उत्तराखंड में चार धाम परियोजना (सीडीपी) के तहत चौड़ी हो रही 889 किलोमीटर सड़कों पर भूस्खलन की वजह से इस मानसून के दौरान लोगों का जीना दुश्वार हो गया। 120 बिलियन रुपये की अनुमानित लागत के साथ चार धाम परियोजना, भारत के हिमालयी क्षेत्र में सबसे बड़ी सड़क-चौड़ीकरण परियोजनाओं में से एक है। इसका उद्घाटन दिसंबर 2016 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था। इसके तहत 53 स्थलों में से 36 पर काम चल रहा है।

सड़क अवरोध और भूस्खलन

हिमालय में हिंदुओं के धार्मिक मंदिर- केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री- हैं। इन चारों तीर्थ स्थलों तक पहुंचने वाली सड़कों को चौड़ा करने का काम किया जा रहा है। यह भारतीय जनता पार्टी की प्रतिष्ठा से जुड़ी परियोजना है क्योंकि केंद्र और राज्य दोनों में उनकी सरकारें हैं।

 

लेकिन दुनिया की सबसे ऊंची और सबसे नई पर्वत श्रृंखला की सड़कों को केवल पहाड़ियों से पेड़ों व मिट्टी को निकालकर और चट्टानों को काटकर ही चौड़ा किया जा सकता है। इससे पूरी ढलान अस्थिर हो जाती है। पेड़ों व मिट्टी को जितना अधिक निकाला जाता है या चट्टानों को काटा जाता है उतना ही इनमें अस्थिरता बढ़ती है। स्थिति तब ज्यादा खराब हो जाती है अगर पहाड़ियों में खाली स्थान को न भरा जाए, नये पौधे न लगाए जाएं या फिर ढलान से निकलने वाले पानी के प्राकृतिक स्रोत को बंद न किया जाए। हालात और भी ज्यादा खराब हो सकते हैं अगर वहां मलबा डाल दिया जाए और वह नीचे नदियों में चला जाए।

सीडीपी मार्ग पर भूस्खलन के कारण सड़कें अवरुद्ध होने से वाहनों की आवाजाही मुश्किल हो जाती है। ढलान से मलबों के गिरने की वजह से कई लोग मारे जा चुके हैं। ऋषिकेश में 31 जुलाई को एक परिवार के तीन सदस्यों की मौत हो गई क्योंकि एक तटबंध से मलबा एक घर पर गिर गया। यह घटना ऋषिकेश-टिहरी रोड पर 29 किमी पर हुई जहां इस परियोजना के तहत सड़क को चौड़ा किया गया था। पीपलकोटी गांव के निवासी नरेन्द्र पोखरियाल ने कहा, “ठेकेदार पहाड़ियों को काट रहे हैं, सड़क को चौड़ा कर रहे हैं और अधिकांश स्थानों पर ढलान को ठीक किये के बिना आगे बढ़ जाते हैं। यह स्थिति ऋषिकेश-बद्रीनाथ राजमार्ग के पूरे रास्ते में देखी जा सकती है। ”

अगर मलबे को दोनों किनारों से एक नदी में फेंक दिया जाता है तो नदी संकुचित हो जाती है जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। इस तरह मलबे को फेंकने के मामले चार धाम परियोजना मार्ग पर कई जगह दिख जाएगी। [Image by: Hemant Dhyani]

सुप्रीम कोर्ट का दखल

कुछ प्रभावित निवासी पिछले साल भारत के सर्वोच्च न्यायालय में गए। सर्वोच्च न्यायालय ने प्रसिद्ध पर्यावरणविद् रवि चोपड़ा की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति गठित की। एक हालिया रिपोर्ट में समिति ने बताया कि एक रास्ते पर हाल में ही काटी गई 174 पहाड़ियों की ढलानों में से 102 में भूस्खलन के खतरे हैं। केवल 2020 के चार महीनों में एक हफ्ते के भीतर 11 ढलानों में भूस्खलन की घटनाएं हुईं। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वालों में से एक उमा जोशी सहित आठ लोगों की मृत्यु भूस्खलन के कारण हो चुकी है। यह घटना पिछले अक्टूबर में केदारनाथ मार्ग पर चंडीधर में हुई जब एक भूस्खलन हुआ और मलबा उनके वाहनों पर गिर गया। अदालत द्वारा नियुक्त समिति के सदस्य हेमंत ध्यानी ने The Third Pole को बताया, “सड़क को जितना अधिक चौड़ा करना होगा उतना ही ज्यादा ढलान को काटना और अस्थिर करना होगा। इसके बाद आपको मृदा क्षय, हरित क्षेत्र का क्षय, पेड़ों की कटान का नुकसान, ऊपरी मृदा का नुकसान और पानी के स्रोतों का नुकसान झेलना होगा।”

