अपने खेत में बैठे, 68 वर्षीय गुलाम हसन रादर सूखे की मार को दिखाते हुए कहते हैं कि हम पहले केसर के खेतों में फसलों की कटाई धीरे-धीरे बैठ कर किया करते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों में केसर के उत्पादन में इस स्तर की कमी आयी है कि हम बैठना तो दूर चलते-चलते केसर के खेतों से फसल को इकट्ठा करते हैं।

दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा जिले के लेथपोरा इलाके में रादर ने 4 एकड़ में फैले अपनी जमीन में पिछले 40 साल तक खेती की है। 18 नवम्बर के बाद कश्मीर में तीन महीनों बाद पहली बाद थोड़ा ठीक बारिश हुई, पर उससे पहले ही केसर की फसल, जिसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत 3,000 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास है, नष्ट हो चुकी थी। श्रीनगर के क्षेत्रीय मौसम विभाग के निदेशक सोनम लोटस के मुताबिक, अगस्त से अक्टूबर माह के अंत तक क्षेत्र में सिर्फ 10 मिलीमीटर बारिश हुई, ये बारिश उसी महीने के औसत 100 मिलीलीटर के तुलना में हुई।

क्षेत्रीय किसानों के अनुसार, अगर 2015 को छोड़ दिया जाए, क्योंकि इस वर्ष फसल अच्छी थी, हाल के वर्षों में सूखे और अत्यधिक वर्षा ने बार-बार केसर की खेती को नुकसान पहुंचाया है। रादर के अनुसार पहले हर किसान प्रति कनाल ( एक एकड़ का आठवां हिस्सा) 50 तोला (600 ग्राम) तक पैदा किया करता था, जो 2009 से लगभग 150 ग्राम तक कम हो गई है।

रादर ने www.thethirdpole.net को बताया कि यह साल केसर के लिए सबसे ज्यादा बुरा साबित हुआ क्योंकि इस साल किसानों को थोड़ी पैदावार भी नसीब नहीं हुई। यह हमारे जीवन काल का सबसे भयानक अनुभव है, हमें पिछले साल की तुलना में सिर्फ 5 से 10  प्रतिशत ही केसर की पैदावार मिली।

मसालों के राजा के रूप में व्यापक तौर से जाना जाने वाला केसर- कश्मीर, ईरान, स्पेन और थोड़े समय से अफगानिस्तान में उगाया जा रहा है, जहां बीते साल और इस वर्ष केसर की खेती कश्मीर से बेहतर उपज दी है। बहुतों का मानना है कि यह अफगानिस्तान के किसानों को अफीम की खेती से दूर कर सकता है।

अफगानिस्तान में केसर की सफलता को देखकर कश्मीरी किसान अपनी खराब फसल के अजीब पक्ष को देखकर ढांढस बांध रहा है। लेथपोरा के केसर उत्पादक शौकत अहमद शाह कहते हैं पांच साल पहले, अफगानिस्तान के विशेषज्ञों और किसानों ने हमारे खेतों का दौरा किया था, यह समझने के लिए की हम कैसे केसर उगाते हैं और अब संभावना यह है कि हम अफगानिस्तान के किसानों की भूमिका को संभालने के लिए अंततः अपने केसर फसल असफलताओं पर विचार कर सकते हैं।

वर्षासिंचित केसर उद्योग

करीब 20,000 परिवारों को सहारा और जीविका देने वाला, बागवानी के बाद केसर उद्योग कश्मीर का दूसरा सबसे बड़ा उद्योग है। लेकिन कश्मीर के कृषि विभाग के मुताबिक, केसर की खेती के लिए भूमि 1990 में 5,700 हेक्टेयर से घटकर 2016 में 3,715 रह गई है। वहीं दूसरी ओर प्रति हेक्टेयर उत्पादन भी 1.88 किलोग्राम से कम हो गया है, जो कि दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में 6 किलोग्राम कम है।

रादर कहते हैं कि केसर की फसल की सफलता पूरी तरह से बारिश पर निर्भर है। अगर अगस्त से नवंबर के बीच तीन से चार बार बारिश होती है, तो ही हमें अच्छी फसल मिलती है। यदि आवश्यकता के मुताबिक बारिश नहीं होती है, तो फसल में भारी नुकसान होता है। इस साल अगस्त से नवंबर तक कोई वर्षा नहीं हुई।

फिरदौस अहमद नाहवी ने केसर पर व्यापक शोध किया है और सरकार की किसानों की मदद के लिए सूखे और तकनीकी कठिनाइयों संबंधी परियोजना तैयार करने में सहयोग किया है। उनका कहना है कि सिंचाई न होना ही केसर की उपज में गिरावट का वास्तविक कारण है।

नहवी ने www.thethirdpole.net को बताया सिंचाई सुविधाओं का निर्माण परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा था ( जो मैंने बनाया था) क्योंकि हमने हाल के वर्षों में देखा है कि जब फसल को नमी की आवश्यकता होती है तब बारिश नहीं होती है।

सितंबर और अक्टूबर के महीनों में बारिश एक मुद्दा बन गया है, जिसे हाल के वर्षों में तेजी से देखा जा रहा है। नहवी कहते हैं अगर इन महीनों में बारिश नहीं होती है तो अंकुरण में विलंब से फूलों के खिलने में देरी हो रही है, जो दिन और रात के तापमान की नाजुक सीमाओं से मेल नहीं खाता जिससे फसल की उत्पादकता प्रभावित होती है। 2000 तक कश्मीर ने 1000 से 1,200 मिलीमीटर तक की वर्षा को अच्छी तरह से वितरित किया, जो कि 600 से 800 मिलीमीटर तक कम हो गयी है।

