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किसानों के विरोध प्रदर्शन के बीच भारत को तत्काल अपने जल संकट से निपटना चाहिए

भारत के किसान उस ऐतिहासिक मूल्य निर्धारण तंत्र को कानूनी रूप देने पर ज़ोर दे रहे हैं, जिसने देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की है। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि किसानों को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उनके समाधान के लिए इससे ज्यादा कुछ करने की ज़रूरत है।
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<p>विभिन्न किसान संघ अपनी आजीविका की गारंटी के लिए अपनी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को वैध बनाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। (फोटो: अलामी / एपी फोटो / अल्ताफ़ क़ादरी )</p>

विभिन्न किसान संघ अपनी आजीविका की गारंटी के लिए अपनी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को वैध बनाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। (फोटो: अलामी / एपी फोटो / अल्ताफ़ क़ादरी )

तीन साल पहले सिविल सोसाइटी की तरफ से दुनिया में सबसे बड़े शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को अंजाम दिया गया था। तीन साल बाद एक बार फिर, भारत के किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। यह याद रखा जाना चाहिए कि देश की आज़ादी के पहले दशक में भी कृषि संकट एक महत्वपूर्ण मुद्दा था। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट कहा था कि “हर चीज़ इंतज़ार कर सकती है, लेकिन कृषि नहीं।” इस सोच ने अंततः 1960 के दशक के अंत में हरित क्रांति को जन्म दिया, जिससे भारत की खाद्य सुरक्षा संभव हुई। कुछ किसानों को इसके लिए बहुत जरूरी राजस्व प्रदान किया गया। लेकिन वर्तमान समय में, बढ़ते जल संकट ने भारतीय कृषि को फिर से सुर्खियों में ला दिया है।

किसानों की शिकायतें

हरित क्रांति के दौरान अनाज की ज़्यादा उपज वाली किस्मों की खेती को प्रोत्साहन मिला। साथ ही, पंपों के जरिए बड़े पैमाने पर पानी निकालने की प्रथा शुरू हुई। बड़ी मात्रा में उर्वरकों का उपयोग किया गया। यह समझते हुए कि गारंटीशुदा बाजार के बिना किसानों द्वारा ऐसा निवेश नहीं किया जाएगा, भारत सरकार ने 1966-67 में गेहूं के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा की। इसने सरकारी खरीद का आधार मूल्य निर्धारित किया, जो इनपुट लागत से एक निश्चित प्रतिशत ज्यादा था, और इसलिए किसानों को एक सुनिश्चित खरीद की गारंटी दी गई : भले ही ज्यादातर फसलें सरकार द्वारा नहीं खरीदी गईं, एमएसपी ने अन्य खरीदारों के लिए एक न्यूनतम मूल्य निर्धारित किया।

आज एमएसपी व्यवस्था में 23 फसलें शामिल हैं : अनाज की किस्में, दालें और कुछ नकदी फसलें, जैसे गन्ना और कपास। ये कोशिशें खाद्य उत्पादन को प्रोत्साहित करने में बहुत सफल रही हैं। इसलिए हरित क्रांति से पहले की तरह अनाज का आयात करने के बजाय, 2017 तक भारत दुनिया में दालों और जूट का सबसे बड़ा उत्पादक और गेहूं, चावल और गन्ने का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक था। लेकिन आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत केवल गन्ने के एमएसपी की गारंटी है; इसलिए भारत में किसानों का सबसे ताजा विरोध प्रदर्शन संपूर्ण एमएसपी व्यवस्था को वैध बनाने को लेकर है। कई भारतीय किसानों के लिए यह कुछ हद तक वित्तीय सुरक्षा की एकमात्र गारंटी है। हालांकि हरित क्रांति और एमएसपी व्यवस्था (अपने वर्तमान स्वरूप में) के लाभ वर्तमान में पानी सहित कई चुनौतियों के कारण समाप्त हो रहे हैं।

सीमित संसाधनों का अंधाधुंध दोहन

19वीं सदी के भारत में ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड कर्जन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को “मानसून का जुआ” बताया था। जब भारत ने भूजल का दोहन शुरू किया, तो यह मुद्दा तो फीका पड़ गया, लेकिन इससे नई चुनौतियां पैदा हो गईं। भारत अब दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है और पूरे भारत में जल स्तर उस हिसाब से काफी गिर गया है: 2022 में, भारत के 12 प्रतिशत एक्वाइफर्स यानी जलभृतों की स्थिति को सरकार द्वारा “अर्ध-गंभीर” के रूप में वर्गीकृत किया गया था; 4 प्रतिशत को “गंभीर” और 14 प्रतिशत को “अति शोषित” कहा गया।

