जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क सम्मेलन का आयोजन माराकेच, मोरक्को मे होने जा रहा है। पेरिस समझौते के अंतिम सम्मेलन का माहौल उम्मीदों से भरा होने की संभावना है  क्योंकि 2016 में दो महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर मुहर लगनी है। एक अंतरराष्ट्रीय उड्डयन संस्थान का यानों के उड़ान द्वारा होने वाले ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को कम करना और दूसरा मॉन्ट्रियल  प्रोटोकॉल में संशोधन जिसमें शक्तिशाली ग्रीन हाउस गैसों को हटाना है।

इसके अतिरिक्त अन्य कारण पेरिस समझौते पर अनेक राष्ट्रों का मंजूरी देना है और जो प्रारंभिक हस्ताक्षर के बाद एक साल से अंदर कानूनी प्रभाव में आ जाएगी।

लेकिन वास्ततिकता में यह उम्मीद अस्थायी है, क्योंकि नीति निर्धारकों के अनुसार सरकारों द्वारा लिए गए संकल्प, जो पेरिस समझौते के तहत राष्ट्रीय निर्धारित योगदान के स्वरूप में है, (एनडीसी, जो पहले आईएनडीसी था, जिसे यूएनएफसीसीसी ने बात में हटा दिया गया था) को उसे जारी रख पाना इतना आसान नहीं होगा।

उसके साथ ही, औद्योगिकरण के पहले से औसत वैश्विक तापमान को दो डिग्री सेल्सियस के अंदर बनाए रखने और पेरिस समझौते के महत्वाकांक्षी लक्ष्य 1.5 डिग्री तापमान की सीमा को नजर अंदाज कर दिया। एनडीसी ने इसके सम्पूर्ण कार्यान्वयन में 2.7 डिग्री तापमान की बढ़ोतरी को जोड़ा है।

यूनएनएफसीसीसी सचिवालय ने जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसी) से अपनी सिफारिशों के माध्यम से अनुरोध करते हुए कहा है कि कैसे कोई देश 1.5 डिग्री तापमान की सीमा के लक्ष्य की ओर बढ़ सकता है और आईपीसी इससे संबंधित अपनी विशेष रिपोर्ट को 2018 में प्रस्तुत करेगा, उसी साल में पेरिस समझौते की पहली समीक्षा भी आएगी।

प्रारम्भिक चिंता

अभी वार्ताकारों का समूह 7 से 18 नवंबर में पेरिस समझौते के क्रियान्वयन की प्रारम्भिक  चिंताओं के संदर्भ में मैरकैचेर में मिलेंगे। कोई भी निर्णय जब क्रियान्वयन के चरण तक आता है तो उससे पहले विकसित बनाम विकासशील देशों की बहस के बीच फंस जाता है।

पेरिस समझौते के बाद से पिछले 11 माह से, वार्ताकार अभी तक इस निर्णय पर नहीं पहुंच पाए हैं कि क्या वे समर्थन के लिए शिखर वार्ता में उपस्थित रह सकते हैं या नहीं?

यह विशेषतौर पर यूएनएफसीसीसी की वार्ताओं के इतिहास में चिंता का विषय रहा है। क्योटो प्रोटोकॉल जो 1997 में लागू होना था लेकिन अमीर देशों की ग्रीन हाउस गैंसों के उत्सर्जन में कमी के विषय के चलते अगले 8 साल बाद इस पर पूर्ण सहमति बन पायी। हालांकि अमेरिका ने अभी तक अपनी सहमति नहीं दी है।

एकल व्यवस्था का न होना

पेरिस समझौते के क्रियान्वयन की जानकारी के लिए कोई एकल व्यवस्था नहीं बन पायी है। इसके पहले कारण के रूप में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को पूरी दुनिया लगातार बढ़ते तापमान, समुद्र जलस्तर में होती वृद्धि, सूखा, बाढ़, ग्लेशियरों के दूर जाने, हिमखंडों का पिघलना के रूप में देख रही है और दूसरा कारण पेरिस समझौते का 2020 के बाद प्रभाव में आना है।

