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उत्तरी पाकिस्तान में लुप्त हो रहे हैं कार्बन जमा रखने वाले पीटलैंड

कृषि और सड़कों के निर्माण के लिए कार्बन-लॉकिंग पीट का इस्तेमाल किया जा रहा है। साथ ही, इसका उपयोग ईंधन के तौर पर भी किया जा रहा है जिसकी वजह से पीटलैंड खत्म होते जा रहे हैं। शोध की फ़िलहाल कमी है, जिसका सीधा मतलब यह है कि विशेषज्ञ यह पता नहीं लगा पा रहे कि पीटलैंड कितनी तेज़ी से समाप्त हो सकता है।
<p><span style="font-weight: 400;">ब्रोघिल घाटी से पीट निकाली जा रही है।  (फोटो: ज़हीरुद्दीन)</span></p>

ब्रोघिल घाटी से पीट निकाली जा रही है।  (फोटो: ज़हीरुद्दीन)

उत्तरी पाकिस्तान के एक सुदूर गांव इश्करवार्ज़ में अमीन बेग रहते हैं। उनकी रोजी-रोटी का साधन उनके पालतू याक हैं। अमीन बेग के पास लंबे बालों वाले 20 से 40 पशु थे, लेकिन करीब 10 साल पहले उन्हें एक साथ 12 पशु बेचने पड़े। अमीन बेग ने बताया कि गांव के आसपास के इलाके में अब घास के मैदान नहीं रहे। इसके चलते जानवरों को खिलाने के लिए पर्याप्त चारा नहीं मिलता।

खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के सबसे उत्तरी जिले पहाड़ी चित्राल में घास के दलदली मैदानों (पीटलैंड) का सबसे अधिक दोहन किया जा रहा है। आज से करीब 85 साल पहले लोगों ने यहां बड़ी मात्रा में पीट को खोदना शुरू किया था। इसे सुखाकर ब्रिकेट में पैक किया। फिर इसका इस्तेमाल खाना पकाने और सर्दी में खुद को गर्म रखने के लिए ईंधन के तौर पर किया। इस वजह से पीटलैंड लुप्त होते जा रहे हैं।

अमीन बेग कहते हैं कि उन्हें एक साथ 12 याक बेचने का पछतावा है। उनके लिए कम याक रखने का मतलब है कि जरूरत का सामान खरीदने के लिए कम नकदी का होना। उन्होंने कहा, “हमारे याक को गिलगित या चित्राल के बाजारों में बेचकर पैसा कमाते थे, लेकिन अब घाटी के उन सभी गांव के रहने वाले हर एक व्यक्ति की यही दुर्दशा है, जहां से पीटलैंड लुप्त होती जा रही है।”

पीटलैंड एक प्रकार की आर्द्रभूमि (घास के दलदली मैदान) है, जो पूरी दुनिया में पाई जाती है, लेकिन पाकिस्तान में यह केवल हाई एल्टीट्यूड वाले चित्राल और गिलगित-बाल्टिस्तान के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। पीट जलभराव की स्थिति में उगने वाले पौधों से बनती है- जब पौधे मर जाते हैं लेकिन पूरी तरह विघटित नहीं होते हैं और सदियों तक पानी में आंशिक रूप से संरक्षित रहते हैं।

अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) के अनुसार, पीटलैंड एक्सट्रीम हीट को कम करते हैं क्योंकि पीटलैंड परिवेश के तापमान को कम रखते हैं और हवा व पानी की गुणवत्ता बनाए रखते हैं। पीटलैंड दुनिया में अन्य सभी प्रकार की वनस्पतियों की तुलना में अधिक कार्बन भी जमा करते हैं। जब पीटलैंड सूख जाती है तब कार्बन उत्सर्जित होता है।

Peatland in Broghil Valley in Chitral, Pakistan, Zahiruddin
चित्राल घाटी में दूर तक फैला है पीटलैंड। (फोटो: ज़हीरुद्दीन)
Degraded peatland in Broghil Valley, Pakistan, Zahiruddin
ब्रोघिट घाटी में तबाह हो चुकी पीटलैंड का दृश्य। (फोटो: ज़हीरुद्दीन)

पाकिस्तान वेटलैंड्स प्रोग्राम (पीडब्ल्यूपी) के साल 2008 से साल 2012 के बीच हुए सर्वेक्षण में पता चला कि ब्रोघिल पर्वत दर्रे में 2,800 हेक्टेयर पीटलैंड था। द् थर्ड पोल को यह जानकारी उस वक्त पीडब्ल्यूपी में काम करने हामिद अहमद मीर ने दी। हामिद अहमद पीर अब संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम में प्रोजेक्ट मैनेजर के तौर पर काम कर रहे हैं।

