“मानवता के दृष्टिकोण से कृपया मेरी प्रार्थना मानिये ” वह यह कहता प्रतीत हुआ। उसने यह अशान्त करने वाला समाचार अपने परिचित साथी से सुना था। साधारणतया वह बहती हुई धारा से बर्फ के पुल को पार करके अपने चारागाह तक पहुंचने के लिए करता था। वह और उसका समूह शक्तिशाली बर्फीली धारा को पार कर सकता था परन्तु भेड़ और बकरियां नहीं पार कर सकती थीं। यदि वह इसे पार नहीं कर सका तो 4900 मीटर ऊंचे भाभा दर्रे तक पहुंचने में 10 दिन लगेंगे और दर्जनभर जानवरों का नुकसान होगा। यह तरीका बेकार था। ताराचन्द नेगी ने सिर हिलाया और चुपचाप रहा।

नेगी ने न तो सूर्य की परावर्तित पारे जैसे रंग की किरणों को देखा और न ही स्पितियन पहाड़ी के ढाल पर चर रहे चूमूर्ति घोड़े को। झुके हुए सिर के साथ हिमाचल प्रदेश में पिन घाटी के जगनम गांव की ओर बढ़ा। बर्फ से ढके पहाड़ की ओर से चलने वाली ठन्डी हवाओं से चमड़े की जॉकेट और ऊनी पैन्ट उसे बचा रहे थे। सिर पर हरी और स्लेटी किन्नौरी टोपी पहने हुए, झुर्रीदार चेहरा सूर्य की किरणों के सामने दिखाई दे रहा था। सगनम गांव के लोगों ने उसका भाग्य अपने हाथ में ले रखा था। क्या वे उसे पिन नदी के पार अपने खेती से होकर भेड़ के झुण्ड को ले जाने देंगे?

वह आशावादी था। साथ ही उसके पास खोने को कुछ नहीं था। इन कठिन परिस्थितियों में उसे रखने का अपराधी जलवायु परिवर्तन था।

एक कुत्ता भेड़ और बकरियों के झुण्ड को शिकारी जानवरों से सुरक्षित रखता है। [image by Janaki Lenin]

एक कुत्ता भेड़ और बकरियों के झुण्ड को शिकारी जानवरों से सुरक्षित रखता है। [image by Janaki Lenin]

जलवायु परिवर्तन के कारण खत्म होती एक परंपरा

यद्यपि पेड़ रहित जमीन मानसून के पहले जून में भूरी दिखती है। भेड़, बकरियां, घास, पेड़-पौधे इस सूखे ठण्डे ऊंचे प्रदेश पर जीवित रहते हैं। एक बार मानसून जब किन्नौर से लौटता है और स्पीति में पतझड़ होता है, तब गड़रिये अपने जानवरों के झुण्ड को पहाड़ों पर ले जाते हैं। और गांव वालों को बदले में कुछ रुपये देते हैं, यह परंपरा बहुत पुरानी है।

यह परम्परा अब जलवायु परिवर्तन होने की वजह से बन्द होने की कगार पर है। पिछले 10 सालों से अच्छे चारागाह कम हुए हैं। चरवाहे अपर्याप्त बर्फ और जलवायु परिवर्तन पर इसका आरोप लगाते हैं। अत्यधिक अविश्वनीय वर्षा, भूस्खलन, मृदा अपरदन अल्पाइन के चारागाह को कम करते हैं। और उन्हें बर्बाद करते है। प्रत्येक वर्ष बहुत से बर्फ के पुल गायब हो गये हैं। विशेष रूप से 2015 की सर्दी सूखी और कम वर्षा वाली थी। एक गड़रिये ने बताया कि 2 फिट 2 इंच बर्फ गिरी। ये मौसम में बहुत भिन्नता नहीं थी।

गड़रिये का निरीक्षण ग्लेशियर विशेषज्ञों के अनुसार था। लाहौल और स्पीति सबसे बड़े ग्लेशियर वाले जिले लगभग 2000 किमी में फैले हैं। पिछले 20 वर्षों में तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है और ग्लेशियर पतले हो रहे हैं।

बैठक से तय होना था गड़रिये के भाग्य

शाम को गांव के प्रतिनिधि, नम्बरदार एक पतली गली से ड्रम बजाते हुए लोगों को सभा के लिए बुलाया। ताराचन्द शीघ्र अनुमति के लिए आतुर था। उसने प्रत्येक दरवाजे को खटखटाया और सभा में आने की प्रार्थना की। उसके जानवरों का झुंड गांव के अंत में था। वह एक दिन के लिए भी वहां नहीं ठहर सकता था। उसको सुबह की किरण के साथ या तो मैदान पर जाना था या घर लौटना था। कई परिवार दिन के खाने का उत्सुकता पूर्वक इन्तजार करते हुए तन्दूर की आग के पास खड़े हुए थे। क्या लोग सभा से अपने आप को अलग रखेंगे?

