ऊंचाई और पारिस्थितिकी दो महत्वपूर्ण कारक हैं जिससे लोगों की जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकुलन क्षमता का पता चलता है। यह पिछले वर्ष में प्रकाशित ‘भारतीय हिमालय में समुदाय’ पर तीन अध्ययनों के सार के तौर पर कहा जा सकता है।

वैज्ञानिकों ने हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल में विभिन्न ऊंचाइयों पर रहने वाले समुदायों का अध्ययन किया। सभी अध्‍ययनों में पाया गया कि समुदायों की जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की क्षमता आमतौर पर काफी कम हैं। लेकिन तीन अध्ययनों में से दो ने उन लोगों की पहचान की, जो मध्य हिमालय में रहते हैं, वे बदलते जलवायु में सबसे ज्‍यादा संवेदनशील हैं, क्योंकि जनसंख्या घनत्व के अधिक होने पर यह स्थिति संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र पर दबाव डालती है।

Vegetation zones in the Himalayas, The Third Pole

इस साल जून माह में, भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने देश की पहली जलवायु परिवर्तन मूल्यांकन रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें कहा गया कि हिंदू कुश हिमालय (एचकेएच), जो पूर्व में अफगानिस्तान से पश्चिम में चीन तक आठ देशों तक फैला है, 1951 से 2014 के बीच लगभग 1.3 डिग्री सेल्सियस ज्‍यादा गर्म रहा। बर्फबारी भी कम हो रही है और हिंदू कुश हिमालय के कई हिस्‍सों से ग्लेशियर पीछे होते जा रहे हैं।

भारतीय हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले 5 करोड लोगों की कुछ दिक्कतें हैं। हिमाचल प्रदेश में अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं ने अपने शेाध में लिखा हैं कि ” ढलान और भू-भाग की वजह से पहाड़ी कृषि प्रणालियों की जलवायु परिवर्तन का सामना करने की क्षमता को सीमित कर दिया है। इसके पीछे बड़ा कारण यह भी है कि “पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या में तेजी से वृद्धि  हुई जिससे संसाधनों- जल,  जमीन और जंगल जैसे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय तत्‍वों पर दबाव बढ़ता चला गया।

नकुल क्षेत्री जो नेपाल के काठमांडू में स्थित एक क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) में ट्रांसबाउंड्री लैंडस्केप के क्षेत्रीय कार्यक्रम प्रबंधक हैं, ने बताया कि एक समुदाय की संवेदनशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह जोखिम को कितना समझते हैं, उसके प्रति कितने संवेदनशील हैं और स्थिति के प्रति अनुकूल होने की उसकी क्षमता कितनी है। क्षेत्री कहते हैं कि नदी के पारिस्थितिक तंत्र के साथ बस्तियों को बाढ़ का सामना करना पड़ सकता है। संवेदनशील क्षेत्रों के साथ खड़ी ढलानों पर रहने वाले लोगों को भूस्खलन जैसी समस्‍या झेलनी पड़ सकती है। संरक्षित क्षेत्रों के पास बस्तियां में रहने वाले लोगों को वन्यजीवों के हमले और फसल का नुकसान हो सकता है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन प्रति पहाड़ी समुदायों की अतिसंवेदनशीलता के “चिंताजनक संकेत” हैं। सर्दियों में तापमान बढ़ रहा है और वर्षा क्रम में बदलाव आ रहे हैं: अब वर्षा अधिक तीव्र और कम अवधि में होती है। फल और फूल समय से पहले हो रहे हैं;  सामान्य रूप से गर्म तापमान और कम ऊंचाई पर होने वाली वनस्पति अब पहाड़ों पर अधिक बढ़ रही है।

Vegetation zones in the Himalayas

Images by: Tapuu / Wikimedia commons, CC BY 3.0; Debojyoti Dey / Wikimedia commons, CC BY-SA 4.0; Janak Poudel / Wikimedia commons, CC BY-SA 4.0; Dinesh Valke, CC BY-SA 2.0; PabloEvans, CC BY 2.0

