पैंगोलिन और लाल पांडा दुनिया के सबसे अधिक तस्करी वाले जानवरों में से एक हैं। ये दोनों विशिष्ट स्तनधारी हैं, जो पूर्वी हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इन जीवों को भौगोलिक और सामाजिक आर्थिक कारकों से होने वाली अवैध वन्यजीव तस्करी से खतरा है। यह अवैध व्यापार दिनों दिन खतरनाक दर से बढ़ रहा है।

1992 में, पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में पूर्वी हिमालय के हिस्से सिंगालिला वन्यजीव अभयारण्य (एसएनपी) को एक राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था। 1994 में एसएनपी को लाल पांडा के लिए एक प्रमुख जंगली निवास स्थान घोषित किया गया। इस पार्क में पश्चिम बंगाल से सिक्किम तक फैली एक हिमालयी रिज सिंगलीला शामिल है तथा इसका पश्चिमी क्षेत्र संवेदनशील है, जिसकी सीमा नेपाल के साथ खुली हैं।

मुसीबत में वन्यजीव

लाल पांडा और पैंगोलिन की संख्या पर अधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि एसएनपी के अधिकारी और दार्जिलिंग वन्यजीव प्रभाग को सूचना सार्वजनिक करने में कोई रुचि नहीं हैं। लेकिन, मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कालिम्पोंग में एसएनपी और नेओरा वैली नेशनल पार्क में जंगली लाल पांडा की संख्या 40-45 है।

इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) लाल पांडा को संकटग्रस्त के रूप में सूचीबद्ध करता है और भारत में कुल 5,000-6,000 लाल पांडा होने का अनुमान है। 2015 में, एक आईयूसीएन ने अपने मूल्यांकन कहा कि वैश्विक आबादी में पिछले 18 वर्षों में 50% की गिरावट आ सकती है, और यह गिरावट जारी रहेगी। यह संभवत: अगले 18 सालों में तीव्र हो जाए।

1994 में, दार्जिलिंग चिड़ियाघर ने एक लाल पांडा संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम शुरू किया। 2003 तक इसमें 22 लाल पांडा थे और दो चिड़ियाघर में जन्मी मादाओं को जंगल में छोड़ने का फैसला किया गया। 2004 में दो और मादाओं को रिहा किया गया था और अक्टूबर 2019 में एक बार फिर चार पांडा रिहा किए जाने थे। इन प्रयासों के बावजूद भी राष्ट्रीय उद्यान में लाल पांडा की आबादी में वृद्धि के कोई संकेत नहीं हैं।

एसएनपी में मेरे शोध के दौरान, ग्रामीणों ने मुझे बताया कि उन्होंने पिछले 20 वर्षों में लाल पांडा को पहले की तुलना में कम बार देखा था। पहले के समय में, उन्हें कभी-कभी अपने आसपास लाल पांडा दिख जाते थे।

Red panda release centre, Gairibas Singalila National Park, Sangay Tamang

सिंगालीला नेशनल पार्क के गैरीबास में रेड पांडा रिलीज सेंटर [Image by: Sangay Tamang]

सीमा के दोनों तरफ अवैध शिकार की गतिविधियां बढ़ गई हैं। तस्करी वाले जानवरों की मांग बढ़ने और निजी रिसॉर्ट्स के खुल जाने से ये हालात ज्यादा गंभीर हुए हैं। चीन में कुछ समारोहों के दौरान पहनी जाने वाली टोपी बनाने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।

इसके अलावा, पर्यटन से राजस्व प्राप्त करने के लिए पश्चिम बंगाल की सरकार ने पार्क के अंदर सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचों का निर्माण किया है, जिसके परिणामस्वरूप भारी मात्रा में आगंतुकों और वाहनों का आना बढ़ गया है, जिसके कारण से जानवर को दूर जा रहे हैं। विडंबना यह है कि राज्य इसके लिए स्थानीय समुदायों को दोषी ठहराता है। एसएनपी की प्रबंध योजना कहती है, “सिंगालीला में आसपास रहने वाले लोग, लाल पांडा के लिए मानवजनित खतरे के तौर पर देखते हैं।

पैंगोलिन का अवैध शिकार

लाल पांडा के विपरीत, पैंगोलिन ऐतिहासिक रूप से संरक्षण प्रयासों के केंद्र में नहीं थे। भारत, भारतीय पैंगोलिन का घर है, जिसे आईयूसीएन द्वारा संकटग्रस्त प्रजाति के तौर पर सूचीबद्ध किया गया है, और चीनी पैंगोलिन को अति संकटग्रस्त प्रजाति के तौर पर सूचीबद्ध किया गया है।