पहाड़ों की जितनी ज्यादा सीधी कटाई की जाएगी, ढलान उतनी ही ज्यादा अस्थिर होगी। चार धाम मार्ग पर इसे उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। [Image by: Hemant Dhyani]

हालांकि, 18 में से 13 समिति सदस्य 10 मीटर चौड़ी सड़क के पक्ष में थे, जिसके लिए 24 मीटर की चौड़ाई तक पहाड़ को काटना पड़ता है। समिति के चेयरपर्सन चोपड़ा और चार अन्य सदस्यों ने सात मीटर चौड़ी सड़क का पक्ष लिया, जिसमें से 5.5 मीटर के कटान की जरूरत होगी। सरकार द्वारा संचालित जी.बी. पंत इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट में एक वैज्ञानिक जे.सी. कुनियाल, जो समिति एक सदस्य हैं, ने ज्यादा चौड़ी सड़क के पक्ष में मतदान किया।  उन्होंने The Third Pole  से कहा,  “सीडीपी के तहत सड़क की चौड़ाई तय करने के लिए विशेषज्ञता और शासनादेश राष्ट्रीय राजमार्ग के इंजीनियरों के पास है। हमें, उच्च अधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) के सदस्य के रूप में चार धाम मार्ग पर पर्यटन और परिवहन के विस्तार को समायोजित करने के लिए भविष्य के दृष्टिकोण के आधार पर अपनी सिफारिशें देनी चाहिए।” चूंकि दोनों समूहों ने अलग-अलग सिफारिशें की थीं, इसलिए 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में मामले की सबसे हालिया सुनवाई के दौरान, न्यायाधीशों ने कहा कि वे सभी हितधारकों की बात सुनना चाहते हैं। याचिकाकर्ताओं के वकील, संजय पारिख, मामले की जल्दी सुनवाई चाहते थे। उन्होंने ये इंगित किया कि मानसून के दौरान पहाड़ी काटने के कारण भूस्खलन की पुनरावृत्ति होगी। सरकार ने इस पर कहा कि वह कुछ और प्रस्तुतियां रखना चाहती है। इस पर न्यायाधीशों ने मामले की अगली सुनवाई 8 सितंबर तय कर दी। न्यायाधीश इस मामले में जिन लोगों की बात सुनना चाहते हैं उनमें रवि चोपड़ा भी शामिल हैं।

केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, “पारिस्थितिक रूप से शेष 160 किलोमीटर सड़क बेहद संवेदनशील है। इनमें भागीरथी इको ज़ोन और काफी ऊंचाई वाले स्थान हैं। इसलिए हमने सरकार को सुझाव दिया है कि बीच का कोई रास्ता निकाला जाए।” भारतीय पारिस्थितिकी विशेषज्ञों के अगुआ चंडी प्रसाद भट्ट कहते हैं,  “अगर कोई तीव्र मोड़ हो या चट्टान बाहर की तरफ उभरी हुई हो तो सड़क को थोड़ा चौड़ा करने की जरूरत होती है। यह दृष्टिकोण किफायती है और पहाड़ियों और ढलानों को 90 फीसदी तक काटने से बचाया जा सकता है। यह एक  सबसे महत्वपूर्ण कारक है।” लेकिन चार मार्गों के साथ कई सड़कों को पहले से चौड़ा किया गया है। इनको दोनों तरफ एक-एक मीटर तक चौड़ा किया गया है। भट्ट कहते हैं, “चूंकि लगभग 729 किलोमीटर सड़क को 12 मीटर चौड़ाई तक चौड़ा किया गया है, इसलिए क्षति को कुछ नियंत्रित करने के लिए 5.5 मीटर चौड़ी स्ट्रेच को छोड़कर, शेष स्थान का उपयोग तीर्थयात्रियों के लिए पैदल पथ बनाने के लिए किया जाना चाहिए, जिसमें सड़क के किनारे पौधरोपण हो और जल निकासी की व्यवस्था हो। ”

भूवैज्ञानिक, नवीन जुयाल ने बताया कि सीडीपी उन सभी घाटियों पर अपना प्रभाव छोड़ेगी, जहां से चार हिंदू तीर्थस्थलों के लिए सड़कें गुजरती हैं। उन्होंने कहा, “केंद्र सरकार की 889 किलोमीटर की यह परियोजना 100-100 किमी से कम की 53 छोटी परियोजनाओं में भ्रामक रूप से टूटी हुई थी। इससे पर्यावरण प्रभाव आकलन की आवश्यकता के साथ टाल-मटोल की बात सामने आती है जो कि 100 किमी से अधिक किसी भी परियोजना के लिए आवश्यक है। सच्चाई यह है कि सभी चार घाटियों को 50 किलोमीटर के घेरे में शामिल किया जा सकता है। इस प्रकार सीडीपी के प्रभाव संचयी हैं और यह विशिष्ट परियोजना क्षेत्रों तक सीमित नहीं हैं।”