तीन नई रिपोर्टों से पता चलता है कि हिमालयी क्षेत्र के 12 भारतीय राज्यों में से तीन में विशिष्ट पहाड़ी समुदायों के लिए इस व्यापक प्रवृत्ति के क्या मायने हैं।

पश्चिम बंगाल की तलहटी

खड़गपुर में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) के वैज्ञानिकों ने पश्चिम बंगाल की तलहटी (समुद्र तल से 1,200 मीटर से कम) में समुदायों का अध्ययन किया। उनकी रिपोर्ट, जिसे जून में प्रकाशित किया गया था,  का सार है कि इस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के लिए “कम अनुकूलन क्षमता” है।

जुलाई और सितंबर 2018 के बीच, शोधकर्ताओं ने पूर्वी हिमालय के इन क्षेत्रों में 384 घरों का आकलन किया। उन्होंने जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली आंतरिक अति संवेदनशीलता के चार संकेतकों को देखा: आय हानि,  फसल हानि, आवास हानि और संम्‍पूर्ण आजीविका हानि।

रिपोर्ट के निष्कर्षों से पता चलता है कि अति संवेदनशीलता चारों ओर व्‍याप्‍त है। सर्वेक्षण किए गए परिवार गरीब थे और खेती से जीवनयापन करते थे। रिपोर्ट में पाया गया कि कई तरह की बाढ़ से बचाने वाले तरीकों के बावजूद उप-हिमालयी क्षेत्र के हर घर को भारी वर्षा एवं बाढ़ के कारण प्रतिवर्ष भारी मात्रा में फसलों की बर्बादी झेलनी पड़ती है।

शोधकर्ताओं ने लोगों से पूछा कि कैसे जलवायु परिवर्तन से उनकी आजीविका प्रभावित हुई है। इस पर शोधकर्ताओं ने कहा कि पड़ोसी भूटान में “भयंकर बारिश” के कारण इस क्षेत्र ने “भारी बारिश और विनाशकारी बाढ़” का अनुभव किया है । 2015 और 2017 के बीच बादल फटने से 4.4 मिलियन से अधिक लोग प्रभावित हुए और 293,000 हेक्टेयर से अधिक फसलें और घर बर्बाद हो गए। इस आपदा ने छोटे किसानों को विशेष रूप से प्रभावित किया; वे साल में दो बार बड़ी जोत वाले किसानों से भूमि पट्टे पर लेते हैं: मानसून के मौसम में चावल उगाने के लिए और सर्दियों के दौरान मक्का और आलू उगाने के लिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि खेती की बढ़ती कठिनाई और रोजगार के सीमित अवसर नौजवानों को गुवाहाटी, दिल्ली, बेंगलुरु और तिरुवनंतपुरम जैसे शहरों में काम करने के लिए मजबूर कर रहे हैं। इसने ना चाहते हुए भी महिलाओं और बच्चों को जलवायु संकटों जिसमें विशेष रूप से बाढ़, के दौरान और अधिक कमजोर स्थिति की ओर धकेल दिया है।

लेखक ने लिखा है कि इस क्षेत्र में आधारभूत बुनियादी ढाँचा जैसे नदियों पर पुल, बेहतर सड़क, आवास विकसित करने की तत्काल आवश्यकता है, यहां अधिकांश मकान मिट्टी से निर्मित होते हैं या आंशिक रूप से कंक्रीट से निर्मित होते हैं, साथ ही मौजूदा बाढ़ प्रबंधन के लिए मजबूत व्‍यवस्‍था बनाने की आवश्यकता है ।

इस साल फरवरी में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में हिमाचल प्रदेश में विभिन्न ऊंचाई पर स्थित कृषक समुदायों पर शोध किया। शोधकर्ताओं ने विशेषतौर पर बायोग्राफिकल क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर अध्ययन में पाया कि कैसे पौधों और जानवरों का वितरण बदलता है और यह पश्चिमी हिमालयी राज्य में लोगों की आजीविका को कैसे प्रभावित करता है।

