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क्या है CITES और दक्षिण एशिया के लिए यह क्यों मायने रखता है?

नवंबर में दुनिया भर की सरकारें पनामा में वन्यजीव व्यापार पर एक बड़ी बैठक करने जा रही हैं। साइटीज़ कॉप19 के दौरान दक्षिण एशिया के लिहाज़ से महत्वपूर्ण बिंदुओं पर एक नज़र।
<p dir="ltr">भारत से लेकर इंडोनेशिया तक के जंगलों में पाई जाने वाली, गीत गाने के लिए मशहूर पक्षी सफेद पूंछ वाली शमा के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को विनियमित करने का एक प्रस्ताव पनामा में आगामी साइटीज़ कॉप 19 बैठक के लिए प्रस्तुत किया गया है। (फोटो: शिह-हाओ लाओ/अलामी)</p>

भारत से लेकर इंडोनेशिया तक के जंगलों में पाई जाने वाली, गीत गाने के लिए मशहूर पक्षी सफेद पूंछ वाली शमा के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को विनियमित करने का एक प्रस्ताव पनामा में आगामी साइटीज़ कॉप 19 बैठक के लिए प्रस्तुत किया गया है। (फोटो: शिह-हाओ लाओ/अलामी)

CITES क्या है?

CITES एक ऐसा समझौता है जो जंगली जानवरों और पौधों की कुछ प्रजातियों की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार आवाजाही को नियंत्रित करता है। CITES की वजह से ही कई हाई-प्रोफाइल वन्यजीव उत्पादों – जैसे कि बिग कैट की खाल, हाथी के दांत और गैंडे के सींग – के अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक व्यापार पर प्रतिबंध लग गया है। 

साइटीज़ या सीआईटीईएस (या वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन) 1975 में 10 हस्ताक्षरकर्ता राज्यों (या पक्षकारों) के साथ अस्तित्व में आया। तब से, यूरोपीय संघ सहित दुनिया के लगभग हर देश ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं। CITES के पास मौजूदा समय में 184 पार्टीज़ हैं।

CITES CoP19 कब और कहां आयोजित किया जाएगा?

पनामा सिटी में 14 से 25 नवंबर 2022 के बीच CITES के पार्टीज़ का 19वां सम्मेलन – या कॉप 19 – आयोजित किया जाएगा। कन्वेंशन की स्टैंडिंग कमिटी की बैठकें भी कॉप 19 के ठीक पहले और बाद में वहीं पनामा सिटी में होंगी।

CITES एपेंडिसेस या परिशिष्ट क्या हैं?

CITES तीन परिशिष्टों या अपेंडिसेस में जंगली पौधों और जानवरों की प्रजातियों को बांटता है।

अपेंडिक्स I उन प्रजातियों के लिए है जिनके विलुप्त होने का खतरा है, और निरंतर व्यापार उनके अस्तित्व के लिए एक मौजूदा या संभावित खतरा है। इन प्रजातियों में से किसी की भी अंतरराष्ट्रीय आवाजाही या उनसे बने उत्पादों के निर्यात और आयात करने वाले दोनों देशों से परमिट की आवश्यकता होती है। कमर्शियल उद्देश्यों के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार की आमतौर पर अनुमति नहीं है। अपेंडिक्स I में वर्तमान में पौधों और जानवरों की 1,082 प्रजातियां हैं।

