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भारत के सौर ऊर्जा क्षेत्र में अहम भूमिका निभा सकते हैं फ्लोटिंग सोलर

भारत का लक्ष्य है कि साल 2022 के अंत तक 100 गीगावॉट सौर ऊर्जा हासिल की जा सके। लेकिन फ्लोटिंग सोलर प्लांट्स कभी भी इस योजना का हिस्सा नहीं थे। धीरे-धीरे फ्लोटिंग सोलर के लाभ सामने आते जा रहे हैं और इनकी संख्या भी बढ़ रही है।
<p><span style="font-weight: 400;">इस साल की शुरुआत में जर्मनी की सिल्बर्सी झील पर फ्लोटिंग सोलर पैनल्स लगाए गए हैं। यूरोप और पूर्वी एशिया में लगभग एक दशक से फ्लोटिंग सोलर्स लगाये जाते रहे हैं। अब भारत में भी इसको लेकर रुचि बढ़ रही है क्योंकि देश अपने नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा करने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। </span><span style="font-weight: 400;">(फोटो: थिलो श्मुएलगेन/ अलामी)</span></p>

इस साल की शुरुआत में जर्मनी की सिल्बर्सी झील पर फ्लोटिंग सोलर पैनल्स लगाए गए हैं। यूरोप और पूर्वी एशिया में लगभग एक दशक से फ्लोटिंग सोलर्स लगाये जाते रहे हैं। अब भारत में भी इसको लेकर रुचि बढ़ रही है क्योंकि देश अपने नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा करने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। (फोटो: थिलो श्मुएलगेन/ अलामी)

पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने 26 अप्रैल को अंतर्राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा एजेंसी (आईआरईएनए) की एक बैठक के दौरान संवाददाताओं से कहा कि अगले साल भारत की तरफ से जी-20 की अध्यक्षता अक्षय ऊर्जा के लिए किये जा रहे प्रयासों में तेज़ी लाने के लिए एक “सुनहरा अवसर” प्रदान करेगी। प्रगति के लिहाज से साल 2022 इस दिशा में एक लिटमस टेस्ट है। यह वर्ष भारत के 175 गीगावाट के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य की समय सीमा का भी प्रतिनिधि है। इस लक्ष्य की परिकल्पना में फ्लोटिंग सोलर कभी भी मूल रूप से हिस्सा नहीं रही है।

फ्लोटिंग सोलर फोटोवोल्टिक (एफएसपीवी) का मतलब है वो सोलर पैनल जो जल श्रोत में तैर सकते हैं। इस परियोजना में केवल ज़मीन और छत पर लगने वाले सोलर को ही शामिल किया गया था। आंकड़ों की दृष्टि से यह संख्या छोटी है लेकिन इस संख्या को महत्वहीन नहीं माना जा सकता।

शुरुआत में अक्षय श्रेणी में सिर्फ़ छोटे हाइड्रोपावर या जलविद्युत शामिल थे। लेकिन बाद में 175 गीगावॉट के लक्ष्य को पूरा करने के लिए इस श्रेणी में बड़ी हाइड्रोपावर यानी पनबिजली को भी शामिल किया गया। लेकिन इसके बावजूद भारत अभी भी लक्ष्य को हासिल करने में नाकाम हो सकता है।

मार्च 2022 तक उपयोगिता-स्तरीय नवीकरणीय ऊर्जा के 156.6 गीगावॉट है और रूफटॉप सोलर के 11 गीगावॉट का अनुमान है। इस कमी की वजह है रूफटॉप सोलर की धीमी प्रगति। यह स्थिति भारत के हरित ऊर्जा स्रोतों के पोर्टफोलियो में और विविधता लाने की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है।

स्थलीय सौर का एक विकल्प

फ्लोटिंग सोलर के साथ भारत की यात्रा 2014 में शुरू हुई थी, जब कोलकाता में नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) द्वारा इसे अनुमोदित किया गया था। देश के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र के एक अनुभवी व्यक्ति एस. पी. गोन चौधरी ने द् थर्ड पोल को बताया: “इस परियोजना को लागू करने के लिए जिस संगठन को काम सौंपा गया था, वह एनबीआईआरटी [द् एनबी इंस्टीट्यूट फॉर रूरल टेक्नोलॉजी] थी, जिसका मैं उस समय अध्यक्ष था।”

चौधरी याद करते हुए कहते हैं कि एक बार परियोजना पूरी हो जाने के बाद, “विश्व बैंक जैसे संगठनों के अधिकारियों ने साइट का दौरा किया था और जांच की थी कि एक तैरता हुआ सौर संयंत्र कैसे स्थापित किया जाता है, यह कैसे काम करता है।” मूल रूप से, यह एक अध्ययन केंद्र था।

