कोविड-19 महामारी से जूझ रहा एक देश एक तरफ पूर्व में चक्रवात और दूसरी तरफ पश्चिम में टिड्डियों से टक्कर ले रहा है। तीन महीने पहले,  इस तरह के परिदृश्य की कल्पना करना मुश्किल था, लेकिन यही अब भारत की वास्तविकता है।

जैसे-जैसे उत्तर-पश्चिमी और मध्य भारत में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस को पार करता है, हजारों प्रवासी श्रमिक अपने गांवों तक पहुंचने के लिए बेताब हो जाते हैं। ये सब लोग एक अनियोजित लॉकडाउन के शिकार हैं जिसकी कोरोना वायरस के प्रसार को रोक पाने की क्षमता अभी साबित नहीं हुई है।

इतिहास में मजबूरन विस्थापित होने वाली ये शायद सबसे बड़ी घटना हो सकती है- सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि इसकी वजह से आठ करोड़ लोग क्वारंटाइन सेंटरों में रहे और बहुत सारे लोग तो इससे बाहर भी रहे। और इसी बीच में, सरकार उद्योगों में उन्हीं क्षेत्रों को बढ़ावा दे रही है जिन्होंने पहले से ही कई संकट पैदा किए हैं।

बीमारी के जनक

साजिशों के सिद्धांतों में निवेश करने वालों के अलावा, ऐसा सच प्रतीत होता है  कि कोविड -19 वायरस एक या एक से अधिक जानवरों द्वारा मनुष्यों में प्रवेश कर गया, जिससे हम इस खतरनाक स्थिति में आ गये हैं क्योंकि हम जंगलों को काटते रहते हैं और काल्पनिक औषधीय मूल्यों के लिए जानवरों का शिकार करते रहे हैं। वर्षों से विशेषज्ञ चेतावनी देते आए हैं कि आवास का विनाश ज़ूनोटिक रोगों को बढ़ाने में ईंधन का काम करता है, जिनमें से कोविड -19 एक है।

यह और भी स्पष्ट है कि चक्रवात एम्फान ने 20 मई को पूर्वी भारत और दक्षिण-पश्चिम बांग्लादेश में भारी तबाही मचाई और एक तीव्र चक्रवात बन गया, क्योंकि बंगाल की खाड़ी की सतह पर तापमान जलवायु परिवर्तन के कारण रिकॉर्ड ऊंचाई पर था। और यह बिल्कुल स्पष्ट है कि बार-बार होने वाली बेमौसम बारिश के कारण दक्षिण अफ्रीका के हॉर्न और दक्षिणी यमन में सामान्य से कहीं अधिक बड़ी संख्या में टिड्डे प्रजनन कर रहे हैं, यह भी जलवायु परिवर्तन का एक और प्रभाव है। पूर्वी अफ्रीका, अरब प्रायद्वीप, ईरान और पाकिस्तान के बड़े हिस्से में खेती के क्षेत्रों को नष्ट करने के बाद, 26 साल में सबसे बड़े टिड्डों के झुंड ने, पश्चिमी और मध्य भारत में तीन राज्यों पर पहले ही आक्रमण कर दिया है।

लपटों को हवा देना

इन कई आपदाओं के लिए तर्कसंगत उपाय क्या हो सकते हैं? जाहिर सी बात है कि दो तरह के कदम उठाने होंगे। पहला, वनों की सुरक्षा करके जैव विविधता की रक्षा करना। दूसरा, लॉकडाउन के बाद पर्यावरण हितैषी ऊर्जा उत्पादन, परिवहन और उद्योगों को बढ़ावा देना, जो ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम से कम करें जो जलवायु परिवर्तन का कारण है।