अतीत में, एसएनपी के स्थानीय लोगों को अक्सर अपने खेतों के पास पैंगोलिन मिल जाते थे। उन्हें एक प्राकृतिक कीट नियंत्रक के रूप में माना जाता है, क्योंकि एक पैंगोलिन, चींटियों और दीमक की तरह एक वर्ष में 70 मिलियन कीड़े खा जाता हैं। मुझे अपने फील्डवर्क से पता चला कि अतीत में स्थानीय लोगों ने शायद ही कभी पैंगोलिन का शिकार किया हो, लेकिन हाल के दिनों में अवैध शिकार कई गुना बढ़ गया है। विशेष तौर पर चीन में उनके मांस की मांग की वजह से तस्करी की जाती हैं। एक सलाहाकार संस्‍था पर्यावरण जांच एजेंसी (ईआईए) ने सितंबर 2019 में रिपोर्ट जारी किया कि 110,182 पैंगोलिन जब्त किए गए, जो पिछले वर्ष से 54% अधिक हैं।

पहाड़ों में वन्यजीवों की खपत

सदियों से पहाड़ी इलाकों में हिमालय में कई समुदायों ने जंगली जानवरों और पक्षियों को खा लिया गया। पूर्वी नेपाल के कुछ हिस्सों में, पारंपरिक चिकित्सा और खाद्य प्रथाओं के हिस्से के रूप में पैंगोलिन के मांस का उपभोग करने का समृद्ध इतिहास रहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि हिमालयी समुदायों ने जानवरों को बिना किसी प्रतिबंध के शिकार किया है,  ऐसा ज्यादातर सर्दियों के मौसम में होता था। क्योंकि कई जंगली जानवर वसंत में प्रजनन करते हैं, यह माना जाता था कि उन्हें तब शिकार नहीं किया जाना चाहिए। माता-पिता अपने बच्चों को बताते थे कि यदि वे प्रजनन काल में शिकार करते हैं, तो प्रकृति उन्‍हें दंड देती हैं और वे बीमार हो जाएंगे। राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना से पहले और एसएनपी के आस-पास के ग्रामीणों का मानना था कि जंगली जानवरों और पक्षियों के छोटे पैमाने पर शिकार ने पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

मेरा अपना मानवशास्त्रीय शोध बताता है कि इसके कुछ तर्क हैं। सबसे पहले, सर्दियों के दौरान बच्चों को शिकार करने के लिए प्रोत्साहित करना उन्हें अपनी लंबी छुट्टी में एक गतिविधि देता है, जो आमतौर पर दिसंबर के पहले सप्ताह में शुरू होता है और फरवरी के अंत या मार्च की शुरुआत में समाप्त होता है। दूसरा, यह प्रजनन अवधि से पहले जंगली प्रजातियों के विस्तार को नियंत्रित करने का एक तरीका है, इसलिए वे मनुष्यों के साथ संघर्ष में नहीं आते हैं। तीसरा, प्रजनन के मौसम में गड़बड़ी से पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन पैदा होता है जो संक्रामक रोग पैदा कर सकता है, इसलिए इस समय शिकार करना पाप माना जाता है।

प्रतिशोधात्मक कानून

एसएनपी में छोटे पैमाने पर सामुदायिक शिकार एवं जंगल में प्रवेश पर प्रतिबंध हो गया और पार्क क्षेत्र को भारत के 1972 वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के मद्देनजर लाया गया। इसने कई तरीकों से समुदायों की आजीविका को प्रभावित किया, और लोगों को बेहतर अवसरों के लिए गांवों को छोड़ने के लिए मजबूर किया। अब वहां रुकने वालों को पैसे कमाने के वैकल्पिक तरीके खोजने थे।

सिंगालीला रिज में अवैध वन्यजीव व्यापार आसान और लाभदायक हो गया है। अवैध शिकार और तस्करी बढ़ रही है – न केवल पैंगोलिन और लाल पांडा, बल्कि कीड़े और औषधीय पौधों की भी। इसके दो मुख्य कारण हैं। पहला, नेपाल और भारत के बीच खुली सीमा नीति अवैध व्यापार को आसान बनाती है। तिब्बत से नेपाल के रास्ते चीन का ऐतिहासिक व्यापार मार्ग इसे गति देता है। सीमावर्ती क्षेत्र में अवैध रूप से तितली के व्यापार पर टिप्पणी करते हुए, कोलकाता में स्थित एक एनजीओ, नेचरमेट्स के उपाध्यक्ष अर्जन बसु रॉय ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “संग्रह के बाद तितलियों को या तो नेपाल या म्यांमार को भेजा जाता है, जहां भारतीय कानून लागू नहीं होते हैं, वहां से उन्हें बाहर ले जाया जा सकता है। पैदल सीमा पार करने वाले स्थानीय लोगों से कभी पूछताछ भी नहीं की जाती है, इसलिए उनका पता लगाना लगभग असंभव है।”

Sandakphu, Singalila National Park, Sangay Tamang

सिंगालीला नेशनल पार्क के सेंडकफू में भारत और नेपाल को अलग करने वाली सड़क [Image by: Sangay Tamang]

