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वन संरक्षण में मदद करते हैं वन गुज्जर, लेकिन अधिकारों से वंचित हैं

उत्तराखंड में एक चरवाहा समुदाय- वन गुज्जर- जलवायु परिवर्तन के लिहाज से बेहद अहम है, लेकिन वन प्रबंधन में उनकी भूमिका उन अधिकारों की वजह से सीमित है, जिनसे उन्हें वंचित कर दिया गया है।
<p>उत्तराखंड में राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के अंदर वन गुज्जर खत्ता (घर) (फोटो: रोबर्टो निस्त्री / अलामी)</p>

उत्तराखंड में राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के अंदर वन गुज्जर खत्ता (घर) (फोटो: रोबर्टो निस्त्री / अलामी)

वन गुज्जर समुदाय के एक नेता मोहम्मद साफी कहते हैं, “वन गुज्जरों को जंगलों से हटाओ…और सभी जानवर प्यास से मर जाएंगे।” वन गुज्जर प्राकृतिक झरनों से सुट्टा (छोटा तालाब) बनाते हैं, जो उनके मवेशियों और जंगली जानवर, दोनों को जीवित रहने के लिए गर्मी के महीनों में बेहद जरूरी पानी उपलब्ध कराते हैं। 55 वर्षीय साफी इस पारंपरिक चरवाहा समुदाय की उस जमीन को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालते हैं, जिस पर वे रहते हैं। पड़ोसी राज्यों या उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में अपने मवेशियों के साथ मौसमी प्रवास करने वाले वन गुज्जर अपने आसपास के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के साथ परस्पर निर्भरता का प्रतीक हैं।

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मोहम्मद साफी: “वन गुज्जरों को जंगलों से हटाओ… और सभी जानवर प्यास से मर जाएंगे।” (फोटो: सुष्मिता)

जैसे-जैसे जलवायु प्रभाव तीव्र होते जा रहे हैं, पारिस्थितिकी तंत्र के प्रबंधन में वन गुज्जरों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण एवं चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। हिमालयी राज्य उत्तराखंड जलवायु-प्रेरित आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, जिसे सरकार ने एक दशक से भी अधिक समय पहले अपनी जलवायु कार्य योजना में उजागर किया था। जैसे-जैसे आपदाएं बढ़ीं, दूध उत्पादन और क्षेत्र के प्रचुर जंगलों और घास के मैदानों पर अपनी निर्भरता के कारण वन गुज्जरों ने खुद को अग्रिम पंक्ति में पाया। 2023 की विनाशकारी बाढ़ ने उन पर गंभीर प्रभाव डाला। बाढ़ ने उनके मवेशियों और आजीविका को नष्ट कर दिया। भूस्खलन के कारण राज्य भर में 100 लोगों की मौत हो गई।

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वन गुज्जर समुदाय के सदस्य बाढ़ से मुख्य सड़क को हुए नुकसान का सर्वेक्षण करते हुए (फोटो: सुष्मिता)

उत्तराखंड में जंगलों की आग भी एक बढ़ती हुई चिंता का विषय है। इसकी संख्या 2002 में 922 थी जो बढ़कर 2019 में 41,600 हो गई। एक युवा संगठन, वन गुज्जर आदिवासी युवा संगठन (वीजीटीवाईएस) के अध्यक्ष अमीर हमजा के अनुसार, “जंगल की आग का हमारे समुदायों पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि जंगल की आग घास के मैदानों के बड़े हिस्से को नष्ट कर देती है, जिन्हें हमारे मवेशी चरते हैं। बीजों के वितरण के लिए महत्वपूर्ण पक्षी, जंगल की आग के कारण अपना आवास खो देते हैं, जिससे क्षेत्र में घास का पुनर्जनन प्रभावित होता है।”

जलवायु परिवर्तन के कारण राज्य भर में झरने भी सूख रहे हैं, जिससे यह समुदाय गर्मियों में महत्वपूर्ण जल स्रोतों से वंचित हो रहा है। उनका कहना है कि पहले इन झरनों पर अद्वितीय जैव विविधता से भरपूर हरे-भरे चरागाह उपलब्ध कराने के लिए भरोसा किया जा सकता था।

मान्यता और अधिकार

जलवायु आपदाएं समुदाय पर भारी असर डालती हैं। बाढ़, जंगल की आग और घटते जल स्रोतों के बीच संबंधों को पहचानने और संबोधित करने में राज्य की विफलता ने अपर्याप्त मुआवजे के साथ ही समस्या को और बढ़ा दिया है।

सेंटर फॉर पेस्टोरलिज्म के अनिरुद्ध शेठ, जनगणना वर्गीकरण की अपर्याप्तता पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं, “जनगणना के आंकड़े उन्हें चरवाहों के रूप में वर्गीकृत नहीं करते हैं। ज्यादातर डाटा में उनके नाम के आगे पशुपालन का उल्लेख है। आंकड़ा यह नहीं बताता कि वे भटक रहे हैं या व्यवस्थित हैं। यहां तक कि पशुधन जनगणना भी मवेशियों को घुमंतू श्रेणी में नहीं रखती है।”

पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश के विपरीत, जहां वन गुज्जरों को भारतीय संविधान के तहत अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता प्राप्त है, उत्तराखंड में उन्हें अन्य पिछड़ी जाति (ओबीसी) के रूप में पहचाना जाता है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को छोड़कर जाति के आधार पर जनसंख्या की गणना करने वाली आखिरी भारतीय जनगणना 1931 में की गई थी, इसलिए ओबीसी के रूप में वर्गीकृत लोगों की सटीक संख्या आधिकारिक जनगणना रिपोर्ट में प्रतिबिंबित नहीं होती है। हमजा का अनुमान है कि उत्तराखंड में वन गुज्जरों की आबादी 60,000 से 70,000 के बीच है, जो उनके मुताबिक, हिमाचल प्रदेश और जम्मू एवं कश्मीर की तुलना में काफी कम है, जहां अनुमान क्रमशः 92,000 और 980,000 के बीच है।

गुज्जरों के घरों को खत्ता कहा जाता है, जिनकी छतें आमतौर पर प्लास्टिक या टिन की चादरों से बनी होती हैं। उनके घरों को अक्सर ‘अतिक्रमण’ के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जो अपनी जमीन पर उनके अधिकारों की मान्यता की कमी को दर्शाते हैं। रामनगर डिवीजन की उप-विभागीय अधिकारी पूनम कैंथोला ने बताया,  “वन गुज्जरों ने अपने सीमांकित क्षेत्र के आसपास अनुमति प्राप्त भूमि पर अतिक्रमण कर लिया है। विभाग ने उन्हें बेदखल करने के लिए समय-समय पर उचित कार्रवाई की है।” 

हालांकि कई रिकॉर्ड से पता चलता है कि समस्या की कई परतें हैं। उत्तराखंड में लंबे समय से उपस्थिति के बावजूद, वन गुज्जरों को लगातार खतरों का सामना करना पड़ता है। अक्सर विशिष्ट संरक्षण नीतियों की आड़ में या वृक्षारोपण और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए उनको खतरों का सामना करना पड़ता है।

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चरागाह भूमि पर वन विभाग द्वारा वृक्षारोपण (फोटो: सुष्मिता)

उत्तराखंड के वन विभाग के मुख्य वन संरक्षक मनोज चंद्रन कहते हैं, “यदि लोगों को स्थायी रूप से बसाया जाता है, तो वन क्षेत्र को राजस्व गांव में परिवर्तित किया जा सकता है। अगर उन्हें राजस्व गांवों में बदल दिया जाता है, केवल तभी वे सरकारी योजनाओं से लाभान्वित हो सकते हैं।” नागरिक समाज संगठन समाजवादी लोक मंच के संयोजक मुनीश कुमार कहते हैं कि अकेले रामनगर डिवीजन में दो दर्जन से अधिक वन बस्तियां हैं, जहां लोगों को पानी और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। शेठ बताते हैं कि मान्यता की यह कमी सीधे मुआवजे से जुड़ी है, क्योंकि “यदि आप अपना स्वामित्व साबित नहीं कर सकते हैं, तो क्षतिपूर्ति देना मुश्किल है।”

विशेष रूप से महिलाओं की शिक्षा तक सीमित पहुंच एक अतिरिक्त चुनौती है। समुदाय के कई सदस्यों के पास औपचारिक शिक्षा का अभाव है, क्योंकि खत्तों के पास बहुत कम सरकारी स्कूल हैं, जिसके चलते सरकार में प्रतिनिधित्व सीमित है। वीजीटीवाईएस के नेता मोहम्मद इशाक कहते हैं, ”कोई भी सरकारी नौकरियों में कार्यरत वन गुज्जरों की संख्या उंगलियों पर गिन सकता है।” कथियारी गांव की 20 वर्षीय शिक्षिका नगमा भड़ाना कहती हैं, “मैं अपने गांव की एकमात्र महिला हूं, जिसने बीएससी किया है। ज्यादातर लड़कियां पढ़ी-लिखी नहीं हैं।” वह कहती हैं, शिक्षा के बिना महिलाओं के लिए नेतृत्व की भूमिका निभाना कठिन है, जिसकी सख्त जरूरत है। वह कहती हैं, “चूंकि हमारे गांवों में गैस सिलेंडर नहीं हैं, इसलिए महिलाओं को ईंधन के लिए लकड़ी इकट्ठा करने के लिए जंगलों में जाना पड़ता है।”