भारत सरकार ने इसके विपरीत किया है। लॉकडाउन के दौरान सरकार देश में सभी पर्यावरण संरक्षण कानूनों को कमजोर करने की दिशा में आगे बढ़ी है। इसके पीछे ये तर्क दिया जा रहा है कि ये कानून विकास कार्यों में रुकावट हैं। अगर पर्यावरण मंत्रालय को इसका रास्ता मिल गया- जैसा कि संभव है- तो कोई फैक्टरी मालिक को प्रदूषण नियंत्रित करने के लिए बहुत मामूली प्रयास ही करने होंगे। अगर ये कमजोर नियमों का पालन होने लगेगा तो फैक्टरी मालिक को प्रदूषण नियंत्रण संबंधी निगरानी के लिए उसको ही इंस्पेक्टर का चयन करने का अधिकार मिल जाएगा। 2014 के बाद से, जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का शासन कायम हुआ है तब से बांधों और सड़कों के निर्माण के लिए जंगल के बड़े हिस्से पहले ही सौंप दिए गए हैं। एक विस्तृत रिपोर्ट में, डाटा न्यूज पोर्टल इंडियास्पेंड ने तब से भारत के सबसे संरक्षित क्षेत्रों में और उसके आसपास स्वीकृत 270 परियोजनाओं को गिना है। अब सरकार फर्मों को जंगलों के अंदर तेल के कुओं और कोयले की खदानों के लिए खुदाई की अनुमति दे रही है।

काला प्रोत्साहन

लॉकडाउन के बाद के आर्थिक प्रोत्साहन के रूप में, सरकार ने निजी कंपनियों को कोयले की खोज और खनन की अनुमति दे दी है। भारत सौर संयंत्रों के बावजूद कोयले पर आधारित बिजली उत्पादन को जारी रखने की योजना बना रहा है। इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी (IRENA) द्वारा तैयार ग्लोबल रिन्यूएबल्स आउटलुक में एक विस्तृत रोडमैप उपलब्ध है, लेकिन सरकार में कोई भी इसके बारे में कुछ भी करता महसूस नहीं होता।

 

झारखंड के झरिया में कोलफील्ड्स से कोयला इकट्ठा करते बच्चे। [image: Alamy]

टाटा पावर के सीईओ प्रवीर सिन्हा कहते हैं, ”आज के माहौल में नई कोयला क्षमता की बात करना उचित नहीं होगा। किसी भी नए कोयला संयंत्र के लिए अपना पूरा जीवन चलाने के लिए अब पर्याप्त समय नहीं है। अब अतिरिक्त क्षमता है (धीमी विकास स्थितियों के साथ)। निर्माण के शुरुआती चरण वाले किसी भी कोयला संयंत्र पर फिर से विचार किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज लेने वाले राज्य अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के खिलाफ पक्षपातपूर्ण कार्रवाई न करें।”

भारत अधिक बांधों की योजना भी बना रहा है, हालांकि मौजूदा अधिकांश बांध मांग बढ़ने पर लाभ पर प्रतिदिन केवल चार घंटे ही चलाए जा सकते हैं। इनमें से अधिकांश बांध हिमालय में, वनों के अंदर, जैव विविधता वाले क्षेत्र में और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में हैं। इसके अलावा वे अपने आसपास के क्षेत्र में जो भी करेंगे उससे उत्तरी, पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत के सभी क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति प्रभावित होगी। और यह तब है जब जलवायु परिवर्तन पहले से ही पानी की आपूर्ति को अधिक अनियमित बना रहा है।

अल्पकालिक सोच से हो रहा है उल्टा असर

इस प्रकार की अल्पकालिक सोच – एक मजबूत और स्थायी अर्थव्यवस्था के बजाय तात्कालिक मुनाफे पर ध्यान केंद्रित करना – नीति निर्धारण हलकों में है, और भारत के महामारी से निपटने के दौरान इसके नकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। सरकार यह पूर्वानुमान लगाने में अक्षम रही कि काम करने बाहर गये लाखों लोगों की नौकरियां चली जाएंगी और लॉकडाउन के बावजूद अपने गांवों में लौटने में मजबूर हो जाएंगे। ये अक्षमता साधारण नहीं कही जा सकती।