अपेंडिक्स II में वे प्रजातियां शामिल हैं जिनके निकट भविष्य में लुप्त होने का खतरा तो नहीं है लेकिन ऐसी आशंका है कि अगर इन प्रजातियों के व्यापार को सख्त तरीके से नियंत्रित नहीं किया गया तो ये लुप्तप्राय की श्रेणी में आ सकती हैं। व्यवहार में, अपेंडिक्स II में कई अत्यधिक लुप्तप्राय प्रजातियां शामिल हैं। अब तक का यह सबसे बड़ा साइटीज़ अपेंडिक्स है, जिसमें 37,420 प्रजातियां शामिल हैं। इनमें से अधिकांश पौधे हैं। साइटीज़ के तहत इन प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय कमर्शियल व्यापार की अनुमति है, लेकिन निर्यात करने वाले देश से परमिट की आवश्यकता होती है। यह निर्धारित करने के बाद अनुमति दी जाती है कि अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक व्यापार से निर्यात की जाने वाली प्रजातियों के अस्तित्व को नुकसान नहीं पहुंचेगा और नमूने कानूनी रूप से प्राप्त किए गए हैं।  

अपेंडिक्स III का उपयोग तब किया जाता है जब कोई खास देश, किसी खास प्रजाति के व्यापार को विनियमित करना चाहता है। अपेंडिक्स I और II में किसी प्रजाति को शामिल करने के लिए कॉप के दो-तिहाई समझौते की आवश्यकता होती है, जबकि अपेंडिक्स III में कोई देश एकतरफा प्रजातियों को जोड़ सकता है। उस प्रजाति को देश से निर्यात करने के लिए निर्यात परमिट की आवश्यकता होती है।

जंगली जानवरों और पौधों की प्रजातियों की एक भारी संख्या किसी भी CITES अपेंडिक्स में शामिल नहीं हैं।इनमें से कई प्रजातियां ऐसी हैं जो खतरे में हैं।

CITES CoP क्यों आयोजित होता है?

CITES कॉप में सभी सदस्य राज्य कन्वेंशन बुलाते हैं ताकि वो अपेंडिसेस में परिवर्तन कर सके या कोई निर्णय ले सके या इस चीज़ की समीक्षा कर सके कि कन्वेंशन को कैसे लागू किया जा रहा है।

CITES कॉप में निर्णयों और प्रस्तावों को अपनाया और संशोधित किया जाता है जो कन्वेंशन को लागू करने में पक्षकारों और साइटीज़ सचिवालय का मार्गदर्शन करते हैं। इन निर्णयों में विभिन्न वन्य जीव प्रजातियों के व्यापार और संरक्षण की स्थिति में अध्ययन और समीक्षाएं शामिल हो सकती हैं।

अगर कोई देश CITES नियमों का पालन नहीं करता है तो क्या होगा?

कन्वेंशन टेक्स्ट में पक्षकारों को कन्वेंशन को लागू करने के लिए “उचित उपाय करने” और “उसके उल्लंघन पर स्पेसिमेंस के व्यापार को प्रतिबंधित करने” की बात है। कन्वेंशन को लागू करने के लिए इन उपायों में घरेलू कानून होना, अवैध रूप से व्यापार किए गए वन्यजीवों को जब्त करना और CITES-सूचीबद्ध वन्यजीवों के अवैध व्यापार, या तस्करी को दंडित करना शामिल है।

यदि कोई देश CITES नियमों का पालन करने में लगातार विफल होता पाया जाता है, तो अन्य पक्षकारों द्वारा उस देश के लिए कुछ या सभी CITES-सूचीबद्ध प्रजातियों में व्यापार को निलंबित करने के लिए एक सिफारिश जारी किया जा सकता है।

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दक्षिण एशिया की मूल पेड़ प्रजाति उत्तर भारतीय शीशम। भारत और नेपाल इसे CITES CoP में अपेंडिक्स II से हटाने का प्रस्ताव कर रहे हैं। (फोटो: बिजय चौरसिया / विकिमीडिया)

CITES CoP19 के एजेंडे में कौन सी दक्षिण एशियाई प्रजातियां हैं?