एक-एक करके वे लोग ठंडी रात में 8.30 बजे रात में घरों से निकले। लगभग 15 लोग पतली गलियों से होकर गांव के बीच में आये और ताराचन्द ने अपना मामला रखा और प्रार्थना की कि यदि आप लोग रास्ता नहीं दोगे तो मैं घर लौट जाऊंगा। वापस उसी रूपी घाटी के घर में जिसे उसकी पत्नी ने समतल जगह को काटकर सीढ़ीनुमा बना दिया था। पास की सड़क कुछ घंटे चलने पर मुक्त होती थी।

अनाज, गधे और खच्चरों द्वारा घाटी पर लाया जा चुका था। छोटा सा कृषि उत्पादन का समय कृषि सामान्य रहने के लिए आश्वस्त करता था। दो महीने लंबे गर्मी के चारागाह की यात्रा से पहले ताराचन्द अपने घर के पास जानवरों के झुण्ड को चराता और जंगलों का निरीक्षण करता था।

यद्यपि रूपी घाटी में चारा बहुत था। जानवर मानसून के पानी की वजह से जल्दी बीमार हो जाते थे और भीगा हुआ चारा उन्हें पर्याप्त पोषण नहीं देता था। चरवाहे ठण्डे रेगिस्तानी मानसून से बचते थे।

संकट से जूझती बदलती परंपरा

कुछ चरवाहे अपना वार्षिक बर्फीले पुल को पार करना छोड़ चुके थे। अपने जानवरों को भाभा और रूपी घाटी के नीचे की ओर निचले स्थानों पर रखने लगे थे। 1980 से बहुत से चरवाहों ने अपनी भेड़ें बेच दी और सेब उत्पादक बन गये। वे अपने मौसम और बाजार पर रहते हुए 4 लाख से 20 लाख प्रतिवर्ष फलों से कमाते थे। यह जानवरों से मिलने आय से अधिक अच्छी थी।

ताराचंद की तरह अन्य चरवाहे जिनके पास पर्याप्त भूमि नहीं थी, वे इन घास के मैदान को 2500 रुपये में किराए पर लेते।

इस निवेश के लिए दूसरा रास्ता संबंधित पशुधन था। ताराचंद के 1,100 जानवरों के झुंड में से केवल 110 उसके अपने जानवर थे, जबकि उसके साथ के अन्य 3 चरवाहों के पास 100 से 50 झुण्ड के जानवरे थे। पुराने दिनों में जहां पर 400 से 800 जानवरों की चराई होती थी वहीं अब 1000 से 1300 पशुओं की चराई होती है।

चरवाहों ने जरूरत से ज्यादा चरागाह का इस्तेमाल किया। कई प्रकार के चारे गायब हो गये और कई जहरीली जड़ें फैल गईं। जलवायु परिवर्तन की समस्या चौतरफा वृद्धि हुई।

चरवाहों को अपनी भेड़ को जिन्दा रखने के लिए और अधिक चराई की जरूरत है। कुछ चरवाह स्फीति घाटी के नए क्षेत्रों एंसा और काजा में निकले गये। और कुछ दूसरों ने बकरियों के लिए इतना उच्च मूल्य देना उचित नहीं समझा।

मौजूदा समस्याओं के साथ, एक संकट चरवाहों के लिए और खड़ी हो गयी। जलवायु परिवर्तन की मार सेब पर पड़ी। शीतोष्ण फलों को 90 दिन ठंडी और 4 से 5 इंच की बर्फबारी की आवश्यकता होती है। जबकि कई लोग इस अधिक लाभ देने वाली पैदावार को छोड़ चुके हैं। किन्नौर में कई सेब उत्पादकों ने उत्पादकता कम होने की बात कही है। किन्नौर के लोग जो पशुधन का कार्य छोड़ चुके हैं वह वापस इस काम में आ रहे हैं। जबकि उन्हें अधिक चराई की आवश्यकता होगी।

चुमुर्ती गांववाले, चराई करते घोड़े [image by Janaki Lenin]

चुमुर्ती गांववाले, चराई करते घोड़े [image by Janaki Lenin]

पिन घाटी के बेशकीमती घोड़ों ने समान उच्च पर्वतीय चरागाह में अपना भोजन प्राप्त किया। इसके नाराज गांववालों ने चरवाहों से इस प्रकार चराई के लिए शिकायत की। जबकि चरवाहे अधिक चराई वाले क्षेत्रों में जा चुके थे। गांववालों के पास अब कम उपयोगी भूमि बची थी। ये समस्या चौपाल में ताराचन्द के सामने उठने वाली थी जिस पर ताराचन्द का भाग्य टिका था।