योजना की कमी के अन्य उदाहरणों में से कारखानों को फिर से शुरू करने का आदेश शामिल है, जबकि लॉकडाउन एक चरण से दूसरे चरण में पहुंच गया। हफ्तों तक बंद रहने के बाद मशीनरी की स्थिति की जांच करने के लिए शायद ही कोई समय दिया गया। इसके परिणामस्वरूप पहले ही दिन कई दुर्घटनाएं हुईं। जहरीले रासायनिक स्टाइलिन – प्लास्टिक बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाला रसायन – का विशाखापत्तनम, आंध्र प्रदेश में एक कारखाने से रिसाव हुआ और इसकी वाष्प आसपास के क्षेत्रों में फैल गई, जिससे कम से कम 12 लोग मारे गए। उसी दिन, छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में फिर से शुरू की जा रही एक पेपर मिल में आग लग गई। तमिलनाडु में NLC (पूर्व में नेवेली लिग्नाइट कॉरपोरेशन) की फैक्ट्री के दोबारा चालू होने के दौरान एक बॉयलर फटने से आठ मजदूर गंभीर रूप से घायल हो गए। यह केवल तब था जब भारत का राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण कारखानों को फिर से शुरू करने के लिए एक सप्ताह के कदम-दर-कदम दृष्टिकोण के साथ आया था। इसी समय, देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकारें – विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश के साथ-साथ विपक्ष की राजस्थान सरकार ने श्रम कानूनों को निलंबित कर दिया हालांकि कुछ ने अब व्यापार संघों के दबाव के कारण इसे बहाल कर दिये हैं।

इसके अलावा, लॉकडाउन एक चरण से दूसरे चरण में स्थानांतरित हुआ और भारत के दो सबसे बड़े कोयला-बिजली संयंत्रों ने अपने उत्पादन को 52 फीसदी से अधिकतम संभावित क्षमता तक बढ़ा दिया। और यह तब किया गया जबकि सरकार के स्वामित्व वाले थर्मल पावर प्लांट बार-बार सुप्रीम कोर्ट को बताते हैं कि उनके पास प्रदूषण नियंत्रण उपकरण स्थापित करने के लिए पैसे नहीं हैं और बार-बार समय सीमा को पीछे धकेलते रहते हैं। कुछ ने तो दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करने के लिए महामारी को भी दोषी ठहराया है, हालांकि उनको पिछले साल ही ये करना था।

अकसर यह महसूस होता है कि पारिस्थितिकी तंत्र पर आधारित अर्थव्यवस्था पर चौतरफा हमला होता है। लेकिन राजनेताओं और वरिष्ठ नौकरशाहों ने किसी भी सुझाव के जवाब में अपनी चिढ़ ही प्रकट की है कि यह सही दृष्टिकोण नहीं है। आप उन लाखों प्रवासी कामगारों को नहीं देखते हैं, जिन्होंने अपनी नौकरी खो दी है, इस पर वे करारा जवाब देते हुए कहते हैं कि उन्हें कारखानों को फिर से खोलना होगा और बुनियादी सुविधाओं और आवास परियोजनाओं को फिर से शुरू करना होगा ताकि लाखों लोग अपनी आजीविका कमा सकें। वे “हरित प्रोत्साहन” का नाम तक सुनना नहीं चाहते हैं। नीति निर्धारकों की इस तरह की बातों की औद्योगिक निकायों द्वारा बहुत जोर-जोर से जय जयकार की जाती है। वहीं तमाम थिंक टैक्स की बात शायद ही उनके इको चैम्बर्स के बाहर तक जाती हो और उनके पास कोई विकल्प भी नहीं है।

नए अवसर

सवाल ये है कि क्या नया हरित प्रोत्साहन इतना सरल है जितना इसे बनाया जा रहा है, या वर्तमान में फिर से खोलने की नीति इतनी खतरनाक रूप से अदूरदर्शी है कि यह देश को अब से कम से कम आगे के दस साल के लिए फंसी हुई संपत्तियों, प्रदूषित आसमान, न पीने योग्य पानी और जहरीली मिट्टी के साथ छोड़ देगी? हमारे वर्तमान आर्थिक मॉडल में एक बुनियादी समस्या यह है कि सरकारें योजनाओं या परियोजनाओं को मंजूरी देते समय स्वास्थ्य और पर्यावरणीय लागतों को ध्यान में नहीं रखती हैं। एक तरफ, कोविड -19 महामारी दिखा रही है कि यह कितना खतरनाक है, दूसरी ओर, केवल एक उदाहरण के रूप में, आईआरईएनए  रिपोर्ट से पता चलता है कि कम कार्बन निवेश से स्वास्थ्य और पर्यावरणीय व्यय के लिए जितना खर्च किया होता है, उससे आठ गुना कम खर्च होगा।