सफेद पूंछ वाली शमा

मलेशिया और सिंगापुर ने सफेद पूंछ वाली शमा को अपेंडिक्स II में शामिल करने के लिए CITES CoP19 को एक साथ प्रस्ताव पेश किया है।लंबी पूंछ वाली सफेद पूंछ वाली शमा प्रसिद्ध मैगपाई-रॉबिन की रिश्तेदार है। ये भारत और नेपाल से लेकर बोर्नियो तक, दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया के अधिकांश हिस्सों में पाई जाती है। खूबसूरत गीत गाने वाली इस प्रजाति की पिंजरे में रखे जाने वाली प्रजातियों के व्यापार में काफी मांग है। यह मांग विशेष रूप से इंडोनेशिया में है। वैश्विक स्तर पर अभी इसको खतरे की स्थिति में नहीं माना गया है। प्रस्ताव में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि दक्षिण पूर्व एशिया में पिंजरे में रखे जाने वाले पक्षियों के व्यापार की वजह से इनको पकड़ा जाता है जिससे इनकी आबादी घटती जा रही है। और कुछ विशिष्ट उप-प्रजातियां अत्यधिक खतरे में हैं या विलुप्त भी हो चुकी हैं।

प्रस्ताव में चेतावनी दी गई है कि इंडोनेशिया में मुख्य मांग केंद्रों के पास सफेद पूंछ वाली शमा की आबादी तेजी से कम हो रही है। सीमा पार तस्करी के मामलों की बढ़ती संख्या से संकेत मिलता है इसको पकड़ने वाले शिकारी कहीं और भी इस प्रजाति को खोज रहे हैं। प्रस्ताव को पहले से ही नेपाल और थाईलैंड सहित उन देशों से समर्थन मिला है जहां ये प्रजाति जंगलों में रहती हैं।

स्ट्रॉ-हेडेड बुलबुल

मलेशिया, सिंगापुर और अमेरिका द्वारा पेश किया गया यह प्रस्ताव CITES अपेंडिक्स II से स्ट्रॉ-हेडेड बुलबुल को हटाकर अपेंडिक्स I में रखने की मांग करता है। अपेंडिक्स II में होने से परमिट के साथ इसके अंतर्राष्ट्रीय कमर्शियल व्यापार की अनुमति है लेकिन अपेंडिक्स I में आ जाने से इस तरह के व्यापार पर प्रतिबंध लग जाएगा। दुनिया की सबसे बड़ी बुलबुल, स्ट्रॉ-हेडेड बुलबुल, को दक्षिण पूर्व एशिया के पिंजरे के पक्षी व्यापार में एक अत्यधिक वांछनीय प्रजाति माना जाता है। सफेद पूंछ वाली शमा की तरह, स्ट्रॉ-हेडेड बुलबुल भी बहुत सुंदर गीत गाने के लिए जानी जाती है। इसी विशेषता ने इसको विलुप्त होने के कगार पर पहुंचा दिया है।

एक समय म्यांमार से लेकर जावा तक में पाई जाने वाली इस प्रजाति के बारे में माना जाता है कि अब इनकी वयस्क आबादी 1,700 से भी कम बची है जो ज्यादातर मलेशिया और सिंगापुर के जंगलों में हैं। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) ने स्ट्रॉ-हेडेड बुलबुल को गंभीर रूप से संकटग्रस्त माना है। 

स्ट्रॉ-हेडेड बुलबुल 1997 से साइटीज़ अपेंडिक्स II में सूचीबद्ध है। ये जहां भी पाई जाती थी, उनमें से अधिकांश स्थानों में इनकी आबादी घटकर शून्य की तरफ जा रही है, ऐसे में प्रस्ताव का तर्क है कि इसका व्यापार इसे विलुप्त कर सकता है। इस प्रस्ताव को पहले ही थाईलैंड और म्यांमार के साथ-साथ CITES सचिवालय का समर्थन प्राप्त हो चुका है।