उन्होंने पाया कि मध्य हिमालय के सबसे कमजोर “अंतर्निहित संवेदनशील जैव-भौतिकी और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के कारण “क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, अंतर्निहित अतिसंवेदनशीलता, के वितरण में एक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई।

मध्य हिमालय जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील है

हिमाचल प्रदेश में समुद्र तल से 250 से 6,524 मीटर की ऊंचाई पर जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने वाले गांवों का उच्चतम अनुपात पाया जाता है। नई दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) और अनुसंधान संगठन द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टीईआरआई) के वैज्ञानिकों ने 13,877 गांवों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। उन्होंने गांवों को तीन क्षेत्रों में विभाजित किया: ‘निम्‍न हिमालय’ (उप-उष्णकटिबंधीय तापमान और मध्यम वर्षा के साथ समुद्र तल से 250 से 6,444 मीटर), ‘मध्य हिमालय’ (250 से 6,524 मीटर, शीतोष्ण शीतोष्ण शीतोष्ण कटिबंध तक) और मध्यम वर्षा के साथ) और ‘ट्रांस-हिमालयन तिब्बती पठार’ (2,289 से 6,582 मीटर, बहुत कम तापमान और थोड़ी बारिश के साथ एक ठंडा रेगिस्तान)। उन्‍होंने पौधों और जानवरों के प्रकार में भिन्नता पायी, जो प्रत्येक क्षेत्र की ऊंचाई,  इलाके और जलवायु पर निर्भर करती है  और विभिन्न कृषि प्रणालियों को जन्म देती है।

 

हिमाचल प्रदेश में कृषि महत्वपूर्ण है: 88% आबादी के पास सीमान्‍त भूमि (एक हेक्टेयर से कम) है, और जिसमें वे लोग कृषि और बागवानी करते है। वैज्ञानिकों ने पाया कि मध्य हिमालय क्षेत्र भूमि की संवेदनशीलता के साथ अधिक जनसंख्‍या एवं सामाजिक-आर्थिक स्थितियों की वजह से ज्‍यादा असुरक्षित है।  निचले क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों की अधिक अनुकूलन क्षमता होती है क्योंकि उनके पास बेहतर बुनियादी ढांचा है और जनसंख्‍या भी कम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उच्च श्रेणी में आबादी कम है और कृषि पर लोग कम निर्भर (लोगों की आय ज्यादातर पशुधन और पर्यटन से आती है) हैं जिसकी वजह से समुदाय की प्रतिरोधक क्षमता अधिक है। जेएनयू के पर्यावरण विज्ञान और शोध लेखकों में से एक, पवन जोशी कहते हैं कि  “यह हिमालय में विभिन्न जैव-भौगोलिक क्षेत्रों में कृषि या कृषक समुदाय की अंतर्निहित अतिसंवेदनशीलता को देखने के लिए किया गया पहला अध्ययन है,” जो भविष्‍य में जलवायु परिवर्तन से और बढ़ेगा।

गढ़वाल हिमालय की स्थिति

एक तीसरे अध्ययन ने उत्तराखंड में गढ़वाल हिमालय में विभिन्न ऊंचाई पर रहने वाले समुदायों की सामाजिक और आर्थिक कमजोरियों का पता लगाया। यह पाया गया कि पश्चिम हिमालय राज्य की पर्वत श्रृंखलाओं में समुद्र तल से 1,000 से 2,000 मीटर की ऊंचाई पर रहने वाले लोग जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे संवेदनशील हैं।

देहरादून में वन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा अक्टूबर 2019 में प्रकाशित इस अध्ययन में चार ऊंचाई वाले क्षेत्रों में 403 घरों का सर्वेक्षण किया गया। शोधकर्ताओं ने इन्हें ’कम’ (समुद्र तल से 1,000 मीटर से कम), मध्यम (1,000 से 1,500 मीटर), उच्च (1,500 से 2,000 मीटर) और बहुत अधिक (2,000 मीटर से अधिक) के रूप में परिभाषित किया।