पूरा विश्व 2020 से पहले क्या कर रहा है? इससे सबंधित मुद्दे कई विवाद पैदा करेंगें, क्योटो प्रोटोकॉल अपने दूसरे चरण के क्रियान्वयन की ओर है, लेकिन अधिकतर औद्योगिक देश इसे बेअसर देखते आए हैं, और 2020 से पहले के कार्य को समायोजित करने में लगे हैं हालांकि वह व्यापक तौर पर वार्ताकारों के माराकेच के एजेंडे से काफी अलग है।

खास तौर पर यह बहुत खतरनाक हो सकता है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के माध्यम से आगाह किया गया है कि 2020 तक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन क्षीण होना ही चाहिए और अगर दुनिया के पास कोई अवसर है तो वो वैश्विक तापमान को औसतन 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा तक करने का है।

आर्थिक चिंता

विकासशील देशों की आर्थिक चिंता है क्योंकि उन्हें उत्सर्जन कम करने एवं जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को क्षीण करने के प्रयासों के लिए आवश्यक धन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। 2009 में कोपेनहेगन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में यूएस सेक्रेट्री ऑफ स्टेट हिलेरी क्लिंटन ने वादा किया था कि अमीर देश प्रत्येक वर्ष 2020 तक 100 मिलियन डॉलर इस उद्देश्य के लिए देंगे, इसे पूरे दशक भर आर्थिक सहायता के लिए उपयोग किया जाएगा।

यह विकसित देशों के बीच संकल्प बन गया और तभी से इनके बीच विवाद का विषय भी बन गया। अमीरों देशों के समूह ओईसीडी के हिसाब के अनुसार जलवायु वित्त के लिए गरीब देशों को पिछले साल तक लगभग 63 बिलियन धन मुहैया कराया जा चुका है और विकासशील देश धन को प्राप्त करने के आंकड़े का दावा तो करते हैं और साथ ही इन देशों पर दिए गए धन को दो बार गिनने, लोन और ग्रान्ट देने का आरोप भी लगाते हैं।

इसी वर्ष ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया ने भी इससे मिलते जुलते आंकड़े प्रस्तुत किए हैं और इसकी तरह के कई और तर्क दिए जा रहे हैं। विकासशील देशों का कहना है कि हरित जलवायु कोष, जीसीएफ यूनएफसीसीसी का मुख्य वित्तीय माध्यम है, जो 10 अरब डॉलर से अधिक का कोष है।

औद्योगिक देशों के वार्ताकारों द्वारा 2020 के पूर्व के सरकारी एजेंडे को मोटे तौर पर एवं विकासशील देशों के उनके समकक्षों को इस बारे में बहुत परेशान किया जा रहा है, इसी संदर्भ में दो दिवसीय माराकेच शिखर सम्मेलन के दौरान मेजबान मोरक्को एक उच्च स्थरीय सुविधाजनक संवाद का आयोजन करेगा। कुल देशों का इस बैठक से दूर रहने की आशंका है।

विवरण में गड़बड़ी

सभी दिग्गज जलवायु वार्ताकार और पर्यवेक्षकों को अंदाजा है कि सरकारों के बीच व्यापक समझौते तक पहुंचना अपेक्षाकृत आसान कदम है क्योंकि गड़बडी की ज्यादा संभावनाएं विवरण में होती है। इसी वजह से अगले दो सप्ताह में मोरक्को में इकट्ठा होने वाले अधिकतर वार्ताकार कुछ सार्थक पहल होने को लेकर आशंकित है। लेकिन इस बार कुछ सफल वार्ताएं हुई हैं।

अंतराष्ट्रीय उड़ानों से होने वाले उत्सर्जन को नियंत्रण करने लिए आईसीएओ समझौते पर सभी सरकारों का समर्थन नहीं मिला है। लेकिन कम से कम अनेक प्रतिरोधों के बाद इस क्षेत्र में कुल सार्थक शुरूआत तो हो रही है।