The straw-headed bulbul is close to extinction in Indonesia
स्ट्रॉ-हेडेड बुलबुल इंडोनेशिया में विलुप्त होने के करीब है। पिंजरे में बंद पक्षियों का व्यापार करने वाली लॉबी के दबाव के बाद हटाए जाने से पहले इंडोनेशिया में 2018 में इसको संरक्षित प्रजातियों की सूची में संक्षेप में जोड़ा गया था। (फोटो: अलामी)

सियामी मगरमच्छ

सियामी मगरमच्छ जंगलों में गंभीर रूप से संकटग्रस्त है। लेकिन कंबोडिया, थाईलैंड और वियतनाम में व्यावसायिक रूप से इनका व्यापक प्रजनन करवाया जाता है। वर्तमान में यह CITES अपेंडिक्स I में सूचीबद्ध है। पंजीकृत कैप्टिव-ब्रीडिंग कार्यों के लिए छूट के कारण व्यावसायिक रूप से इनका प्रजनन कराने वाले कुछ केंद्रों को इनकी प्रजातियों से बने उत्पादों का निर्यात करने की अनुमति है। 

लेकिन थाईलैंड के एक प्रस्ताव में जंगली प्रजातियों के लिए ‘जीरो एक्सपोर्ट कोटा’ के साथ देश की प्रजातियों की आबादी को अपेंडिक्स I से अपेंडिक्स II में स्थानांतरित करने की बात की है। इसका मतलब यह होगा कि थाईलैंड को अब सियामी मगरमच्छों से बने उत्पादों के निर्यात के लिए प्रजनन फैसिलिटीज को पंजीकृत करने के नियमों का पालन नहीं करना पड़ेगा।

थाईलैंड के प्रस्ताव का दावा है कि सियामी मगरमच्छ की उसकी जंगली आबादी को शिकार से कोई खतरा नहीं है, और देश में प्रजातियों में कोई अवैध व्यापार नहीं है। हालांकि, CITES सचिवालय का कहना है एक बहुत छोटी जंगली आबादी (100-200) अभी भी अपेंडिक्स I सूची के मानदंडों को पूरा करती है, और सिफारिश किया है कि इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया जाए। 2013 में सीआईटीईएस कॉप 16 में इसी प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया था।

जेपोर भारतीय छिपकली

छिपकली की इस प्रजाति को साल 2010 में फिर से खोजा गया था, जिसे पहले केवल 19 वीं शताब्दी के संग्रहालय के नमूनों से ही जाना जाता था। भारत के पूर्वी घाट में केवल तीन स्थानों से इसकी पहचान है और इसकी आबादी घटती प्रतीत होती है। इसे विश्व स्तर पर लुप्तप्राय माना जाता है। भारत ने अपेंडिक्स II में इस प्रजाति को जोड़ने के लिए CITES CoP19 को एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया है।

प्रस्ताव में कहा गया है कि आकर्षक धब्बेदार त्वचा वाली ये प्रजाति पालतू जानवरों के व्यापार के प्रति संवेदनशील हो सकती हैं। अनुमति वाले निर्यात का कोई रिकॉर्ड नहीं होने के बावजूद, जेपोर भारतीय छिपकली को भारत के बाहर सोशल मीडिया पर बिक्री के लिए पेश किया गया है, जो यह दर्शाता है कि इसकी तस्करी पहले से ही तस्करी जारी है। 

मीठे पानी के कछुए

भारत ने मीठे पानी के कछुए की प्रजातियों को अपेंडिक्स II से अपेंडिक्स I में स्थानांतरित करने के लिए दो प्रस्ताव रखे हैं, जो प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक व्यापार को प्रतिबंधित करेगा। कछुओं की विभिन्न प्रजातियों की सुरक्षा के लिए कड़े नियम बनाने की मांग वाले कुल 12 प्रस्ताव हैं। ये सीआईटीईएस कॉप 19 में चर्चा का मुख्य मुद्दा बनने के लिए तैयार है।