भारत में निकाले जाने वाले भूजल का 87 प्रतिशत सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है, जिससे भविष्य अंधकारमय दिखता है। 2019 की भारत सरकार की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि गेहूं की खेती वाले 74 प्रतिशत क्षेत्र और चावल उगाए जाने वाले 65 प्रतिशत क्षेत्र को पानी की कमी का सामना करना पड़ेगा। भारत के सबसे गंभीर रूप से प्रभावित हिस्से इसके उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र के अर्ध-शुष्क क्षेत्र हैं। यहां गेहूं और धान की बुआई (जो सरकारी खरीद का बड़ा हिस्सा है) सबसे अधिक होती है। अधिकांश प्रदर्शनकारी किसान यहीं से आते हैं।

भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण आर्सेनिक की मात्रा भी अधिक हो गई है। इससे पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल सहित विभिन्न राज्यों में लंबे समय से चल रहा एक स्वास्थ्य संकट पैदा हो गया है

अंततः फसलों की एक सीमित श्रृंखला पर ध्यान केंद्रित करने का मतलब है कि अधिकांश स्वदेशी बीज गायब हो रहे हैं। और इससे भारत के सामने एक ऐसे भविष्य का खतरा पैदा हो गया है, जिसमें वह केवल कुछ प्रकार के बीजों पर निर्भर हो सकता है।

बड़ा जल संकट कृषि और किसानों को प्रभावित करता है

यह सब चुनौतीपूर्ण जल भविष्य के संदर्भ में हो रहा है। स्वतंत्रता के बाद से भारत की आबादी में वृद्धि हुई है, लेकिन इसके जल संसाधन वही बने हुए हैं। पानी की उपलब्धता प्रति व्यक्ति 1,486 क्यूबिक मीटर से कम होने का अनुमान है, जो चिंताजनक है, क्योंकि 1,700 क्यूबिक मीटर को आमतौर पर जल संकट के लिए मानक माना जाता है।

इस बीच, इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) की हिमालय क्षेत्र पर नवीनतम रिपोर्ट का अनुमान है कि यह क्षेत्र 2050 तक “चरम जल संकट” पर पहुंच जाएगा, जिसके बाद पानी की उपलब्धता में गिरावट आएगी।

किसानों के मुद्दों के प्रति सरकारी प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं

हरित क्रांति की संकल्पना उस समय की गई थी, जब भारत के पास अपनी पानी की जरूरतों को समझने के लिए बहुत कम संसाधन थे, लेकिन आधी सदी बाद भी सरकार के पास देने के लिए कुछ भी नया नहीं है।

सितंबर, 2020 में सरकार ने तीन कृषि कानून पारित किए, जिन्हें नवंबर, 2021 में निरस्त कर दिया गया। उन कानूनों ने अधिक बाजार पहुंच, अनुबंध खेती और आवश्यक वस्तुओं के कम विनियमन पर जोर दिया था। उन्होंने एमएसपी की गारंटी नहीं दी और इसकी प्रतिक्रिया में कई राज्य सरकारों ने कानून पारित किए, जिन्होंने एमएसपी की गारंटी दी।

एमएसपी व्यवस्था के कमजोर होने को किसानों की वित्तीय सुरक्षा के लिए एक अतिरिक्त खतरे के रूप में देखा गया, जो पहले से ही कम जलस्तर, जलवायु-प्रेरित बाढ़ और सूखे की स्थिति, मानसून में उतार-चढ़ाव और अत्यधिक उर्वरक के उपयोग से बर्बाद हुई मिट्टी से जूझ रहे हैं। इन कानूनों से सरकार के लिए खरीद लागत कम हो सकती है, जबकि कृषक समुदाय के पानी के संकट से निपटने के लिए कुछ नहीं किया गया है।

जैसा कि कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा बताते हैं, किसान वर्तमान में खेती से प्रतिदिन लगभग 27 रुपये कमाते हैं: उन्हें अधिक समर्थन की आवश्यकता है, कम की नहीं।

1943 में बंगाल के अकाल के बाद, जिसमें लाखों लोग भूख से मर गए, भारत को आजादी मिली। आज पानी की उपलब्धता कम होने के कारण कृषि पर निर्भर करोड़ों लोगों को विनाशकारी भविष्य का सामना करना पड़ रहा है। सरकार को अब तक यह जान लेना चाहिए कि हर चीज इंतजार कर सकती है, लेकिन कृषि नहीं।