दूसरा, वन्यजीव संरक्षण कानूनों ने वन क्षेत्र में विकास को प्रतिबंधित किया है, इसलिए नौकरी के अवसर और आजीविका से साधन जुटाना कठिन हो गया है। कई युवा लोगों को जड़ी-बूटियों और वन्यजीवों को इकट्ठा करना शुरू करने के लिए मजबूर किया गया था, क्योंकि यह मौसमी काम की तुलना में अधिक आकर्षक था। विकास का ना होना वन विभाग के दमनकारी नीतियों का परिणाम हैं , जिससे न केवल वन विभाग और समुदायों के बीच शत्रुतापूर्ण संबंध बन गए, बल्कि मनुष्यों और प्रकृति के बीच का रिश्‍ता भी प्रभावित हुआ है।

मेरे अनुसंधान के दौरान, कुछ स्थानीय लोगों ने कहा कि अवैध वन्यजीव व्यापार में कुछ वन अधिकारी शामिल थे। हालांकि, दार्जिलिंग वाइल्डलाइफ डिवीजन के अधिकारियों ने इस तरह के दावों से इंकार किया है। इस सिस्‍टम में स्थानीय लोग अक्सर यह नहीं जानते कि वे किसके लिए शिकार कर रहे हैं; कुछ लोग यह भी नहीं जानते कि वे जो कर रहे हैं, वह अवैध है।

सीमा पार से सहयोग और नए कानूनों की आवश्यकता

हमें राष्ट्रीय सीमाओं से परे संरक्षण को पुनर्जीवित करने और मजबूत सीमा सहयोग विकसित करने की आवश्यकता है। यह सीमा पार तस्करी रोधी नेटवर्क में नौकरशाह, स्थानीय हितधारक, पर्यावरणविद, गैर सरकारी संगठन और समुदाय शामिल हैं। रेड पांडा नेटवर्क, एक यूएस-आधारित संगठन है, जो अपने भुगतान किए गए फ़ॉरेस्ट गार्जियन टीम और अन्य स्थानीय हितधारकों के माध्यम से पूर्वी नेपाल के कुछ हिस्सों में लाल पांडा के संरक्षण में शामिल है, लेकिन भारत और नेपाल के बीच सीमा पार सहयोग कई स्तरों का अभाव है।

Red Panda Network conservation banner, Jaubari, Nepal, Sangay Tamang

एसएनपी के पास, नेपाल के जुबरी गांव में एक रेड पांडा नेटवर्क संरक्षण बैनर [Image by: Sangay Tamang]

See: Tibetans enhanced biodiversity, banning them degrades forest

मैंने एसएनपी में अपने फील्डवर्क से सीखा कि गैर सरकारी संगठनों द्वारा आयोजित कुछ जागरूकता कार्यक्रमों से अलग, भारतीय ग्रामीणों को वन्यजीवों के आवास के संरक्षण में कोई संगठनात्मक समर्थन नहीं है। दोनों देशों के बीच इस अंतर का एक कारण उनके वन और वन्यजीव कानून हैं। नेपाल, सामुदायिक वानिकी के अपने इतिहास के कारण, संरक्षण परियोजनाओं में समुदायों को शामिल करने में आंशिक रूप से सफल रहा है, जबकि भारत अभी भी औपनिवेशिक शासन के तहत बनाई गई एक बहिष्करणीय संरक्षणवादी नीति का अनुसरण करता है।

लाल पांडा और पैंगोलिन जैसी लुप्तप्राय प्रजातियों को बचाने के लिए, भारत के वन और वन्यजीव कानूनों में सुधार किया जाना चाहिए।

(Sangay Tamang आईआईटी, असम में डिपार्टमेंट ऑफ ह्यूमनिटीज एंड सोशल साइंसेस एक पीएचडी के स्टूडेंट हैं। यह आलेख उनके फील्डवर्क पर आधारित है जो उन्होंने सिंगालीला नेशनल पार्क और आसपास के जंगलों में किया है। इन्होंने पूर्वी हिमालयी गलियारे में वानिकी, वन्यजीवन और सामुदायिक स्थापना पर शोध किया है।) 

2 comments

  1. Nadeem Mirbahar |

    Wildlife is facing issues and disappearing due to human behaviour, poor laws, livelihood arrangements for resident communities and appropriate conservation efforts locally and at transboundary level. Poaching and easy trade of wild fauna and flora species in one country is basically putting species at risk in another country. All countries must have unified conservation agenda for species otherwise ecosystem disbalance will not only bring diseases but poverity in these ecozones and low and poor quality production as well. As animals, insects, reptiles and other biodiversity help in keeping the ecosystem balance.

  2. Hugh paxton |

    Especially true in areas of high biodiversity value that share or are in close proximity to international borders.

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