लाल-मुकुट के समान छत वाला कछुआ (रेड-क्राउंड रूफ्ड टर्टल) एक गंभीर रूप से लुप्तप्राय मीठे पानी का कछुआ है जो ऐतिहासिक रूप से भारत और बांग्लादेश के गंगा बेसिन में पाया जाता था। लेकिन अब निश्चित रूप से किसी जगह पर इसके मिलने की बात करें तो वह उत्तर भारत में चंबल नदी की एक साइट है। 

इसका शिकार, पेट ट्रेड यानी इसको पालने के लिए खरीद-बिक्री और भोजन के रूप में उपभोग दोनों के लिए किया जाता है। साइटीज़ कॉप 19 के लिए भारत के प्रस्ताव में कहा गया है कि भारत में अत्यधिक संरक्षित स्थिति के बावजूद, यह प्रजाति अभी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नजर आती है जिससे संकेत मिलता है कि इसकी तस्करी जारी है। 

 A red-crowned roofed turtle
लाल-मुकुट के समान छत वाला कछुआ, जिसे भारत, कॉप 19 के दौरान साइटीज़ अपेंडिक्स I में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव कर रहा है। (फोटो: नरीमन वजीफदार / अलामी)

इसी तरह, लीथ सॉफ्टशेल कछुआ गंभीर रूप से संकटग्रस्त है और केवल भारत में केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में पाया जाता है। मीठे पानी के इस बड़े कछुए की प्रजाति का शिकार इसके मांस के लिए किया जाता है, और माना जाता है कि पिछले तीन दशकों में अत्यधिक शिकार और हैबिटेट (प्राकृतिक वास) के नुकसान कारण इनकी संख्या में 90 फीसदी तक गिरावट आई है। 

भारत के प्रस्ताव से पता चलता है कि प्रजातियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तस्करी की जाती है। प्रस्ताव में बताया गया है कि जीवित जानवरों के बजाय इसके प्रोसेस्ड शेल कार्टिलेज के अवैध व्यापार होते हैं, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि सूप और पारंपरिक चिकित्सा में इसकी खपत के लिए इसे पूर्वी और दक्षिण पूर्व एशिया में अवैध रूप से भेज दिया जाता है। 

उत्तर भारतीय शीशम

2016 में सीआईटीईएस कॉप 17 में, डाल्बर्गिया की सभी वृक्ष प्रजातियों – जिन्हें आमतौर पर शीशम के रूप में जाना जाता है – को अपेंडिक्स II में जोड़ा गया था, जिसका अर्थ है कि उनकी लकड़ी के अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक व्यापार के लिए निर्यात परमिट की आवश्यकता होती है। कुछ छोटे सामानों पर छूट थी।

यह इस आधार पर किया गया था कि खतरे की श्रेणी वाले कुछ प्रजातियों के व्यापार को ठीक से विनियमित किया जा सके। इनकी अलग-अलग प्रजातियों के बीच अंतर बता पाना अधिकारियों के लिए मुश्किल हो रहा था। इसलिए इसकी सभी प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक व्यापार के लिए अनुमति की आवश्यकता ज़रूरी कर दी गई। भारतीय शीशम (डाल्बर्गिया शीशम) इसमें शामिल प्रजातियों में से एक थी।

कॉप 19 के प्रस्ताव में, भारत और नेपाल संयुक्त रूप से अपेंडिक्स II से प्रजातियों को हटाने का आह्वान कर रहे हैं। प्रस्ताव का तर्क है कि प्रजाति सामान्य है और इसलिए व्यापार से सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है। जीन सीक्वेंसिंग, स्पेक्ट्रोमेट्री या लकड़ी घनत्व को मापकर इसकी प्रजाति को अन्य प्रजातियों से अलग किया जा सकता है।