महिलाओं का स्वास्थ्य, खासकर गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य विशेष रूप से प्रभावित होता है, क्योंकि निकटतम अस्पताल अक्सर 15-20 किलोमीटर दूर होते हैं। वह कहती हैं, “एम्बुलेंस हमारे गांवों में आने से मना कर देती हैं, क्योंकि वहां सड़कें नहीं हैं। अधिकांश बच्चों का जन्म घर पर ही होता है। ज्यादातर महिलाओं ने कभी भी अपने रक्त की जांच नहीं कराई है या अल्ट्रासाउंड नहीं कराया है, तब भी जब उन्हें इसकी आवश्यकता थी। अक्सर महिलाएं अस्पताल जाते हुए खुले मैदान में बच्चे को जन्म देती हैं।” 

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लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकाती वन गुज्जर महिलाएं (फोटो: सुष्मिता)

हालांकि, पिछले पांच वर्षों में समुदाय के सामूहिक प्रयासों के कारण सुधार के संकेत मिले हैं। भड़ाना कहती हैं, “हम [अब] बच्चों, विशेषकर लड़कियों को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करते हैं और उनको सम्मानित करते हैं, जिन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर ली है।”

वन में गुम : बहिष्कार और राज्य

वर्ष 2006 के वन अधिकार अधिनियम ने एक संभावित समाधान पेश किया था। वनवासियों को उनकी पारंपरिक भूमि पर अधिकार देने का इरादा समुदाय को सशक्त बना सकता था। इसके बजाय, उत्तराखंड के खराब कार्यान्वयन ने वन गुज्जरों को हाशिये पर डाल दिया है। भारत की संसद के ऊपरी सदन यानी राज्यसभा में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों से पता चला कि उत्तराखंड ने अधिकांश दावों को खारिज कर दिया था। 30 नवंबर, 2022 तक क्रमशः 3,587 और 3,091 दावों में से केवल 184 व्यक्तिगत दावों और 1 सामुदायिक अधिकार दावे को स्वीकार किया गया, जिसके परिणामस्वरूप अधिनियम के तहत वन भूमि का शून्य निपटान हुआ। व्यक्तिगत दावे व्यक्तियों के अधिकारों को स्वीकार करते हैं, सामुदायिक दावे साझा भूमि पर अधिकारों तक विस्तारित होते हैं। इनमें दफनाने, पूजा करने, पीने के पानी के स्रोतों तक पहुंच और बहुत से अधिकार शामिल हैं।

वन गुज्जरों को वन प्रबंधन में उनके अनुभव के बावजूद जंगलों से संबंधित मुद्दों पर परामर्श से प्रभावी रूप से बाहर रखा गया है।

हमजा कहते हैं, “हम हर साल अपना पारंपरिक सेला [हरा] त्योहार मनाते हैं, जहां समुदाय के सभी लोग अपने पारंपरिक पेड़ लगाते हैं और विभिन्न पौधों के बीज लाते हैं।” वन अधिकारियों को निमंत्रण भेजा जाता है, “हालांकि, एक भी (जिला वन कार्यालय) स्तर का अधिकारी (कभी) नहीं आया है।”

श्यामपुर में भैंसों के सबसे बड़े झुंड के मालिक मुस्तफा लोढ़ा बताते हैं कि कैसे उनके झुंड की भैंसों की एड़ी में फंसे बीज जंगल के पुनर्जनन में मदद करते हैं। समुदाय के नेता, वनों और जैव विविधता के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण पारंपरिक प्रथा लॉपिंग का भी हवाला देते हैं, क्योंकि यह पशुओं के लिए चारा प्रदान करता है और हमजा के अनुसार, हिरण जैसे अन्य वन जानवरों को आकर्षित करता है। लेकिन वन अधिकारियों के साथ औपचारिक रूप से जुड़ने का कोई रास्ता नहीं होने के कारण उनकी समझ को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

लॉपिंग क्या है ?

लॉपिंग, छंटाई का एक चरम रूप है। आमतौर पर कृषि और संरक्षण (कंजर्वेशन) उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाता है। विकास को नियंत्रित करने, पेड़ के आकार में सुधार करने और लकड़ी की कटाई में मदद करता है।

स्थानीय संरक्षण में वन गुज्जरों के योगदान को पहचानने में राज्यों की विफलता को उजागर करते हुए हमजा कहते हैं, “क्या सरकार ने [कभी] पूछा है कि इन जंगलों में जानवर कैसे बचे हैं? हमने इसकी जैव विविधता को फलने-फूलने में मदद की। लेकिन हमें इसका कोई श्रेय नहीं दिया गया। इसके बजाय हमारे अधिकारों को मान्यता नहीं दी जाती है और हमें किनारे कर दिया जाता है।”

वह सवाल करते हैं कि क्या नौकरशाही की कागजी कार्रवाई, अनिवार्य रूप से उनके निष्कासन का कारण बनेगी और मुझे इस भूमि से बाहर निकाल दिया जाएगा?”

यह कहानी पुलित्जर सेंटर द्वारा समर्थित है। 

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