खराव चराई

वन्यजीव वैज्ञानिकों ने इन उच्च अक्षांशों में चराई पर ध्यान केन्द्रित किया और पाया कि हिमालयन आईबेक्स और भारल जैसे जंगली शाकाहारी से दबाव पड़ा है। यहां पर पेड़-पौधे गर्मी के कुछ महीनों के लिए उगते हैं। जब पशु इन्हें बार-बार चरते रहते हैं तो इन पौधों के उगने की संभावना नहीं रहती है। और न ही जानवरों के लिए कुछ बचता है।

अभिषेक घोसाल प्रकृति संरक्षण संघ से डाक्टरेट की छात्रा, जिन्होंने चरवाहों के ऊन निर्माण, डिजाइन और इसके लिए बाजार की तलाश पर एक प्रारंभिक सर्वे किया।

स्पीति के कुछ गांवों में इस प्रकार के कार्य एनजीओ द्वारा चलाए जा रह थे। महिलाएं लंबी सर्दियों में ऊन बुनने का कार्य करतीं। और इनको स्नो लेपर्ड वेबसाइट पर अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को बेचती हैं। रुपये सीधे गांव वालों के पास आता है। इस कार्यों का उद्देश्य जंगली शिकारियों से हुए नुकसान की भरपाई करना है।

क्या ऐसे कार्य दूसरे स्थानों में भी हुए? चरवाहों को इन कार्यों से कमाई होती है तो चरवाहे पशुधन पर नियंत्रण कर सकते हैं? ज्यादातर चरवाहों से बातचीत में यह बात सामने आई कि चरवाहों की पशुधन में अनिच्छा के कारण भी पशुओं की संख्या में कमी आई। इन ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में कम उपभोगी जीवन व्यतीत करने वाले न ही गांववाले और न ही चरवाहे, जलवायु परिवर्तन को नियन्त्रण करने के लिये कुछ कर सकते हैं लेकिन यह पिन नदी के पुल के पास और संगम गांव के पास चराई को नियंत्रित कर सकते हैं।

संगम गांव और पिन नदी के ऊपर पुल [image by Janaki Lenin]

संगम गांव और पिन नदी के ऊपर पुल [image by Janaki Lenin]

उसकी शक्तियों से परे एक बलि का बकरा

ताराचंद के निवेदन के करने और एक तरफ खड़े होने के बाद गांव वाले आपस में चर्चा करने लगे कि उसे गांव से रास्ता दिया जाए।   एक ने कहा “उस पर दया करो। और उसे यहां से जाने दो। यह उसकी गलती नहीं है कि बर्फ का पुल गल गया” इस बात पर अन्य लोगों ने सिर हिलाकर अपनी सहमति दी। “ये चरवाहे हमारे नियमों को नहीं तोड़ेंगे” एक ने कहा। बस बहुत हुआ ये 1500 जानवर लाये हैं और बताया कि 500 खरीदे हैं।” इस तर्क पर कुछ अन्य लोगों ने सहमति दिखाई। अंततः सुबह 3 बजे ये लोग निर्णय पर पहुंचे। और यहां से जाने की अनुमति नहीं दी। इस प्रकार वह किन्नौर चरवाहों के कारण बलि का बकरा बना।

बिना एक खाना खाए, ताराचंद और उसके चार साथी चरवाहे 10 दिनों तक प्रतिदिन 10 किलोमीटर चले। अगर खड़ी ढाल से एक जानवर घायल हो जाए तो उनको खाने के लिए मांस मिल जाता। अन्यथा उनके पास चावल का ढेर या भेड़ या बकरी के दूध के साथ चपातियां हैं। हालांकि कभी-कभी आलू, धाल खाने को मिला। शाकाहारी और मेवे महंगे थे। उन्होंने साधारण खाना खाया जबकि उनके पास चर्बीदार जानवर थे। वे थके हुए थे।

कुछ दयावान गांववालों ने ताराचंद को सलाह दी कि धारा के उस पार बर्फ का पुल मिलने की संभावना है। उनके पास वापस जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। उसने गांव वालों की सलाह मानी और अपना चराई का स्थान पाने के लिए पहाड़ पर दो दिन पैदल सैकड़ों किलोमीटर चला।

जल्दी दोपहर के बाद उनको बर्फ का पुल मिला। जहां पर चरवाहों ने सबसे पहले बकरी को छोड़ा फिर भेड़ को। इसके बाद ताराचंद ने पीछे लाये गये गधे को छोड़ा।

(यह आलेख पारिस्थितिकी सुरक्षा संघ, अर्थ जर्नालिज्म नेटवर्क और www.thethirdpole.net द्वारा अनुदान  सहायता प्राप्त है जिसे पहली बार The Wire में प्रकाशित किया गया था।)

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