बाद में पंजाब, केरल, गुजरात और तमिलनाडु और अन्य जगहों पर संयंत्र लगे। थिंक टैंक, द् एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के जलाशय 18,000 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए हैं, जिसमें 280 गीगावॉट फ्लोटिंग सोलर की क्षमता है। इस नई तकनीक की स्थापना में भी कुछ बाधाएँ हैं जैसे कि उच्च लागत और डिजाइन से जुड़ी चुनौतियां। नवंबर 2021 तक इस नए तकनीक की अनुमानित संचयी स्थापित क्षमता केवल 2.7 मेगावॉट थी। ये संख्या इसे एक पायलट परियोजना से कुछ ज़्यादा बनाती है।

फ्लोटिंग सोलर कई समस्याओं का समाधान है।
मनु श्रीवास्तव, आयुक्त नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा, मध्य प्रदेश

हालांकि, थिंक टैंक, काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के अनुसार, भारत में अब लगभग 170 मेगावाट की ही ऑपरेशनल फ्लोटिंग सौर क्षमता है। इसके अलावा, करीब 1.8 गीगावॉट की सौर क्षमता अपने विकास के विभिन्न चरणों में है। सीईईडब्ल्यू के एक प्रवक्ता ने समझाया कि इसमें तेज़ी से इजाफे का कारण यह है कि पहले चालू किए गए संयंत्र छोटे थे, और भारत ने हाल के वर्षों से ही बड़े पैमाने पर फ्लोटिंग सोलर चालू किए है।

स्थलीय सोलर की निर्भरता भूमि पर है। टेरी की एक रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि 2030 के अंत तक भारत के 100 गीगावाट अतिरिक्त सौर क्षमता के राष्ट्रीय लक्ष्य के साथ तालमेल रखने के लिए फ्लोटिंग सोलर जैसे विकल्पों की खोज करने की ज़रूरत है। लेखकों का कहना है कि महाराष्ट्र के पास सबसे अधिक क्षमता है और इसके जलाशयों की सतह के 3,173 वर्ग किमी पर 57.9 गीगावॉट ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है।

सऊदी अरब में एफैट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा 2021 के एक अध्ययन में कहा गया है, “सौर ऊर्जा के लिहाज से पूरे बाजार के संबंध को देखें तो ये पता चलेगा कि फ्लोटिंग सोलर का हिस्सा बहुत कम है। फ्लोटिंग सोलर भारत में सौर ऊर्जा को तेजी से बढ़ाने में एक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है।”

फ्लोटिंग सोलर को लेकर संभावनाओं का आकाश

फ्लोटिंग सोलर के क्षेत्र में हालिया घटनाक्रम, इस क्षेत्र की संभावनाओं की तरफ इशारा करते हैं। पिछले साल अगस्त में, सरकार के स्वामित्व वाली भारत की सबसे बड़ी एकीकृत ऊर्जा कंपनी एनटीपीसी ने आंध्र प्रदेश में अपने सिम्हाद्री थर्मल पावर स्टेशन के जलाशय पर 25 मेगावाट की परियोजना शुरू की थी। संयंत्र में 100,000 से अधिक सोलर पीवी मॉड्यूल से बिजली पैदा करने की क्षमता है, जो लगभग 7,000 घरों में रोशनी कर सकता है। अपने जीवनकाल में यह हर साल, कम से कम 46,000 टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन से बचा सकता है।

जनवरी 2022 में, राज्य के स्वामित्व वाली जल विद्युत निगम, एनएचपीसी ने पूर्वी राज्य ओडिशा में एक डेवलपर के साथ 500 मेगावाट का फ्लोटिंग सोलर प्लांट बनाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह शुरू में 300 मेगावाट मूल्य की फ्लोटिंग सौर परियोजनाओं में 2000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश करेगा। यह परियोजना निवेश और रोजगार के अवसर पैदा करने के अलावा राज्य को अपने अक्षय ऊर्जा उत्पादन लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करेगी।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने 10 मार्च, 2022 को भारत के सबसे बड़े तैरते सौर ऊर्जा संयंत्र का उद्घाटन किया, जिसका निर्माण 150 करोड़ रुपये की लागत से किया गया।

भूमि की है कमी लेकिन पानी है उपलब्ध

अधिकांश भारतीय राज्यों में भूमि की कमी है, लेकिन फ्लोटिंग सोलर के लिए पर्याप्त पानी है। चौधरी समझाते हैं कि पानी पर सोलर लगाने से कम तापमान के कारण पैनल की दक्षता बढ़ सकती है, जो ओवरहीटिंग को रोकता है।

मध्य प्रदेश सरकार के नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा आयुक्त मनु श्रीवास्तव ने कहा, “जब हम ज़मीन के टुकड़े की तलाश शुरू करते हैं, तो यह आसान नहीं होता है। जहां अधिक भूमि उपलब्ध है, ऐसे स्थानों में बहुत अधिक परियोजनाएं हैं और इसलिए, संचरण एक चुनौती है… फ्लोटिंग सोलर बहुत सारी समस्याओं का समाधान करता है।”

