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बिजली की बढ़ती मांग और खपत के बीच संघर्ष कर रही भारत की ऊर्जा प्रणाली

प्रचंड गर्मी के बीच देशभर में लोगों ने एसी, पंखों और फ्रिज के उपयोग को बढ़ा दिया है। इन बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए ग्रिड भी संघर्ष कर रहा है। ये स्थिति भविष्य की एक झलक है जहां जलवायु परिवर्तन की वजह से ऐसे गर्म मौसम और भी अधिक दिख सकते हैं।

नई दिल्ली में 18 अप्रैल, 2022 को धूप से बचने के लिए छतरियों का इस्तेमाल करते लोग (फोटो: रवि बत्रा / अलामी)

इस समय भारतीय उपमहाद्वीप की प्रचंड गर्मी दुनिया भर में सुर्खियों में है। गर्म लू की वजह से लाखों लोगों के स्वास्थ्य और आजीविका पर खतरा मंडरा रहा है। इस बीच बिजली कटौती भी एक बड़ी समस्या है। डॉक्टरों ने बताया है कि हीट स्ट्रोक के लक्षणों में बढ़ोतरी हुई है। साथ ही, उन्होंने यह चेतावनी भी दी है कि अगर लंबे समय तक ऐसी चरम स्थितियां बनी रहीं तो यह लोगों के लिए काफ़ी घातक साबित हो सकता है।

इस स्थिति में एक ऐसे कमज़ोरी के बारे में भी पता चला है जिसके बारे में चर्चा बहुत कम होती आई है: ऊर्जा प्रणाली। मसलन, एक ऐसी ऊर्जा प्रणाली जिस पर उसकी क्षमता से अधिक दबाव पड़ जाए तो वो पूरी तरह थप भी हो सकती है। ऐसे हालात तब पैदा होते हैं जब बाहर बहुत गर्मी होने पर घरों और अस्पतालों में एसी, पंखे व फ्रिज इत्यादि चालू रखने के लिए बिजली की मांग अचानक बढ़ने लगे। 

आमतौर पर मई महीने से पहले, उत्तर भारत और पाकिस्तान में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के करीब या उससे ज़्यादा बढ़ते हुए नहीं दिखती थी। लेकिन इस साल अप्रैल के दूसरे सप्ताह में ही ऐसी स्थिति देखने को मिल रही है। इसकी वजह से गर्मी के मौसम में कुछ हफ्ते और जुड़ गए हैं।

बेमौसम गर्मी ने वैज्ञानिकों को चिंतित कर दिया है। वो कहते हैं कि इसके पीछे की वजह जलवायु परिवर्तन है। ब्रिटेन के इंपीरियल कॉलेज, लंदन में ग्रांथम इंस्टीट्यूट की जलवायु वैज्ञानिक मरियम ज़कारिया का कहना है कि इस समय दक्षिण एशिया में तापमान स्वाभाविक नहीं है।

जलवायु परिवर्तन है एक बड़ा कारण

अपनी टीम के साथ, उन्होंने अप्रैल के पहले सप्ताह से होने वाली हीटवेव की जांच की थी। इसमें पाया गया कि मौजूदा वातावरण में इस तरह का तापमान देखना लगभग चार साल में एक बार की घटना है। उन्होंने इसकी तुलना कंप्यूटर जनित मॉडल ग्रह से की, जिसमें वातावरण में कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन था। उन्होंने पाया कि जलवायु परिवर्तन के बिना ऐसी घटनाएं बहुत दुर्लभ होती है, जो एक सदी में सिर्फ दो बार होती हैं।

ज़कारिया कहती हैं, “इस पैटर्न के बाद, हम भविष्य में गर्म तापमान के साथ हीटवेव की उम्मीद कर सकते हैं, जब तक कि शुद्ध उत्सर्जन [ग्रीनहाउस गैसों का नेट जीरो से अधिक उत्सर्जन] रुक नहीं जाता है।”

लगातार चलने वाली ये गर्म लू बताती है कि जलवायु परिवर्तन वास्तविक है और इसलिए ग्रिड का डी-कार्बोनाइजेशन अनिवार्य है।
भारत की प्रमुख अक्षय ऊर्जा कंपनियों में से एक के पॉलिसी लीड