इस साल के एक अन्य बड़े विकासात्मक कार्य के रूप में मॉन्ट्रियल प्रोटाकॉल का संशोधन है जिसमें भारत सहित अन्य देशों ने, जो शुरुआत में एचएफसी को लेकर इसका विरोध कर रहे थे, अपना समर्थन दिया है। एचएफसी को लेकर समझौते में हुई देरी ज्यादा मायने नहीं रखती और वास्तव में यह संशोधन कूटनीतिक सफलता का उदाहरण है जो भविष्य में जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में मददगार सिद्ध होगा।

प्रभावों से निपटना

ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन के शमन को कैसे संभालना है? इसके ज्यादा सफल उदाहरण मौजूद नहीं है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के क्या प्रभाव होंगें, जिन आधारों पर उन्हें स्वीकार किया जा सके, जो देश इसके स्वीकार करने के प्रयास में असमर्थ हुए वहां इसका नुकसान और खतरा पहले से ही दिखाई दे रहा है ।

विकासशील देशों का इन एजेंडों पर बहुत लम्बे समय से संघर्ष चल रहा है लेकिन इस मुद्दे पर उसे पूरी तरह से विकसित देशों से लड़ाई करनी होगी और जो इन मुद्दों पर बातचीत के लिए अस्पष्ट स्तर पर बने हुए हैं। अनेक विकासशील देशों में अनूकूलन प्रोजेक्ट चल रहे है लेकिन उनकी संख्या में बढ़ोतरी की आवश्यकता है, इस स्थिति में इस बात पर भी सोचना होगा कि यूएनएफसीसीसी का अनूकूलन कोष का धन समाप्त होने पर जा गया है और जीसीएफ अब तक केवल 17 प्रोजेक्ट के लिए ही सहमत हो पाया है।

विशाल क्षेत्र पर हुए अनेक अध्ययनों के अनुसार में जलवायु परिवर्तन के कारण आपदाओं, बाढ़, तूफान, जिसकी वजह से भारी नुकसान होता है, की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।

जलवायु कार्यकर्ता एवं विकासशील देश के बीच विशेषतौर पर सबसे गरीब देशों ने इन मुद्दों को यूएनएफसीसीसी वार्ताकारों के एजेंडे में शामिल करने के लिए कठिन और लम्बी लड़ाई लड़ी है।

2013 जलवायु सम्मेलन में नुकसान और क्षति को स्वीकार करने और उपरोक्त दायित्वों को छोड़ने की सहमति के लिए वॉरसॉ अतंर्राष्ट्रीय तंत्र को समयोजित किया गया लेकिन इस मुद्दे पर अमीर देशों में विशेषतौर पर अमेरिका कोर्ट केस से डरा हुआ था। यह तंत्र इस साल सम्मेलन में समीक्षा के लिए आएगा और देखने वाली बात है कि अब तक गरीब देशों ने जो भी हासिल किया है वे उसके लिए लड़ सकते हैं और इस क्षेत्र के लिए एक अलग कार्यक्रम बना सकते हैं।

जलवायु न्याय पर चिंता

माराकेच सम्मेलन से कुछ दिन पहले भारत के लिए पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे ने जलवायु न्याय पर देश की लम्बे समय से जारी मांग को दोहराते हुए कहा है कि अमीर देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अधिक प्रयास करने चाहिए और उन्हें गरीब देशों की मदद करनी चाहिए क्योंकि सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन से पर्यावरण को प्रदूषित करने का काम अमीर देशों द्वारा ही किया गया है।

इस विषय पर सिद्धान्त के तौर पर बहस नहीं की जा सकती लेकिन अमीर देशों द्वारा लगातार व्यवहारिक तौर पर बहस की जा रही है। वास्तव में अनेक चिंतकों की गणना के अनुसार विकासशील देश, अमीर देशों की तुलना में अपने सकल घरेलू उत्पाद का अधिकतम हिस्सा उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए खर्च कर रहे है। इस मामले को अनेक सरकारों और परिवेक्षकों ने मौखिक तौर पर रखा है पर अधिकारिक वार्ता में इसके सीमांत रहने की संभावना है।

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