मध्य प्रदेश में सौर परियोजनाओं को क्रियान्वित करने वाले, रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर लिमिटेड, जो एक संयुक्त उद्यम है, में कार्यकारी अभियंता अवनीश शुक्ला ने द् थर्ड पोल को बताया कि मध्य प्रदेश में 600 मेगावॉट का फ्लोटिंग सोलर प्लांट अगस्त 2023 तक चालू हो जाएगा। माना जा रहा है कि यह दुनिया के ऐसे सबसे बड़े संयंत्रों में से एक होगा।

शुक्ला ने कहा कि सौर परियोजनाएं अक्सर बंजर भूमि पर कब्ज़ा कर लेती हैं जिनका उपयोग कृषि, उद्योग या लोगों द्वारा नहीं किया जाता है। वह कहते हैं, “चूंकि इस प्रकार की भूमि की कमी है, इसलिए हमें परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसे परिदृश्य में, जल निकाय परिपूर्ण हैं। इसके अलावा, अगर हम सौर पैनल [सूर्य की किरणों को प्रतिबिंबित करने के लिए] स्थापित करने के लिए इसका उपयोग नहीं करते हैं तो पानी वाष्पित हो जाएगा।”

अक्षय ऊर्जा कंसल्टेंसी, ब्रिज टू इंडिया के प्रबंध निदेशक विनय रुस्तगी ने बताया कि कुछ फ्लोटिंग सोलर साइट्स जो जलविद्युत परियोजनाओं के पास या थर्मल प्लांट जलाशयों में स्थित हैं, उनके पास पहले से ही अपने ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुंच है।

सौर की गिरती लागत

टेरी की 2020 की एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्राउंड-आधारित इंस्टॉलेशन, अभी भी, भारत के ग्रिड से जुड़े सोलर पीवी का 93.1 फीसदी है। उपयोगिता-पैमाने पर सौर लागत 2010 और 2018 के बीच 84 फीसदी गिरी है, जिससे अन्य जगहों की तुलना में, भारत में बड़े पैमाने पर सौर सस्ता हो गया है।

चौधरी के अनुसार, फ्लोटिंग सोलर प्लांट स्थापित करने की लागत वर्तमान में पांच-छह करोड़ रुपये प्रति मेगावाट है, जबकि पारंपरिक भूमि-आधारित सौर परियोजनाओं की लागत 520,000 डॉलर प्रति मेगावाट के बराबर है। इस अंतर से पता चलता है कि प्रौद्योगिकी के प्रसार की रफ्तार धीमी है। हालांकि फ्लोटिंग सोलर और रखरखाव अधिक लागत प्रभावी होते जा रहे हैं।

चौधरी का कहना है, “भारत को 2030 तक कुछ लक्ष्यों को पूरा करने की जरूरत है, जिसका मतलब है कि राज्यों को ऐसे और [फ्लोटिंग सोलर] प्लांट लगाने की जरूरत है, क्योंकि उनके पास इतनी जमीन नहीं है।”

श्रीवास्तव के अनुसार, हल्के लेकिन बड़े फ्लोटर्स का परिवहन एक चुनौती हो सकती है। हालांकि, ये कम तकनीक वाले घटक हैं, इसलिए स्थापित किए जाने वाले स्थलों के पास विनिर्माण संयंत्र, लागत में और कमी ला सकते हैं।

श्रीवास्तव कहते हैं कि साइटों की हाइड्रोग्राफी और वाटर-बेड टोपोग्राफी के अधिक विस्तृत आकलन की आवश्यकता के कारण फ्लोटिंग सौर परियोजनाओं को अधिक समय की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, अधिक जटिल डिजाइन और पानी में काम करने के जोखिमों के कारण पूंजी और परिचालन लागत दोनों थोड़ा अधिक है।

हालांकि, रुस्तगी का कहना है कि अधिकांश आंतरिक जल निकायों के प्रभारी स्थानीय सरकारों और नगर पालिका एजेंसियों को इस पर ज़ोर देना चाहिए।

नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट में उप नवीकरणीय ऊर्जा कार्यक्रम प्रबंधक बिनीत दास ने इस पर सहमति व्यक्त की, लेकिन उनका कहना है कि कुछ अन्य अधिक तकनीकी दिक्कतें हैं जिनको दूर करने की आवश्यकता है: “सोलर फ्लोटिंग सिस्टम को 25 से अधिक वर्षों तक पानी पर सोलर पैनल बरकरार रखने की आवश्यकता है। इसलिए रैकिंग सिस्टम को जंग के लिए अत्यधिक प्रतिरोधी होना चाहिए। इसकी एक लंबी उम्र और उच्च भार क्षमता होनी चाहिए।”

वह आगे कहते हैं, “चूंकि यह अपेक्षाकृत नई सौर ऊर्जा तकनीक है, इस लिहाज से इसके लिए विशेष सौर ऊर्जा उपकरण और अधिक विशिष्ट सौर पैनल के स्थापना की जानकारी की आवश्यकता होती है।”

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