जैसे-जैसे उत्तर और मध्य भारत में पारा चढ़ता गया, बिजली कटौती भी बढ़ने लगी। जबकि इस समय बिजली की सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है। बिजली से न केवल घरों को ठंडा रखने वाले उपकरण चलते हैं बल्कि देश के खाद्यान्न की टोकरी कहे जाने वाले हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में बिजली की मदद से ही पंपों के ज़रिये पानी निकालकर फसलों की सिंचाई भी की जाती है।

पोलस्टर लोकलसर्किल ने 322 ग्रामीण और शहरी जिलों में 21,500 घरों का सर्वेक्षण किया, जिसमें पाया गया कि तीन में से दो उत्तरदाताओं को हीटवेव के दौरान बिजली की कटौती का सामना करना पड़ा था। तीन में से एक ने दो घंटे से अधिक समय तक बिजली की कटौती का अनुभव किया था। नेशनल लोड डिस्पैच सेंटर (पीओएसओसीओ) के आंकड़ों के मुताबिक विभिन्न राज्यों में बिजली की कमी दर्ज की गई है।

बिजली की बढ़ते मांग का ग्रिड पर क्या असर होता है

एक थिंक टैंक एलायंस फॉर ए एनर्जी एफिशिएंट इकोनॉमी (एईईई) की वरिष्ठ शोधकर्ता चंदना शशिधरन बताती हैं कि बिजली कटौती तब होती है, जब ऊर्जा की मांग ग्रिड ऑपरेटरों की अपेक्षा से अधिक हो जाती है और जब एक निश्चित समय पर बिजली भेजने की योजना बनाई गई होती है। पिछले हफ्ते, भारत में अभूतपूर्व 207,111 मेगावाट बिजली की मांग दर्ज की गई, जिससे ऊर्जा प्रणाली अव्यवस्थित हो गई थी।

वह बताती हैं, “[ग्रिड] संतुलन एक ऐसी प्रणाली पर काम करता है जहां संतुलन हो और किसी भी समय आपूर्ति और मांग के बीच मेल होना चाहिए। अब, जब आपके समक्ष जलवायु से संबंधित कोई बड़ी परिस्थिति सामने आती है, जैसे कि हीटवेव, तो आप उसके लिए कैसे तैयारी करते हैं? आप देखेंगे कि पिछले साल उसी महीने में क्या हुआ था, और आप यह भी देखेंगे कि पिछले सप्ताह में क्या हुआ [ऊर्जा खपत पैटर्न को मापने के लिए]। ऊर्जा से संबंधित योजना बनाने वालों को पता है कि मांग बढ़ने वाली है, लेकिन जिस पर आपका नियंत्रण नहीं है, वह इस वृद्धि का पैमाना है। मांग में बहुत सारे व्यवहार संबंधी पहलू होते हैं, और आप वास्तव में बहुत अधिक विवरण के साथ इसका अनुमान नहीं लगा सकते हैं।”

अगर एक उचित योजना बनाई गई होती तो प्रणाली में पर्याप्त क्षमता होती।
भारत की प्रमुख अक्षय ऊर्जा कंपनियों में से एक के पॉलिसी लीड

अपना नाम ज़ाहिर न करने के शर्त पर भारत की प्रमुख अक्षय ऊर्जा कंपनियों में से एक के पॉलिसी लीड का कहना है, “मौजूदा हालात में सबसे बड़ी बाधा, बिजली वितरण कंपनियों की खराब योजना रही है। हीटवेव के चलते पीक डिमांड में इतनी तेजी से वृद्धि का अनुमान किसी ने नहीं लगाया था। लेकिन अगर सही से योजना बनाई गई होती तो प्रणाली में पर्याप्त क्षमता होती। मेरे अनुभव से पता चलता है कि अब तक मांग का अनुमान मैनुअल और एक्सेल-आधारित है। वैज्ञानिक तकनीकों का अभाव है। किसी भी तरह से मौसम पूर्वानुमान मॉडल का उपयोग नहीं किया जाता है।”

विशेषज्ञों का कहना है कि निजी वितरण कंपनियों ने बेहतर प्रदर्शन किया क्योंकि किसी भी समय कितनी ऊर्जा की आवश्यकता होगी, यह जानने के लिए वे अधिक परिष्कृत उपकरणों का उपयोग करते हैं।

