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हिमालयी बायोडाइवर्सिटी को बचाना पेचीदा है: वन्यजीव पर 2022 में द् थर्ड पोल की ख़ास स्टोरीज़

यहां पढ़िए साल 2022 में हिमालय और दक्षिण एशिया में प्रकृति और वाइल्डलाइफ संरक्षण की जटिलता को गहराई से समझाने वाली हमारी स्टोरीज़।
<p>हिमालय की थ्रश मूल की एक प्रजाति ग्रैंडाला (फोटो: नेचर पिक्चर लाइब्रेरी / अलामी)</p>

हिमालय की थ्रश मूल की एक प्रजाति ग्रैंडाला (फोटो: नेचर पिक्चर लाइब्रेरी / अलामी)

साल 2022 के अंत तक जैव विविधता यानी बायोडाइवर्सिटी सुर्खियों में आ चुकी है। मॉन्ट्रियल, कनाडा में हुए एक वैश्विक शिखर सम्मेलन में एक “ऐतिहासिक” सौदा किया गया कि साल 2030 तक बायोडाइवर्सिटी के नुकसान की भरपाई करनी है। कुछ विशेषज्ञों ने इसे “प्रकृति के लिए पेरिस समझौता” कहा है। संरक्षणवादियों को उम्मीद है कि बायोडाइवर्सिटी CoP15 पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के नतीजें महिलाओं और स्वदेशी समुदायों को सशक्त बनाते हुए बायोडाइवर्सिटी संरक्षण की लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा को फिर से स्थापित करेंगे।

लेकिन बायोडाइवर्सिटी के ख़तरे के बारे में बात करना एक बहुत बड़ी चुनौती है। बात सिर्फ़ कुछ गिने हुए प्रतिष्ठित प्रजातियों के संरक्षण की नहीं है। असलियत में ” साल 2050 तक प्रकृति के साथ सद्भाव में रहने” के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें समझना होगा कि हम क्या और कैसे बदलाव करते हैं। इकोसिस्टम को कैसे मापा जाए और संरक्षित किया जाए; और इस बात पर ज़ोर देना होगा कि किसी भी फ़ैसले में किन लोगों के ज्ञान और दृष्टिकोण पर हमें ज़्यादा ध्यान देना है।

इस साल द् थर्ड पोल ने हिमालय और दक्षिण एशिया में बायोडाइवर्सिटी के अपने कवरेज में इन जटिलताओं पर ध्यान दिया है और कठिन सवाल पूछे हैं। साथ रहने वाले लोगों की सुरक्षा, सलामती और आजीविका को ध्यान में रखते हुए हम अपैक्स प्रेडेटर्स की रक्षा कैसे कर सकते हैं?  हम यह कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि स्थानीय समुदाय वन्य संसाधनों से लाभान्वित हो सके लेकिन जंगलों के संसाधन का उपयोग टिकाऊ हो? यह घोषित करने का क्या मतलब है कि एक प्रजाति हमेशा के लिए ख़त्म हो चुकी है?

यहां हम 2022 के जैव विविधता यानी बायोडाइवर्सिटी और प्रकृति के अपने कुछ बेहतरीन कवरेज पर प्रकाश डाल रहे हैं।

नेपाल के एवरेस्ट में हिमालयी भेड़ियों की दहशत

A Himalayan or Tibetan wolf
भारत के सिक्किम में एक हिमालयी या तिब्बती भेड़िया। इनके ऊपर बहुत कम स्टडीज़ हुए हैं और नेपाल के एवरेस्ट क्षेत्र में इनकी संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। (फोटो: सूशी चिकाने / अलामी)

रमेश भुसाल, जून

नेपाल के सागरमाथा (एवरेस्ट) नैशनल पार्क में 2020 के मध्य और 2021 के मध्य के बीच 300 से अधिक लाइवस्टॉक जंगली जानवरों द्वारा मारे गए। इनमें से 70% से अधिक हिमालयी भेड़ियों द्वारा मारे गए थे जो नेपाल के सबसे कम जाने हुए जंगली जानवरों में से एक।

वैज्ञानिक फ़िलहाल नहीं जानते कि नेपाल के पहाड़ों में कितने हिमालयी भेड़िये रहते हैं। नेपाल के एवरेस्ट क्षेत्र के कई निवासियों का मानना ​​है कि उनकी आबादी पिछले कुछ सालों में बढ़ी है। वो समझते हैं कि इसका 2014 में तिब्बत से आए 30 याक से संबंध है। वे कहते हैं कि भेड़ियों के झुंड ने पहाड़ों पर अपनी यात्रा पर इन जानवरों का पीछा किया।

यह साफ़ है कि नेपाल के उच्च-पहाड़ी भेड़ियों का चरवाहों के साथ संघर्ष को संबोधित करना भेड़ियों के संरक्षण के लिए ज़रूरी होगा। लेकिन फ़िलहाल, भेड़ियों के व्यवहार और पशुधन के साथ उसके व्यवहार पर ज़रूरी डेटा की कमी है। इससे ये साबित होता है कि किसी भी तरह के हस्तक्षेप की कमी है। हिमालय के भेड़िये के रहस्यों को उजागर करने और नेपाल में भेड़ियों के भविष्य को सुरक्षित करने के इस गैप को भरना ज़रूरी है।

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बदलते लैंडस्केप और बच्चों के बीच बढ़ता डर: कश्मीर में मानव-वन्यजीव संघर्ष