समिति की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मलबे को तंग नदी घाटियों में नीचे गिरा दिया है, जिससे कॉमन हिम ट्राउट और ब्राउन ट्राउट जैसी मछलियों की प्रजातियों के निवास स्थान पर बुरी तरह से प्रभाव पड़ रहा है। इससे शैवाल, ग्रीन बैक्टीरिया और अन्य जलीय पौधों और जीवों का आश्रय स्थल या तो नष्ट हो गए हैं या उन बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।

मलबे को किसी निश्चित जगह पर डालना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता है। मलबे को सीधे रोड से नीचे डाल दिया जाता है। [Image by: Hemant Dhyani]

पहाड़ों में सड़क निर्माण
भारत में पहाड़ों में सुरक्षित सड़क निर्माण के लिए मानदंडों का एक विस्तृत नियम हैं। 2008 के नेशनल प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज के आठ मिशन में से एक नेशनल मिशन ऑन सस्टेनिंग द हिमालयन इकोसिस्टम के तहत तत्कालीन योजना आयोग ने दिशानिर्देश तैयार किये थे। लेकिन हिमालय में सड़क निर्माण करने वाले बहुत कम लोग दिशानिर्देशों के बारे में जानते हैं। एक उदाहरण याद किया जाता है, जब पिछले साल नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दो निजी कंपनियों और नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया पर 20 मिलियन रुपये का जुर्माना लगा दिया, जब जम्मू और कश्मीर के उधमपुर से बनिहाल तक 72.17 किलोमीटर सड़क को चौड़ा करते हुए पर्यावरण मानदंडों का उल्लंघन हुआ। इसने तीनों को “परफॉर्मेंस गारंटी” के रूप में 10 मिलियन रुपये जमा करने का भी आदेश दिया गया, क्योंकि ऐसा न हो कि वे चेनाब और तवी नदियों में मलबे को गिरा दें और ढलान को स्थिर करने में विफल रहें। इसी तरह के मुद्दे उत्तर-पूर्व भारत में भी हैं। एस.पी. बिस्वास, डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, जो पिछले तीन दशकों से अरुणाचल प्रदेश और असम में नदी के मुद्दों पर काम कर रहे हैं, ने The Third Pole को बताया, “पहाड़ी इलाके में, आमतौर पर सड़कों का निर्माण एक नदी के साथ किया जाता है। अरुणाचल प्रदेश में तेझू से हयुलिंग तक जाने वाली सड़क लगभग पूरी तरह से पूर्वी जिले लोहित के पास से गुजरती है। पूरा हिमालयी क्षेत्र भौगोलिक रूप से बहुत नाजुक है। अरुणाचल प्रदेश में मानसून से पहले होने वाली बारिश आमतौर पर फरवरी-मार्च में शुरू होती है। 1970 के दशक के बाद से यहां भूस्खलन (बहुत भारी बारिश वाले क्षेत्रों में) के मामले बहुत ज्यादा हैं। इस प्राकृतिक प्रक्रिया में मानवीय गतिविधियों, विशेष रूप से बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और सड़क निर्माण कार्यों के कारण ज्यादा तेजी आई है। इससे नदी के प्रवाह की ओर के हिस्से की भू-आकृति बुरी तरह प्रभावित हुई है। साथ ही जलीय पौधों और जलीय प्राणियों पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ा है। वह कहते हैं, “नतीजतन, तेजू के पास सिंगल चैनल वाली नदी उच्च अवसादन के कारण दो दशकों से काफी प्रभावित हुई है। यह जलीय बायोटा और नदी के बहाव की भू-आकृति पर गंभीर प्रभाव डालता है। बड़ी मछलियों और अन्य जलीय जीवों की आबादी बहुत कम हो गई है। लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होने वालों में भारत के राष्ट्रीय जलीय जंतु गंगा डॉल्फिन और बायोटा हैं।”

जैसा कि व्यापक पर्यावरणीय आकलन के बिना चार धाम परियोजना चल रही है, इसका प्रभाव उत्तराखंड के लोगों के साथ-साथ वनस्पतियों और जीवों पर भी पड़ना तय है।

5 comments

  1. STOP THIS!! What is the point of going to the chardham when the very thing created by God is destroyed like this? Shame on the govt and shame on all those people supporting this evil project.

  2. The negligent and ecocidal nature of this ill conceived project, is shown by how cynically the 889 km project was misleadingly broken into 53 smaller projects of less than 100 km each by the central government. Thereby evading the necessity of an environment impact assessment, which is required for any project over 100 km! The same project could have happened in a relatively more eco friendly way, with a proper EIA and construction parameters in tune with the fragile ecology and geology of the hill regions.
    What is the point of this “accessibility project” to sacred pilgrimage spots, when it massively destroys the very natural beauty, sanctity, and peace which made these spots holy in the first place? What peace can we find within, when we devastate the peace and ecology prevailing in the surroundings? Pity that the Environment Ministry as well as the Ministry of Road Transport, are wilfully avoiding any introspection or rational planning in this matter.

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