गढ़वाल हिमालय में लगभग 3.9 मिलियन लोग रहते हैं, जिनमें से लगभग 30% लोग गरीबी और निर्वाह अर्थव्यवस्था के कारण कुपोषित हैं। सीमित रोजगार के अवसरों के साथ, सभी ऊंचाई पर रहने वाले लोग कृषि पर निर्भर हैं।

जलवायु परिवर्तन से यहां के सभी क्षेत्र प्रभावित हैं। लेकिन शोधकर्ताओं ने समशीतोष्ण ‘मध्य’ श्रेणी को सबसे संवेदनशील बताया हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन देहरादून के वैज्ञानिक और रिपोर्ट के लेखकों में से एक राजीव पांडे ने  The Third Pole पोल को बताया कि इसका मुख्य कारण बारिश, बाढ़, भूस्खलन और सूखे जैसी घटनाएं हैं, जो कृषि को प्रभावित करती हैं। उच्च जनसंख्या घनत्व से आशय है कि प्राकृतिक संसाधनों की अधिक दोहन जिसके परिणास्‍वरूप  पारिस्थितिकी तंत्र पर अधिक दबाव पड़ता हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि उच्च क्षेत्रों में किसान जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील थे। यह अनियमित वर्षा और खड़ी ढलानों में अत्‍यधिक मिट्टी के कटाव के कारण होता है।

जलवायु परिवर्तन के मामले में ‘अति उच्च’  क्षेत्र में रहने वाले समुदाय तीसरे सबसे संवेदनशील थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि वे जलवायु और तीव्र मौसम की घटनाओं में उतार-चढ़ाव के लिए अन्य समूहों की तुलना में उनकी क्षमता अधिक थी। हालांकि, यह बताता है कि उच्च-ऊंचाई वाले समुदायों की आजीविका में पर्यटन और सरकार द्वारा रसोई गैस जैसी सामाजिक योजनाओं के माध्यम से दी जाने वाली सब्सिडी से सुधार आया है।

बदलाव की योजना

पांडे कहते हैं कि गढ़वाल हिमालय के अध्ययन ने उत्तराखंड के पहाड़ों में संवेदनशीलता के लिए आकर्षण के केंद्र की पहचान की थी। उन्‍होंने कहा कि “हिमालय में जलवायु परिवर्तन के लिए अनुकूल उपायों का एक भी पैकेज प्रभावी नहीं होगा,”। बल्कि, समुदायों को ऊंचाई के आधार पर अनुकूलित रणनीतियों की आवश्यकता होती है, जो प्राकृतिक संसाधनों को एकीकृत करते हैं, खेती को मजबूत करते हैं और आजीविका पर विचार करते हैं। सदी के अंत तक, भारत के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने कहा है कि सबसे खराब स्थिति में एचकेएच का औसत तापमान 5.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ सकता है। पहाड़ों की मध्य सीमाओं में रहने वाले संवेदनशील लाखों लोगों पर इसका असर पड़ेगा।

जेएनयू के पवन जोशी ने कहा कि अगला कदम उन गांवों की पहचान करना है, जिन्हें तत्काल अनुकूलन योजना की जरूरत है। “यह अध्ययन (हिमाचल प्रदेश पर) कमजोर क्षेत्रों में कृषक समुदायों के लिए बेहतर संसाधन प्रबंधन में सहायता करेंगे”। जोशी ने बताया कि अक्सर विकास की पहल अनुकूलन योजना के साथ ओवरलैप हो जाती है और “गांवों की ऐसी रैंकिंग नीति निर्माताओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगी। वास्तव में, इस तरह के शोध को बेहतर समझ और क्रियान्‍वयन के लिए पूरे हिमालय के लिए किया जाना चाहिए।”

TV Padma एक स्वतंत्र पत्रकार हैं और उनका ट्विटर हैंडल @tvpadma है।

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