दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की तर्ज पर दिल्ली में भी 22 अक्टूबर को एक छोटा सा हरित कदम उठाया गया जब यहां ‘कार-फ्री डे’ की शुरुआत हुई। इस दौरान प्रदूषण के स्तर में जबरदस्त गिरावट दर्ज की गई।

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और अन्य कैबिनेट मंत्रियों के साथ हजारों लोगों ने इस मौके पर कार छोड़कर दिल्ली की सड़कों पर साइकिलें दौड़ाईं। यह प्रयास इसलिए भी बेहद अहम है क्योंकि कुछ स्वतंत्र अध्ययनों की मानें तो दिल्ली में हर घंटे वायु प्रदूषण के कारण एक शख्स की मौत हो जाती है।

पर्यावरण के लिहाज से बेहतर साइकिल सवारी को प्रोत्साहित करने और सार्वजनिक परिवहन के उपयोग के लिए लोगों को प्रेरित करने के उद्देश्य से ये साइकिल रैली निकाली गई। सुबह सात बजे से लेकर 12 बजे तक लाल किले से लेकर भगवान दास रोड (तकरीबन 7 किलोमीटर) तक कार-फ्री जोन रहा। इस रास्ते में सात बड़ी ट्रैफिक क्रॉसिंग हैं।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) के अनुसार पहले कार फ्री डे ने बहुत बड़ी सफलता हासिल की है। सीएसई की खुद की निगरानी के हिसाब से इस दौरान पीएम2.5 स्तर में 60 फीसदी की कमी आई। ये बहुत सूक्ष्म कण डायमीटर में 2.5 माइक्रोंस से भी छोटे होते हैं जो हमारे फेफड़ों में बहुत गहरे तक पहुंच जाते हैं और सांस संबंधी अनेक बीमारियों के कारण बनते हैं। सीएसई की तरफ से कहा गया कि जिन रास्तों पर कार-फ्री डे की रैली निकली वहां पीएम2.5 स्तर 689 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से गिरकर 265 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर रह गया।

दिल्ली के परिवहन मंत्री गोपाल राय ने www.thethirdpole.net से बातचीत में कहा, ये क्रांति जरूरी है क्योंकि लोग जहरीली हवा में सांस लेने के लिए मजबूर हैं। दिल्ली में कार लोगों के लिए स्टेटस सिंबल बन चुकी हैं लेकिन हमें ये भी समझना होगा कि उनकी जिंदगी, कार से ज्यादा अहमियत रखती है। अब से हम हर महीने की 22 तारीख को कार-फ्री डे मनाएंगे।

इसका मतलब ये नहीं है कि पूरी राजधानी को हर महीने की 22 तारीख को कार-फ्री कर दिया जाएगा। ये एक जागरूकता अभियान है जो शहर के विभिन्न हिस्सों में चलाया जाएगा। अगला कार-फ्री डे अभियान दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के रोहिणी में होगा। राय कहते हैं, “हम सुनिश्चित करेंगे कि लोग धीरे-धीरे कार छोड़कर सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल शुरू करें।“
वैसे, अच्छे सार्वजनिक परिवहन साधन न होने के कारण लोग इनके इस्तेमाल से बचते हैं। इस पर परिवहन मंत्री का कहना है, “हम अगले छह महीनों में 2,000 नई बसें खरीदने जा रहे हैं। हमने पहले ही परिवहन व्यवस्था को दुरुस्त करने को लेकर काफी शोध कर रखा है। हमने कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों को भी देखा है कि जिसमें बताया गया है कि किस तरह हम सार्वजनिक परिवहन को बेहतर और आकर्षक बनाया जा सकता है।