आक़िब फ़याज़ और दानिश क़ाज़ी, अक्टूबर

इस साल जून में, आठ साल की बच्ची इकरा जान पर उत्तरी कश्मीर में उसके घर के पास एक तेंदुए ने हमला किया था। वो ख़ुशक़िस्मत थी कि उसकी जान बच गई, उसी तेंदुए ने हाल ही में पास के दो बच्चों को मार डाला था।

यह दुखद कहानी कश्मीर में पर्वतीय समुदायों द्वारा सामना की जाने वाली एक गंभीर समस्या को दर्शाती है: जैसे-जैसे भूमि-उपयोग के पैटर्न बदलते हैं, मनुष्य खतरनाक वन्यजीवों के संपर्क में आ रहे हैं, जिसमें अक्सर शामिल लोगों और जानवरों दोनों के लिए विनाशकारी अंजाम होते हैं। वाइल्डलाइफ विभाग और समुदायों के ठोस प्रयासों की बदौलत हाल के कुछ सालों में मौतों की संख्या में कमी आई है।  समस्या का मूल कारण है निवास स्थान का विनाश। ये हालात और भी बिगड़ रहे हैं।

यह फिल्म कई दृष्टिकोणों से इस मुद्दे की पड़ताल करती है। इसमें समस्या वाले जानवरों को पकड़ने वार्डन के साथ-साथ वन्यजीव संरक्षणवादियों और नीति-निर्माताओं को दिखाया गया है, जो वन्यजीव आवास और कश्मीर के लोगों की बेहतर सुरक्षा के लिए काम कर रहे हैं।

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फिशिंग कैट के अस्तित्व पर संकट: एशिया के वेटलैंड की जंगली बिल्ली को बचाने के लिए शोधकर्ताओं के प्रस्ताव

fishing cat in crouched posture stepping onto rock
दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया की एक दुर्लभ जंगली बिल्ली फिशिंग कैट को हैबिटैट लॉस और प्रतिशोध में होने वाली हत्या से खतरा है। (फोटो: फेलिक्स चू / अलामी)

ऋचा मल्होत्रा, अक्टूबर

केवल वेटलैंड्स में पाए जाने वाली हल्के झिल्लीदार पंजे वाली फिशिंग कैट दुर्लभ हो चुकी है और शायद ही कभी देखी जाती है। इसकी कुल जनसंख्या की जानकारी उपलब्ध नहीं है। मछली पकड़ने वाली यह बिल्ली विलुप्त होने की कगार पर है क्योंकि इसको कई तरह के खतरों का सामना करना पड़ रहा है।  ऐसा इसलिए क्योंकि इन्हें मछली चुराने वाला जानवर समझा जाता है और ये अक्सर मछली पकड़ने वाले जाल को बर्बाद कर देती हैं। कुछ अन्य इलाक़ों में मांस के लिए इनका शिकार किया जाता है। पूरे एशिया की फिशिंग कैट्स की रेंज में इनके लिए एक आम खतरा इनके हैबिटेट यानी प्राकृतिक वास का नुकसान है। ये स्थिति अन्य बायोडाइवर्सिटी के हालतों में भी नज़र आता है।

फिशिंग कैट्स का अध्ययन करने वाले शोधकर्ता इस बात पर ज़ोर देते हैं कि इसका अस्तित्व इसके आर्द्रभूमि पर्यावास की सुरक्षा और बहाली पर टिका है। इसके अलावा, लोगों का इनके साथ शांतिपूर्ण तरीक़े से रहना भी ज़रूरी है। इनके अस्तित्व को बचाने के लिए कई परियोजनाएं चल रही हैं। फिशिंग कैट के ज्ञात वितरण के तकरीबन 40 फीसदी का प्रतिनिधित्व करते हुए भारत, इस प्रजाति के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।

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तस्करी के चलते विलुप्त हो रहा भारत का सबसे खूबसूरत कछुआ

Illustration of Indian star tortoises in the wild, Kabini Amin
इलस्ट्रेशन: काबिनी अमीन / द् थर्ड पोल

रेबेका एल रूट, फरवरी

बायोडाइवर्सिटी एक बड़ा ख़तरा तस्करी है। भारतीय स्टार कछुआ दुनिया के सबसे खूबसूरत कछुओं में से एक है। इसका नाम इसके पीले और काले खोल पर स्टार जैसे पैटर्न के लिए रखा गया है। लेकिन ये सुंदरता इसकी कमज़ोरी बन चुका है क्योंकि दक्षिणपूर्व एशिया, यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका में इस प्रजाति की तस्करी की जाती है।

भारतीय स्टार कछुआ भारत, श्रीलंका और पाकिस्तान के मूल निवासी है। ये वैश्विक वन्यजीव व्यापार समझौते CITES के तहत संरक्षित है। 2019 में, इस प्रजाति के अंतर्राष्ट्रीय कमर्शियल व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। लेकिन इसके बावजूद, तस्करी जारी है। भारत में 2020 और 2021 के दौरान 24 घटनाओं में कम से कम 3,500 स्टार कछुओं को ज़ब्त किया गया है। सब्जियों के कार्टन, सूटकेस और कई बक्सों में कसकर पैक किए गए, कई कछुए यात्रा में जीवित नहीं रहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कानूनी खामियां और कड़े नियमों की कमी ऐसे दो वजह हैं जो व्यापार को जारी रखने में मदद करते हैं। वो इस बात पर ज़ोर देते हैं कि सामान्य तौर पर रिपटाइल में वैश्विक व्यापार की निगरानी की कमी कई प्रजातियों को खतरे में डाल रही है।

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कमेंट्स (1)

जोशीमठ जैसी आपदा जो हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र गड़बड़ा सकती है, को रोकने के लिए सक्रिय प्रयास की आवश्यकता है।
क्या इसका कोई रोड मैप है

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