एक नवीन परियोजना के तहत भारतीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने दो युवा पीएचडी शोधार्थियों को ट्राम्सो के नार्वेजियन पोलर संस्थान में अध्ययन के लिए भेजा। वे वहां ढाई वर्षों से शोध कर रहे हैं। यद्यपि उनमें से एक का शोध केंद्र आर्कटिक और दूसरे का अंटार्कटिक है। दोनों ग्लेशियोलॉजिस्ट है। यह पहला साक्षात्कार अंकित प्रामानिक का है, जिनका शोध केंद्र है- आर्कटिक क्षेत्र में ग्लैशियर कैसे पिघलते हैं और उनका पिघला हुआ पानी समुद्र में कैसे पहुंचता है।

इस योजना की ओर आपका झुकाव कैसे हुआ?

अंकित प्रामानिक : मैंने स्नातक और परास्नातक दोनों भौतिकी में किया है। मेरी रुचि भौतिकी से संबंधित क्षेत्र में पीएचडी करने में थी। ग्लेशियर, जलवायु और क्राईयोफेयर क्षेत्र के शोधों का आधार भौतिकी और भूभौतिकी है। जब नेशनल सेंटर फॉर अंटार्कटिक एंड ओशियन रिसर्च की वेबसाइट पर विज्ञापन आया, तब मैंने भारत और नार्वे के बीच एक सहयोगी कार्यक्रम का पता लगाया। मैंने आवेदन किया, एक साक्षात्कार के लिए बुलाया गया और इस कार्यक्रम के लिए चयनित होने के लिए पर्याप्त भाग्यशाली था।

अपने शोध के विषय में बारे में बताएं

एके: मैं स्वालबार्ड के ग्लेशियर पर पीएचडी कर रहा हूं। विशिष्ट तौर पर, मैं कांग्सफ्जोर्ड (Kongsfjord) क्षेत्र में काम कर रहा हूं, जो उत्तरी-पश्चिमी स्वालबार्ड में नाई-अलेसंड (Ny-Alesund) के समीप है। कांग्सफ्जोर्ड विभिन्न आकृति और आकार के ग्लेशियर से घिरा हुआ है। मैं जांच कर रहा हूं कि पिघलने के लिए जिम्मेदार विभिन्न ऊर्जा अपशिष्टों से ग्लेशियर कैसे प्रभावित होते हैं और यह भी कैसे ग्लेशियर के विभिन्न हिस्से वर्षा से एकत्रित होते हैं। यह सब एक विशेष समय अंतराल में कितना पिघला हुआ पानी उत्पादित होता है और कितना पानी समुद्र में जाता है, को समझने के लिए एक संतुलित ऊर्जा मॉडल को बनाने के लिए प्रयोग किया जा रहा है। इसके अलावा मेरा काम समुद्र में जाने से पहले पिघले हुए पानी को विभिन्न माध्यमों से ले जाने की व्यवस्था को भी देखना है।

कॉन्ग्सफोर्ड इलाके के ग्लेशियर्स [image by Norwegian Polar Institute]

यह मॉडल क्षेत्र के आंकड़ों के साथ जांच किए गए हैं, जो प्रत्येक वर्ष की बसंत और शरद रितु में इकठ्ठे किए गए हैं। मैं आर्कटिक में एनपीआई के वैज्ञानिकों के साथ चार क्षेत्रीय कार्यों की यात्राओं पर गया हूं। इस दौरान हमनें कई तरह के काम किए, उदाहरण के लिए हमने मापा कि भूतल कितना पिघला हुआ है या ग्लेशियर ने कितना मास एकत्रित किया है, एक ग्लेशियर कितनी तेजी से बढ़ रहा है, और ग्लैशियर के विभिन्न हिस्सों में बर्फ कितनी मोटी है।

इस शोध का क्या महत्व है?