प्रस्ताव में यह भी तर्क दिया गया है कि CITES लिस्टिंग ने भारत के लकड़ी से बने फर्नीचर और हस्तशिल्प के निर्यात को प्रभावित किया है। इस प्रस्ताव को चीन और सूडान का समर्थन मिला है। हालांकि, अपेंडिक्स II से प्रजातियों को हटाने के समान प्रस्ताव को CITES कॉप 18 में अस्वीकार कर दिया गया था। इसके अलावा, अपने आकलन में, सीआईटीईएस सचिवालय ने सवाल किया है कि क्या प्रवर्तन अधिकारी वास्तव में, भारतीय शीशम को संकटग्रस्त डाल्बर्गिया प्रजातियों से अलग कर सकते हैं। सीआईटीईएस सचिवालय का यह भी कहना है कि इसकी लिस्टिंग के लिए प्रथम दृष्टया से जो कारण थे, वह अब भी मौजूद हैं। 

साइटीज़ कॉप19 में किन अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की जाएगी?

CITES CoP केवल विभिन्न अपेंडिसेस में प्रजातियों को जोड़ने या हटाने पर बहस तक सीमित नहीं है। एक सत्र में सूचीबद्ध प्रस्तावों पर चर्चा होती है, उसी के साथ दूसरा सत्र भी आयोजित किया जाता है जिसमें बाक़ी चीज़ों पर चर्चा होती है। जैसे कन्वेंशन के वित्तपोषण और संचालन, इस बात की समीक्षा कि कैसे कुछ निश्चित प्रजातियों के संबंध में CITES को कितनी अच्छी तरह कार्यान्वित किया जा रहा है।

बंदी-नस्ल के टाइगर्स (कैप्टिव-ब्रेड टाइगर्स) के अवैध व्यापार पर नियंत्रण भी चर्चा का एक विषय होगा। चीन और दक्षिण पूर्व एशिया में हजारों बाघों को कैद में रखा गया है, और उनके शरीर के अंगों के अवैध व्यापार लंबे समय से सीआईटीईएस चर्चाओं का केंद्र रहा है। इसकी व्यापक चिंता है कि जंगली बाघों की मांग का व्यापार बढ़ रहा है। 

कॉप 19 से पहले समस्या के समाधान के प्रयासों का आकलन करने के लिए सचिवालय को चीन, लाओस, थाईलैंड, अमेरिका और वियतनाम सहित इससे संबंधित देशों का दौरा करना चाहिए था, लेकिन कोविड -19 और फंडिंग जैसे मुद्दों के कारण ये ‘मिशन’ अभी तक नहीं हुआ। अवैध व्यापार अभी भी जंगली बाघों की आबादी के लिए एक बड़ा खतरा है। भारत ने बंदी बाघों के व्यापार से निपटने के लिए लगातार दबाव डाला है जबकि चीन ने अक्सर इस धारणा को पीछे धकेल दिया है। 

पैंगोलिन एक और समूह है जिसे अवैध व्यापार से गंभीर रूप से खतरा है, क्योंकि पारंपरिक चीनी चिकित्सा में उपयोग के लिए उनके स्केल्स की मांग का बड़ा हिस्सा शामिल है। भारतीय पैंगोलिन सहित सभी प्रजातियों को साइटीज़ अपेंडिक्स I में सूचीबद्ध किया गया है, जिसका अर्थ है कि अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक व्यापार प्रतिबंधित है। लेकिन चीन में पारंपरिक दवाओं के उत्पादन में अभी भी पैंगोलिन स्केल्स का कानूनी रूप से उपयोग किया जाता है। हर साल अफ्रीका और एशिया में कई टन पैंगोलिन की तस्करी की जाती है। कॉप 19 में, यूके, पैंगोलिन पर साइटीज़ प्रस्ताव में एक सिफारिश जोड़ने का प्रस्ताव कर रहा है, जिसमें देशों से पैंगोलिन के घरेलू व्यापार पर प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया गया है, यदि यह अवैध शिकार या अवैध व्यापार में योगदान दे रहा है।

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