नोबेल पुरस्कार विजेता जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ और अग्रणी जलवायु अर्थशास्त्री निकोलस स्टर्न के नेतृत्व में एक नए अध्ययन में पाया गया कि जीवाश्म ईंधन परियोजनाओं को स्थापित करने में लगने वाली लागत के बराबर ही अगर नई हरित ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित की जाएं तो जीवाश्म ईधन परियोजनाओं की तुलना में हरित ऊर्जा परियोजनाओं में दोगुना नौकरियां पैदा होंगी। एनर्जी ट्रांजिशंस कमीशन के रूप में एक साथ काम करने वाली फर्मों के एक समूह ने एक विस्तृत रोडमैप दिया है जिसमें बताया गया है कि लॉकडाउन के बाद किस तरह से एक ग्रीन प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। इसके मुख्य बिंदु हैं:

•   अक्षय ऊर्जा प्रणालियों में बड़े पैमाने पर निवेश हासिल करना।
•   हरित इमारतों और हरित बुनियादी ढांचे के माध्यम से निर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देना।
•   स्वच्छ हवा को मद्देनजर रखते हुए मोटर वाहन क्षेत्र को बढ़ावा दें।
•   जलवायु प्रतिबद्धताओं के लिए व्यवसायों को सशर्त सहयोग देना सुनिश्चित किया जाए।
•   अभिनव द्वारा कम कार्बन गतिविधियों को लक्ष्यित सहयोग दिया जाए।
•   जीवाश्म ईंधन उद्योग के परिवर्तन में तेजी लाई जाए।
•   कार्बन मूल्य निर्धारण और विनियमों को नीचे की तरफ नहीं जाने देना चाहिए।

योजनाओं की कोई कमी नहीं है। जी- 20 के वित्त मंत्रियों – जिनमें भारत भी शामिल है – ने अपने देशों को कोविड -19 के कारण हुए लॉकडाउन से “पर्यावरण की दृष्टि से स्थायी आर्थिक सुधार” के लिए प्रतिबद्ध किया है। लेकिन भारत के प्रोत्साहन पैकेज में इसका कोई संकेत नहीं है।

गांव में बदलाव

अब सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या उन लाखों प्रवासी कामगारों के लिए रोजगार की तलाश है जो पहले ही अपने गांव में पहुंच चुके हैं। ये लोग अपने पुराने विकल्प, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत होने वाले कामों में ही रोजगार खोजेंगे, लेकिन अगर इतने अधिक लोगों को रोजगार देना है तो इसके तहत होने वाले कामों की सूची में काफी वृद्धि करने की आवश्यकता है। मिट्टी की उर्वरता और भूमिगत जल भंडारण में सुधार लाने के मूल उद्देश्य के साथ पहला विकल्प वास्तव में वाटरशेड विकास कार्य हो सकता है, इसको बढ़ावा देना चाहिए। बहुत सारे अच्छे उदाहरण उपलब्ध हैं। जैसे महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के भोजदरी में वाटरशेड ऑर्गेनाइजेशन ट्रस्ट द्वारा समन्वित कार्य को ले सकते हैं। स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल होते हुए इस तरह के कामों को बढ़ाने की जरूरत है।

लॉकडाउन के पहले चरण के दौरान भारत की स्वच्छ हवा के दिनों को देखकर लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ। कुछ लोगों ने हिमालय की चोटियों को देखने और पूर्व-औद्योगिक युग में वापस जाने के बारे में कई व्यंगात्मक टिप्पणियां कीं जबकि कई अन्य लोग भूखे रह गए क्योंकि कारखाने बंद थे। टिप्पणियों ने इस तर्क को पटरी से उतार दिया कि एक औद्यौगिक युग केवल आधुनिक सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण रूप से स्वच्छ हवा, पानी और मिट्टी के बारे में और स्वस्थ लोगों के बारे में भी है। उस चर्चा को पटरी पर लाने की जरूरत है।

2 comments

  1. In ancient time the wisdom of the “idiots” was valued as the “idiots” were truly wise. In present times we have the “wisdom” of the idiots wherein there is no doubt to those who reflect who the true idiots are. Well-summarised article by Joydeep, hope it gets the attention with the planners.

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