निराश किसान

जैसा कि रादर बोलते हैं कि निराश किसान अपने हाथों में सींक-टोकरी और बैग लेकर केसर के खेतों के तरफ जल्दी से बिखरे फैले केसर के फूलों को इकट्ठा करने के लिए दौड़ते हैं। सैख अहमद सोफी, अपने 20वे दशक के अंत में अपने बचपन को कई बार याद करते हैं जब पंपोर के केसर के खेतों में उत्सव दिखता था और कटाई के समय यह तुरंत बाजारों में तब्दील हो जाया करता था जिसे केसर उत्सव कहा जाता था।

छोटे व्यापारी केसर के बदले अपने उत्पादों को बेचने के लिए कियोस्क और स्टालों स्थापित किया करते थे। शाकिर ने www.thethirdpole.net को बताया कि वो केसर के फूलों को खोजने के लिए घूमते हैं। हम उत्सव के मूड से बहुत आनंद लेते थे और इसके लिए हमें अच्छा जेब खर्च भी मिलता था। अब हमें यह उबाऊ लगता है जब हमारे माता-पिता हमें खेतों में काम करने और फसल इकट्ठा करने के लिए कहते हैं।

रफीका बेगम कहती हैं कि महिलाएं केसर फसल से अपना स्वयं का हिस्सा लिया करती थी। हम अपने आभूषण सहित विभिन्न चीजों की खरीदारी के लिए अपने हिस्से को स्वयं के लिए बेचा करते थे लेकिन अब लगातार सूखे की वजह से हम यह पैसे नहीं पा रहे हैं।

अपने ट्रैक्टर को ऊबड़ खाबड़ रास्ते पर ले जाते हुए किसान गुलाम मोहम्मद ने www.thethirdpole.net को बताया कि वो अपने केसर की फसल की सिंचाई के लिए पानी का कंटेनर ले रहे हैं। सरकार द्वारा ड्रिप सिंचाई सुविधाओं को प्रदान करने की विफलता पर निराशा व्यक्त करते हुए मोहम्मद कहते हैं हममें से कुछ अब यह तरीका अपना रहे हैं, हम लंबी दूरी से पानी ला रहे हैं ताकि हम केसर भूमि की मिट्टी को नम कर सके, ताकि अगले फसल तक बीजों का स्वास्थ्य ठीक रह सके।

उन्होंने कहा, जैसा कि आप देख सकते हैं उन्होंने उन पाइपों को केवल दिखावे के लिए लगाया हुआ है, उनमें से कोई भी उपयोग लायक नहीं है। अगर इनका कोई भी उपयोगिता होती तो हमारे केसर के खेत सिंचित हो जाते। साथ ही यह भी कहा कि अपनी फसल की सिंचाई के लिए यह लगभग 80 और दौरे लेगा।

असफल ड्रिपसिंचाई योजना

2010 में नई दिल्ली में केंद्र सरकार ने कश्मीर में केसर खेती को फिर से जीवंत करने के लिए 3.17 अरब का राष्ट्रीय मिशन का शुभारंभ किया, जिसे बाद में 4.1 अरब रुपये तक बढ़ाया गया।

केसर की खेती के लिए छिड़काव सिंचाई सुविधा का निर्माण करना जो कि परंपरागत रूप से बारिश पर निर्भर है यह मिशन का मूल उद्देश्यों में से एक था। लेकिन कश्मीर के केसर के किसानों के गढ़ लेथपोरा के किसानों ने कहा कि सिंचाई से संबंधित उनकी परेशानियों को संबोधित किया जाना अभी बाकी है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि सरकार हमारी फसलों के लिए पानी उपलब्ध करें हालांकि कुछ जगहों पर कुछ ट्यूबवेल, कुएं खोदे गए हैं लेकिन अभी तक केसर के खेतों में पानी नहीं देखा गया है। एक किसान इम्तियाज अहमद भट् ने www.thethirdpole.net को बताया।

करीब 2 अरब रुपये फसल के लिए छिड़काव सिंचाई सुविधाओं के लिए आवंटित हुए थे जो कि लगभग पूरा खर्च भी किया जा चुका है, लेकिन अधिकारियों ने मौजूदा स्थिति के लिए भूमाफिया को जिम्मेदार ठहरा दिया है।

कश्मीर के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के जिस उच्च अधिकारी को सिंचाई सुविधाओं का निर्माण करने का कार्य सौंपा गया था, उन्होने कहा (भू माफिया) ने एक या दो जगहों पर अप्रत्यक्ष रूप से समस्याएं पैदा कीं, लेकिन यह ही एकमात्र कारण नहीं है, जिसके कारण सिंचाई सुविधा प्रभावी रूप से नहीं बन सकी। यह विभाग के लिए अपनी सुस्ती छुपाने का एक बहाना बन गया है। नाम ना छपने के शर्त पर बोलते हुए अधिकारी ने कहा कि उनका विभाग परियोजना में शामिल कई कंपनियों के बीच समन्वय नहीं कर पा रहा है।

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