ब्रोघिल पर्वत दर्रा चित्राल में सबसे उत्तरी घाटी है और हिंदू कुश पर्वत श्रृंखला को पार करती है। सर्वे के 10 साल बाद शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि ब्रोघिल घाटी में अब करीब 1,190 हेक्टेयर में पीटलैंड है।

हामिद ने बताया कि चित्राल में पीटलैंड की स्थिति को जानने के लिए हाल में कोई मूल्यांकन नहीं किया गया है। पीडब्ल्यूपी ने अपने 2008-2012 के सर्वे से अनुमान लगाया है कि चित्राल जिले में करीब 5000 हेक्टेयर में पीटलैंड है। इसके साथ ही ब्रोघिल, शा जुनाली, गोबोर, करीमाबाद, लासपुर, गोलेन, मेल्प, मदक लुष्ट और गोलेन की घाटियों में पीटलैंड हैं।

Chitral Peatland
ग्राफिक: द् थर्ड पोल

ब्रोघिल नेशनल पार्क दिखाता है चित्राल के पीटलैंड की व्यापक तस्वीर

ब्रोघिल नेशनल पार्क के पूर्व कर्मचारी शफीकुल्लाह खान ने कहा, ”यह मापना मुश्किल है कि क्षेत्र से कितना पीटलैंड गायब हो गया है, लेकिन यह पहले से बहुत कम हो गया है।” ब्रोघिल की लगातार यात्रा करने वाले खान ने द् थर्ड पोल को बताया कि उन्होंने घाटी के गांवों में कई पीटलैंड का विनाश होते देखा है।

मीर ने कहा कि ब्रोघिल में पीटलैंड के महत्व को स्थानीय लोग अभी तक नहीं समझ पाए हैं। सरकार ने भी अभी तक इसे प्राथमिकता नहीं दी है। ब्रोघिल में पीटलैंड का संरक्षण करना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन अभी तक पीट के संरक्षण के लिए कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं किया गया है। मीर ने चेतावनी दी कि अगर पीट लुप्त हो गई तो बड़ी संख्या में लोग घाटी से पलायन करने को मजबूर होंगे।

साल 2010 में ब्रोघिल नेशनल पार्क के पीटलैंड्स को लेकर हुए अध्ययन में मीर के साथी लेखक खुर्शीद अली शाह ने कहा, ‘किसी भी संरक्षण परियोजना को सफल बनाने के लिए जरूरी है कि स्थानीय लोगों को वैकल्पिक ईंधन स्रोत प्रदान किया जाए। डेटा गैप ब्रोघिल और चित्राल में पीटलैंड प्रबंधन के अहम मुद्दों में से एक है।’ बता दें कि खुर्शीद अली शाह अब स्नो लेपर्ड फाउंडेशन में काम करते हैं।

साल 2020 में हुए अध्ययन के लेखकों ने बताया कि पाकिस्तानी हिमालय में हाई एल्टीट्यूड वाले पीटलैंड के वितरण का अभी तक विस्तार से अध्ययन नहीं किया गया है। कठोर जलवायु परिस्थितियों के चलते ब्रोघिल घाटी में हाई एल्टीट्यूड वाले पीटलैंड का ग्राउंड-बेस अध्ययन करना काफी महंगा और मुश्किल है।

हालांकि, बिना किसी डाटा के भी पर्यावरणीय प्रभाव का प्रमाण है। पाकिस्तान मौसम विज्ञान विभाग जलवायु के जिला मौसम विज्ञानी मंजूर अहमद ने द् थर्ड पोल को बताया कि पीटलैंड का तेजी से लुप्त होते जाना चिंताजनक है। पीटलैंड के नुकसान और इसके शीतलन प्रभाव के बारे में उन्होंने कहा कि इससे चित्राल के नाजु़क पारिस्थितिकी तंत्र, जहां 500 से अधिक ग्लेशियर हैं, में तेजी से जलवायु परिवर्तन होगा।

ब्रोघिल नेशनल पार्क के पूर्व कर्मचारी खान ने कहा कि वन्यजीव पीड़ित हैं। क्षेत्र में पनमुर्गी, स्नाइप, प्लोवर और वार्बलर समेत पक्षियों की कई प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि घाटी में घाटी में वर्षों से हिम तेंदुए, भूरे भालू, नीली भेड़ और बनबिलाव नहीं देखे गए हैं।

ब्रोघिल के पूर्व गांव नजीम (प्रमुख) अमीन जान ताजिक ने बताया कि आवास के घटने के चलते याक की आबादी भी घटी है। यहां याक फार्मिंग स्थानीय लोगों के लिए आय का एक प्रमुख स्रोत थी।