एके: ग्लेशियर ताजे पानी का स्रोत है। ग्लेशियर से पिघला हुआ पानी समुद्र में जाता है, जिसका पानी नमकीन (समुद्री पानी) होता है। ताजे पानी का समुद्र के नमकीन पानी से मिश्रण समुद्र के पारिस्थिकी तंत्र को प्रभावित करता है- वह भी जहां अधिक जीवन प्रणालियां पनपती हैं। यह जानकारी उन ओशियनोग्राफर के लिए भी उपयोगी है, जो यह जानने के लिए कि वर्ष के विभिन्न समय में कितना ताजा पानी मिश्रित होता है इस क्षेत्र का प्रतिरूपण कर रहे हैं।

सामान्य तौर पर, ग्लेशियर जलवायु परिवर्तन के लिए अति संवेदनशील हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को समझने के लिए इनका अध्ययन करना जरूरी है। समुद्र स्तर बढ़ने के अलावा, पहले की जलवायु को समझने के लिए उनके अध्ययन की जरूरत है। हिमालय में बहुत सी बड़ी नदियां ग्लेशियर से उत्पन्न होती हैं और आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा का जीवन इन नदियों पर निर्भर करता है। हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट पर उनके प्रभाव के साथ साथ ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ों की भविष्यवाणी और निपटने के लिए हमें इनका अध्ययन करने की जरूरत है।

पिघलते ग्लेशियर [image by Norwegian Polar Institute]

क्या आपका यह विशिष्ट काम हिमालय से संबंधित है?

एके: हां, यह अध्ययन हिमालय में ग्लेशियर के शोध के लिए प्रयोग किया जा सकता है। मेरा वर्तमान काम ग्लेशियर के भूतल और उपसतह पर होने वाली प्रक्रियाओं को समझना है। यद्यपि आर्कटिक की जलवायु और हिमालय की जलवायु में काफी अंतर हैं लेकिन ग्लेशियर की आधारभूत भौतिकी में ज्यादा अंतर नहीं है। इसलिए जो ज्ञान (मॉडलिंग और फील्ड वर्क) मुझे आर्कटिक ग्लेशियर में काम करने से मिल रहा है, वह हिमालय में शोध के लिए भी काफी उपयोगी होगा।

क्या ट्राम्सो में होना आपकी शोध के लिए मददगार है?

एके: हां, नि:संदेह नार्वेजियन पोलर इंस्टीट्यूट (एनपीआई), ट्राम्सो ने मेरे शोध में काफी मदद की। एनपीआई लंबे समय से आर्कटिक और अंटलाटिक दोनों में ग्लेशियरों पर शोध कर रहा है। उनके पास अनुभवी तार्किक कर्मचारियों के साथ साथ वैज्ञानिक भी हैं। ग्लेशियर के क्षेत्र के काम के लिए हमें सुरक्षा और बचाव प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) से होकर गुजरना होता है। अनुभवी कर्मचारियों के साथ इस ट्रेनिंग ने मुझे बेहतर सुरक्षा ट्रेनिंग सीखी। क्षेत्र के काम के साथ साथ मॉडलिंग के दौरान वैज्ञानिकों के साथ काम करने से इस शोध के दोनों क्षेत्रों के ज्ञान में बढ़ोतरी की, जो कि इस क्षेत्र में काफी महत्वपूर्ण है।

अब जब आपके तीन साल में से ढाई वर्ष पूरे हो चुके हैं, आप अपने को भविष्य में क्या करते हुए देखते हैं‍

एके: मुझे अपना काम बेहद पसंद हैं। मैं आर्कटिक में ग्लेशियर पर काम करना जारी रखना चाहूंगा। मैं हिमालयी ग्लेशियर पर भी काम करना चाहूंगा। आगे के अध्ययन के साथ मैं इस शोध को जारी रखते हुए इस क्षेत्र का और पता लगाना चाहूंगा। अगर अवसर मिला तो भविष्य में मैं अपने काम से दोनों आर्कटिक और हिमालय पर होने वाली भारतीय शोध में योगदान देना चाहूंगा।

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