वैसे, दिल्ली के पड़ोसी शहर गुड़गांव में ऐसा ही कार फ्री डे अभियान हर मंगलवार को होता है। पर, दिल्ली के 2.5 करोड़ लोगों के लिए यह बेहद अहम है जिनके कारों के इस्तेमाल का सीधा असर यहां की हवाओं की गुणवत्ता पर पड़ता है। दिल्ली में पहले से ही 88 लाख वाहन हैं और रोजाना तकरीबन 1,400 नए वाहन सड़कों पर उतरते हैं। केवल पिछले साल की ही बात करें तो वाहनों का रजिस्ट्रेशन 14 फीसदी बढ़ा है। मुंबई, कोलकाता और चेन्नई को मिलाकर जितने निजी वाहन हैं उससे ज्यादा अकेले दिल्ली में हैं। दिल्ली के नये आर्थिक सर्वेक्षण (2014-15) के मुताबिक पिछले 15 साल के दौरान कारों की तादात में 2.7 गुना इजाफा हुआ है।

यहां वायु प्रदूषण के कारण लोगों का जीना दूभर है। सर्दियों के मौसम में तो हालात और भी ज्यादा खराब हो जाते हैं। एक अध्ययन में बताया गया है कि वायु प्रदूषण के कारण दिल्ली में हर तीसरा बच्चा कमजोर फेफड़ों से जूझ रहा है।

बेहतर शुरुआत

इस समस्या के समाधान की दिशा में ये एक बेहतरीन पहल है। सीएसई ने 22 अक्टूबर को प्रदूषण स्तर में गिरावट का आकलन करने के लिए दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति के अधिकारियों के जरिये पूरे शहर में वायु गुणवत्ता निगरानी की। इसमें पाया गया कि शहर में पीएम2.5 स्तर में कुल 45 फीसदी की गिरावट आई।

हालांकि केवल जागरूकता अभियान चलाने भर से ही वायु प्रदूषण में गिरावट नहीं लाई जा सकती। दशहरा होने के कारण इस दिन राष्ट्रीय अवकाश था जिससे पहले से ही सड़कों पर कम वाहन थे। अभियान कितना प्रभावी है, इसका पता आने वाले महीनों में पता चल सकेगा।

इस बीच पर्यावरण से जुड़े विशेषज्ञों ने दिल्ली सरकार की इस पहल का स्वागत किया है। सीएसई की एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर (रिसर्च एंड एडवोकेसी) अनुमिता रॉयचौधरी कहती हैं, “दिल्ली सरकार की इस पहल से ये साबित करने में मदद मिलती है कारों की संख्या में इजाफे से हमारे शहर की हवा में जहर घुल रहा है। अगर कारों की संख्या नियंत्रित हो जाए तो प्रदूषण अपने आप कम होने लगेगा।“

वैसे, कारोबार की दुनिया का आकलन कुछ अलग ही है। एक अनुमान के मुताबिक 2021 तक कारों की सवारी करने वालों की तादात में 106 फीसदी का इजाफा होगा जबकि बसों में सफर करने वालों की वृद्धि महज 28 फीसदी होगी।

इससे एक बात तो साफ है कि केवल जागरूकता अभियान ही पर्याप्त नहीं है। रॉयचौधरी कहती हैं कि प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में रोजाना कार के इस्तेमाल को नियंत्रित करने जैसे कदम भी उठाये जाने की भी जरूरत है। अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को कारों के ऊपर दिए जाने वाली छिपी सबसिडी खत्म कर देनी चाहिए। आज, एक बस मालिक, एक कार मालिक की तुलना में 9 गुना ज्यादा रोड टैक्स अदा करता है।

कार-फ्री डे के साथ ही दिल्ली सरकार की डेल्ही डायलॉग कमीशन (डीडीसी) और शिकागो विश्वविद्यालय के बीच एक समझौता हुआ है जिसका मकसद राजधानी की वायु और जल की गुणवत्ता में सुधार करना है। इस समझौते में जमीनी स्तर की विशेषज्ञता को सामने लाने के उद्देश्य से एक प्रतियोगिता – अर्बन लैब्स इन्नोवेशन चैलेंज डेल्ही- का आयोजन कराना भी शामिल है। बेहतरीन सुझावों और विचारों को यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो अर्बन लैब्स इनीशिएटिव द्वारा फंड उपलब्ध कराया जाएगा।

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