कृषि और बुनियादी ढांचे की वजह से समस्याएं बढ़ी

ब्रोघिल और इसके आसपास के व्यापक क्षेत्र में पीटलैंड के विनाश का मुख्य कारण इसका घरों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल होना है। इसके अलावा, पीट को निकालकर कृषि और सड़क निर्माण के लिए भूमि तैयार करना भी एक कारण है। 

ताजिक ने कहा कि पिछले दो से तीन वर्षों के बीच घाटी में कृषि गतिविधियों ने स्थानीय लोगों को पीट निकालने के लिए प्रेरित किया है। उन्होंने आगे कहा कि घाटी के लिए कृषि अपेक्षाकृत नई है और एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ने स्थानीय लोगों को ध्यान इस किया है। एनजीओ ने लोगों को आय के एक जरिये के रूप में सेम, मटर, आलू, टमाटर और अन्य सब्जियां उगाने के लिए उपयुक्त क्षेत्र के रूप में पहचान की।

साल 2019-20 में चित्राल की 12.45% आबादी के पास जरूरत के मुताबिक खाद्य सामग्री नहीं थी। ताजिक कहते हैं कि गरीबी में रहने वाले लोगों ने दिल खोलकर इस आइडिया का स्वागत किया। 10 साल पहले ब्रोघिल घाटी में पीटलैंड के माध्यम से 4×4 का ट्रैक बनाया गया था। इससे वहां की प्राकृतिक छटा पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा, क्योंकि सड़क बनाने के लिए पानी की निकासी की गई थी।

A road cutting through peatland in Broghil Valley, Pakistan, Zahiruddin
साल 2018 में ब्रोघिल घाटी और चित्राल के पीटलैंड्स के बीच से सड़क निर्माण होने की तस्वीर। स्थानीय लोगों का कहना है कि निचले हिस्से के पीटलैंड के सूखने की वजह यह सड़क है। (फोटो: ज़हीरुद्दीन)
Peat blocks being dried in Broghil Valley, Pakistan, Zahiruddin
ब्रोघिल घाटी में सूखाए जा रहे पीट ब्लॉक। (फोटो: ज़हीरुद्दीन)
Peatland being drained in Broghil Valley, Pakistan, Zahiruddin
साल 2018 में सड़क निर्माण के लिए ब्रोघिल घाटी से पीट निकालते हुए। (फोटो: ज़हीरुद्दीन)

इसका नतीजा यह हुआ कि पीटलैंड्स में पानी की आपूर्ति पूरी तरह रोक दी गई, जबकि पीटलैंड के अस्तित्व के लिए साल के 12 महीने पानी की आपूर्ति आवश्यक है। ताजिक ने कहा कि घाटी के बीच से चित्राल को अफगानिस्तान के वाखान बॉर्डर से जोड़ने के लिए 30 किलोमीटर सड़क का निर्माण किया जाना है, जिससे पीट के खेतों को और नुकसान होगा। 

ईंधन के विकल्प की है ज़रूरत

साल 2010 में वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसायटी और यूएनडीपी के अध्ययन में कहा गया कि वन्यजीवों के आवास में गिरावट आई है। साथ ही इसमें चेतावनी भी दी गई कि आगामी 20 से 30 सालों के भीतर पीटलैंड बंजर भूमि बन जाएगी। अमीन बेग का गांव इशकरवार्ज समेत ब्रोघिल घाटी के कुछ गांव के पास के सार्वजनिक पीटलैंड का करीब 90% हिस्सा निकाल चुके हैं। ईंधन की बढ़ती मांग की आपूर्ति के लिए अब वे सरकारी स्वामित्व वाली पीटलैंड में सेंध लगा रहे हैं।

रिसर्च में यह भी कहा गया कि जलती हुई पीट से निकलने वाले धुएं के कारण कई स्थानीय लोगों को सांस संबंधी बीमारियां हो गई हैं।

चित्राल वन्यजीव प्रभाग के वन अधिकारी फारुख नबी ने बताया कि इस साल पीट की मांग को कम करने के लिए ब्रोघिल क्षेत्र के सात गांवों में परिवारों को प्रेशर कुकर वितरित किए गए। प्रेशर कुकर में खाना जल्दी पक जाता है, जिससे ईंधन भी कम खर्च होगा। उन्होंने आगे बताया कि अगा खान ग्रामीण सहायता कार्यक्रम के जरिये घाटी में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत पर काम हो रहा है। इसके तहत लोगों को मुफ्त बिजली प्रदान करने के लिए तीन सूक्ष्म जल विद्युत स्टेशन लगाने की योजना बनाई जा रही है।

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