधित हो गई है। हमें मानसून की बारिश पर निर्भर रहना पड़ता है, जो पिछले कुछ वर्षों से नियमित नहीं है। चावल के लिए धान की रोपाई हम पहले ही रोक चुके हैं।”

वह निराश होकर कहती हैं, “हम मौजूदा परिस्थितियों में लंबे समय तक गुजारा नहीं कर पाएंगे। हमारे पास पलायन के लिए पैसे भी नहीं है। एकमात्र विकल्प यह है कि या तो सरकार पानी की व्यवस्था करे, या पूरी बस्ती को दूसरी जगह स्थानांतरित कर दे।” उनके पड़ोसी भी इस बात से सहमत हैं। ज़िले के कई अन्य गांवों की भी यही कहानी है।

2018-19 में स्वामी कार्तिक खापर नगर पालिका ने निचले क्षेत्रों में सिंचाई नहरों का निर्माण किया, लेकिन इससे रूढ़ी जैसी बस्तियों को मदद नहीं मिली जो करनाली नदी से सैकड़ों मीटर ऊपर हैं। नगर पालिका के शाही कहते हैं, “लिफ्ट सिंचाई प्रणाली से स्थितियां सुधर सकती हैं लेकिन यह हमारी क्षमता से परे है। प्रांतीय और संघीय सरकार से सहयोग की आवश्यकता है।” उन्होंने घरों को फिर से बसाने का प्रस्ताव दिया है, लेकिन अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है।

सहायता, अनुकूलन और ज़रुरी संवाद

कोलती गांव जैसे कुछ ऐसे भी स्थान हैं, जहां गर्भवती महिलाओं और युवा माताओं के लिए सलाह और सहायता उपलब्ध है। कोलती प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में अपनी बारी का इंतजार कर रही 30 वर्षीय शोभा रोकाया से द् थर्ड पोल ने बात की। रोकाया की शादी 15 साल की उम्र में हुई थी और 10 साल में उन्होंने सात बच्चों को जन्म दिया। इनमें से दो की मृत्यु एक साल से कम की उम्र में ही हो गई। वह कोलती प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में रेडी-टू-यूज फोर्टिफाइड आटे के लिए आती हैं।

वह बताती हैं, “अपनी आठ महीने की बेटी के लिए मुफ्त पौष्टिक आटा लेने के लिए मैं आज सुबह तीन घंटे चली। वह कुपोषित है और उसका वजन केवल 5 किलोग्राम है ”

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कोलती गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में, अपने बच्चों के साथ महिलाएं अपनी बारी का इंतजार करती हैं। अपने बच्चों के लिए मुफ्त पौष्टिक आटा लेने के लिए, महिलाएं महीने में एक बार, चार घंटे तक पैदल चलती हैं।(फोटो: सृष्टि काफ्ले)

अन्य क्षेत्रों में, ग्रामीण, बदलती जलवायु के अनुकूल फसलें उगा रहे हैं। बाजुरा में बुधिनंदा नगर पालिका के महापौर पदम कुमार गिरी ने द् थर्ड पोल को बताया कि शुष्क ऊंचे इलाकों में, किसानों ने चावल के बजाय सोयाबीन, दालें और जैतून के पेड़ उगाने शुरू कर दिये हैं।

कृषि ज्ञान केंद्र के अधिकारी मिन प्रसाद जायसी का कहना है कि केंद्र ने कृत्रिम तालाब बनाए हैं और जिले भर के ग्रामीणों को बीज वितरित किए हैं। वह कहते हैं, “पहाड़ी इलाकों में सेब के पेड़ों की जगह, केले और नींबू के पेड़ ले रहे हैं।”

नेपाल में भोजन के अधिकार को वास्तविकता बनाने के लिए विकास संबंधी दान करने वाले और मानवाधिकार संगठन भी काम कर रहे हैं। वालेंटियरी सर्विस ओवरसीज ने द् थर्ड पोल को बताया कि चार प्रांतों में इसके स्वयंसेवकों ने कार्यशालाओं और नीति संवादों के माध्यम से खाद्य और खाद्य संप्रभुता अधिनियम 2018 के स्थानीय संस्करणों का मसौदा तैयार करने में मदद की है।

फूड-फर्स्ट इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन नेटवर्क (एफआईएएन) नेपाल, सुदूर-पश्चिम और करनाली क्षेत्र में खाद्य संकट और कुपोषण के संबंध में पक्ष समर्थन और कानूनी विश्लेषण कर रहा है।

एफआईएएन, नेपाल के बिनोद प्रसाद पांडे कहते हैं, “भोजन एक मौलिक मानव अधिकार है। इसलिए राज्य को इस अधिकार की रक्षा करनी चाहिए। इस अधिकार का सम्मान करना चाहिए और इसको पूरा करना चाहिए। लोगों के भोजन का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए हम स्थानीय, प्रांतीय और संघीय सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

ओमैर अहमद और नैटली टेलर के अतिरिक्त इनपुट के साथ

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