एक तत्काल और जटिल ऊर्जा रूपांतरण

इस चुनौती में एक पहलू ये भी है कि जलवायु परिवर्तन और कोयले के इस्तेमाल से बचने की भी ज़रूरत है। तेजी से बढ़ती गर्मी के साथ एयर कंडीशनर्स और पंखों की आवश्यकता बढ़ेगी। लेकिन जब तक यह अतिरिक्त ऊर्जा जीवाश्म ईंधन के माध्यम से प्राप्त की जाएगी, यह समस्या लंबे समय तक बरकरार रहेगी।

3.4 करोड़

संयुक्त राष्ट्र की एक भविष्यवाणी के मुताबिक हीटवेव के कारण 2030 तक भारत में 3.4 करोड़ नौकरियां खत्म हो जाएंगी।

उनका कहना है, “लगातार चल रही हीटवेव यह दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन एक सच्चाई है और इसलिए ग्रिड का डीकार्बोनाइजे़शन अनिवार्य है।” इसके अलावा, सोलर सेल्स और मॉड्यूल के निर्माण, बैट्रीज़ और हाइड्रोजन को बढ़ावा देना भारत को ऊर्जा सुरक्षित बनाने में मदद कर सकते हैं। उनके अनुसार अक्षय ऊर्जा अन्य ऊर्जा से संबंधित योजनाओं में भी बदलाव ला सकता है।

वह कहती हैं, “कोयले जैसे जीवाश्म ईंधन के साथ आप अपने ऊर्जा प्रवाह को पूरी तरह से नियंत्रित कर सकते हैं। आपको बस कोयले से बिजली बनाने की क्षमता को बढ़ाना होता है। [आवश्यक ऊर्जा की सटीक मात्रा का उत्पादन करने के लिए]। सौर उर्जा के मामले में “आपका इनपुट पर कोई नियंत्रण नहीं है”, क्योंकि ऊर्जा उत्पादन में मौसम के साथ उतार-चढ़ाव आएगा और रात में बंद हो जाएगा।

शशिधरन कहती हैं कि ऐसे दबाव की स्थिति में इस बात पर ध्यान देना ज़रुरी है कि अस्पतालों जैसे महत्वपूर्ण जगहों पर बिजली कटौती का असर ना पड़े। लेकिन अगर लंबे समय की बात करे तो एक ऐसे दृष्टिकोण की ज़रूरत है जिसमें सभी बातों का ध्यान रखा जाए। एक ऐसी प्रणाली की ज़रूरत है जिसमें मांग का प्रबंधन भी शामिल हो और लोगों को ऊर्जा का बेहतर उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। उदाहरण के लिए लोगों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करने की ज़रूरत है कि एयर कंडीशनर को 18 डिग्री सेल्सियस के बजाय 26 डिग्री सेल्सियस पर रखें।

आमतौर पर हीटवेव्स साल में सिर्फ़ एक बार सुर्खियों में आती है लेकिन अब ऐसा नहीं है। लगातार गर्म हो रहे पृथ्वी से अब साल भर मुकाबला करना पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, हीटवेव्स से भारत में 2030 तक 3.4 करोड़ नौकरियों का नुकसान होगा। आशंका है कि यह नुकसान विशेष रूप से निर्माण और कृषि क्षेत्र में होगा जो देश के श्रम बाजार की रीढ़ कहलाती है।

दिल्ली में स्थित काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के प्रोग्राम लीड अविनाश मोहंती का कहना है कि अत्यधिक तापमान की तैयारी के लिए बडे़ स्तर पर स्थानीय प्रयासों की एक विस्तृत श्रृंखला की आवश्यकता होती है। इनमें कम रोशनी को अवशोषित करने वाली और कम गर्मी बरकरार रखने वाली छतों को डिजाइन करना, पूर्व चेतावनी प्रणाली में सुधार और प्रकृति-आधारित समाधानों को लागू करना जैसे कि वृक्षों के आवरण को यथासंभव बहाल करना इत्यादि शामिल हैं। 

बदले में ये उपाय इलेक्ट्रिक कूलिंग की आवश्यकता को कम करेंगे, ऊर्जा बचाने में मदद करेंगे और उन लोगों की रक्षा करेंगे जो पंखे या एयर कंडीशनर्स का खर्च नहीं उठा सकते। वह कहते हैं, “हीटवेव एक्शन प्लान को फास्ट-ट्रैक करना भारत की अर्थव्यवस्था के जलवायु-प्रूफिंग के साथ-साथ नागरिकों के लिए जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार सुनिश्चित करेगा।”

यह लेख सबसे पहले Lights On द्वारा प्रकाशित किया गया था। 

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