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विचार: भारत सरकार हिमालय से जुड़ी अपनी चेतावनियों को खुद नज़रअंदाज़ कर रही है

हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं की वजह से बढ़ती मौतें ये दर्शाती है कि कैसे असुरक्षित प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने विज्ञान और पर्यावरण को नज़रअंदाज़ किया है।
<p>30 जून को मणिपुर भूस्खलन में मारे गए परिवार के एक सदस्य के खोने पर शोक व्यक्त करती एक महिला। बचावकर्मियों ने अब तक 50 शवों को मलबे से निकाला है। (फोटो: अलामी)</p>

30 जून को मणिपुर भूस्खलन में मारे गए परिवार के एक सदस्य के खोने पर शोक व्यक्त करती एक महिला। बचावकर्मियों ने अब तक 50 शवों को मलबे से निकाला है। (फोटो: अलामी)

भारतीय हिमालय के पश्चिम दिशा में मौजूद हिंदू तीर्थस्थल अमरनाथ गुफा में हाल ही में आई फ्लैश फ़्लड यानी आकस्मिक बाढ़ के कारण 16 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। अभी भी कम से कम 40 लोगों की तलाश जारी है। इस बाढ़ की वजह से अमरनाथ यात्रा पर आए तीर्थयात्री और गुफा के पास मौजूद उनके टेंट बाढ़ के पानी के साथ ही बह गए। 8 जुलाई को आई इस आपदा में करीबन 15,000 लोगों को बचाया जाना था। इस त्रासदी के चार दिन बाद ही यात्रा को फ़िर से शुरू कर दिया गया है। 

वहीं भारतीय हिमालय के पूर्वी इलाके में एक लैंडस्लाइड की वजह से 30 जून को 52 लोगों की मौत हो गई। यह घटना मणिपुर की है जहां इम्फाल तक पहुंचने के लिए एक रेलवे लाइन बनाई जा रही है। रेलवे मंत्रालय द्वारा इस रेलवे लाइन को अभी तक का सबसे महत्त्वाकांक्षी प्रोजेक्ट बताया गया है। 

इस परियोजना में पहाड़ों के नीचे 46 सुरंग खोदे जाने है, जिसमें से एक सुरंग 11.55 किमी लंबी है। ये भारत की सबसे लंबी सुरंग बन सकती है। द हिंदू के एक महत्वपूर्ण लेख से पता चला है कि मणिपुर लोक निर्माण विभाग ने अस्थिर पहाड़ियों के पास लाइन लगाने के खिलाफ चेतावनी दी थी। रेलवे अधिकारियों ने आपदा के पीछे स्लैश-एंड-बर्न खेती को जिम्मेदार ठहराया है, जबकि स्वतंत्र पर्यवेक्षकों ने द हिन्दू को बताया है कि रेलवे इंजीनियरों ने पहाड़ी को खतरनाक स्तर तक काट दिया था।

तीर्थयात्रा से लेकर लाइनों, सड़कों, बांधों और अन्य इंफ्रस्ट्रक्चर परियोजनाओं के निर्माण तक, बार-बार चेतावनियां दी जा रही है। लेकिन इन्हें अनदेखा किया जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव बढ़ रहे हैं और इस संदर्भ में हिमालयी क्षेत्र पहले से भी अधिक नाज़ुक होता जा रहा है। इसलिए तीर्थयात्रा से लेकर लाइनों, सड़कों, बांधों और अन्य इंफ्रस्ट्रक्चर परियोजनाओं के निर्माण तक, बार-बार चेतावनियां दी जा रही है। लेकिन इन्हें अनदेखा किया जा रहा है। 

उदाहरण के तौर पर, उत्तराखंड में चार हिंदू मंदिरों – केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री- की ओर जाने वाली सड़कों का चौड़ीकरण ले सकते हैं। इस काम को रोकने के लिए पर्यावरणविद कोर्ट गए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञों की एक समिति का गठन किया। साल 2020 में समिति के अध्यक्ष रवि चोपड़ा ने चौड़ीकरण के खिलाफ सिफारिश की। द् थर्ड पोल ने इस पर रिपोर्ट भी किया। सरकार वापस सुप्रीम कोर्ट गई और उन्होंने कहा कि भारतीय सेना को चौड़े रास्तों की ज़रूरत है ताकि वो भारत-चीन सीमा पर हथियारों को ले जा सके। इसके बाद कोर्ट ने चौड़ीकरण की अनुमति दे दी। इन रास्तों को इस्तेमाल करने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या सैनिकों या भारी हथियारों की संख्या से कई गुना अधिक है।

अमरनाथ: एक ऐसी आपदा जिसकी भविष्यवाणी हो चुकी थी

हर साल श्रद्धालु अमरनाथ यात्रा पर जाते हैं। ये यात्रा आपदाओं का भी शिकार रह चुकी है। अब जलवायु परिवर्तन की वजह से इन आपदाओं की संभावना और बढ़ती जा रही है।  पिछले हफ्ते आई इस आपदा में, पंचतरणी के बाढ़ के मैदानों पर तीर्थयात्रियों के लिए तंबू स्थापित किए गए थे। पंचतरणी 3,880 मीटर ऊंचे गुफा के अंतिम चढ़ाई के नीचे स्थित पांच धाराओं का संगम है। इन में से एक धारा में हुई भारी बारिश की वजह से फ्लैश फ़्लड आई थी। 

साल 2013 में केदारनाथ में आई फ्लैश फ़्लड में यह बात साफ़ हो चुकी थी कि बाढ़ के मैदानों में टेंट लगाना खतरनाक हो सकता है। जून 2013 में उत्तराखंड में आई इस बाढ़ में 800 लोगों कि मृत्यु हुई थी और लाखों लोग प्रभावित हुए थे। उस स्थिति में भी, बाढ़ के मैदानों पर लगे टेंट और बसें हिमनद झील के फटने से आई एक बाढ़ में बह गए थे।

साल 2021 में भी अमरनाथ गुफा के पास एक आकस्मिक बाढ़ आई थी। इस बाढ़ में किसी को क्षति नहीं पहुंची क्योंकि कोविड महामारी की वजह से तीर्थयात्रा को निलंबित कर दिया गया था। 

जब इस साल की तीर्थयात्रा की योजना बनाई जा रही थी, आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों ने सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत आदान-प्रदान में एक-दूसरे से बात करते हुए अधिकारियों को बाढ़ के मैदानों में टेंट लगाने के खिलाफ चेतावनी दी थी। इस चर्चा को द् थर्ड पोल ने देखा था। 

अधिकारियों ने जवाब दिया कि खड़ी पहाड़ी इलाके में टेंट लगाने के लिए अन्य कोई जगह उपलब्ध नहीं थी। इस बात पर समझौता हुआ कि टेंटों को नदी के किनारे से जितना संभव हो सके दूर रखा जाए और अचानक बाढ़ की स्थिति में पानी को दूर रखने के लिए दो फुट ऊंची पत्थर की दीवार बनाई जाए। लेकिन जब बाढ़ आई तो दोनों ही उपाय असफल साबित हुए। अधिकारी अब कह रहे हैं कि उन्होंने बाढ़ के मैदानों में तंबू नहीं लगाए लेकिन तीर्थयात्रियों के पास मौजूद वीडियो सबूत में दृश्य कुछ और नज़र आ रहे हैं।

Indian army troopers carry an injured woman from the site of a cloudburst that hit near the Amarnath cave shrine in the west of the Indian Himalayas
भारतीय सेना के जवान अमरनाथ गुफा मंदिर के पास अचानक आई बाढ़ की जगह से एक घायल महिला को ले जाते हुए। (फोटो: जावेद डार / आलमी)

सरकार द्वारा अनुशंसित सीमा के बावजूद तीर्थयात्रियों की संख्या है अधिक

अधिकारियों का तर्क बिल्कुल सही है कि बाढ़ के मैदानों  के अलावा ऐसी कोई जगह उपलब्ध नहीं है जहां 15,000 तीर्थयात्री रह सके। लेकिन मंदिर के पास इतने सारे तीर्थयात्री नहीं होने चाहिए। साल 1996 में आई आपदा के बाद भारत सरकार ने एक आयोग का गठन किया था ताकि वैसी आपदा वापस ना आए। ब्यूरोक्रैट नीतीश सेनगुप्ता इस आयोग के अध्यक्ष थे। आयोग के अनुसार मंदिर में या उसके आसपास एक दिन में 3,000-3,500 से अधिक लोग नहीं होने चाहिए।

लेकिन इन बातों का ध्यान नहीं रखा गया। अब भारत मौसम विभाग पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि तीर्थयात्रा के लिए एक समर्पित वेबसाइट होने के बावजूद उन्होंने भारी बारिश और उसके वजह से अचानक आई बाढ़ की भविष्यवाणी नहीं की। लेकिन निजी सोशल मीडिया ग्रुप एक्सचेंजों में अधिकारियों से बात करने वाले विशेषज्ञों ने बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों में अचानक बारिश की भविष्यवाणी करने वाली तकनीक अभी तक मौजूद नहीं है।

फ्लैश फ़्लड या अचानक बाढ़ आने से नुकसान तो होगा लेकिन अधिकारियों ने अमरनाथ गुफा तक जाने वाले अधिकांश मार्ग को पक्का करके जोखिम बढ़ा दिया है। इसकी वजह से पानी अंडरग्राउन्ड नहीं जा पाता। अब तो मध्यम बारिश के साथ भी बाढ़ की संभावना बढ़ गई है।

इस आपदा के बाद भी हमने कुछ नहीं सीखा

आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों ने पिछले हफ्ते की आपदा के बाद अमरनाथ तीर्थयात्रा के लिए कुछ सुरक्षा सावधानियों को दोहराया है। इसमें उन्होंने ऊंची जमीन पर टेंट लगाने की बात की है और दोपहर 3 बजे के बाद गुफा के अंदर तीर्थयात्रियों को जाने से मना किया है ताकि लोग दिन के उजाले में सुरक्षित स्थानों पर पहुंच सकें। इसमें  हर 30 मिनट में एक जोखिम मूल्यांकन, आपातकालीन मार्गों का उचित निर्धारण, और सबसे महत्वपूर्ण,  तीर्थयात्रियों की संख्या का नए सिरे से मूल्यांकन भी शामिल हैं।

लेकिन अभी भी  इस बात का कोई संकेत नहीं है कि अधिकारी इन चेतावनियों को सुन रहे हैं। तीर्थयात्रियों की संख्या को सीमित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया है।

 पर्वतीय क्षेत्रों में अचानक बारिश की भविष्यवाणी करने वाली तकनीक अभी उपलब्ध नहीं है।

बात सिर्फ़ अधिकारियों की नहीं है। अधिकांश तीर्थयात्रियों द्वारा नियतिवाद यानी भाग्य पर भरोसा करने वाले सिद्धांत के कारण सुरक्षा उपायों की योजना बनाना बहुत कठिन हो जाता है। इस साल पहली बार हर तीर्थयात्री को रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन डिवाइस (आरएफआईडी) दिए गए थे। सभी को इसे गले में पहनने को कहा गया था लेकिन बहुत से तीर्थयात्रियों ने इस उपकरण को अपने  हैंडबैग या जेब में रखा था। जब बचाव दल ने बाढ़ के बाद मलबे में दबे लोगों की तलाश के लिए आरएफआईडी लोकेटर का इस्तेमाल किया तो उन्होंने पाया कि ये उपकरण पीड़ितों से दूर थे। यदि सभी तीर्थयात्रियों ने अपने गले में उपकरण रखे होते तो कई और लोगों की जान बचाई जा सकती थी।

जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी आपदाओं की संभावना और बढ़ जाती है। ऐसे हालात में अधिकारियों और लोगों को उपलब्ध सलाह और निवारक उपायों पर बेहतर ध्यान देने की ज़रूरत है।

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