भारत में जून के आरंभ में हर साल दस्तक देने वाले मॉनसून, जैसी कि आशंका जताई भी गई थी, इस साल उम्मीद से कम बारिश लेकर आया. मौसम विज्ञानी, किसान और अर्थशास्त्री जो इस बार औसत से कम बारिश वाला वर्ष होने की आशंका से भरे, आकाश की ओर टकटकी लगाए रहे. प्रशांत महासागर में पैदा होने वाला अल नीनो नामक दक्षिणी हलचल (ईएनएसओ) बिखर रहा है, उसको देखते हुए ऐसे आसार हैं कि यह दक्षिणी एशिया के हिस्से की बारिश उड़ा ले जाएगा और सूखा पड़ सकता है.

यह बुरी खबर है क्योंकि दक्षिणी एशिया में होने वाली कुल बरसात का 70 से 80 प्रतिशत, जून से लेकर सितंबर तक के चार महीनों में होता है. भारत के 60 फीसदी से ज्यादा किसान अपनी मुख्य फसलों के लिए इसी बारिश पर निर्भर रहते हैं.

सुलोचना गाडगिल की निगाहें उपग्रह से मिलने वाली हिंद महासागर की तस्वीरों पर गड़ी हैं. बंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान में वायुमंडलीय और समुद्र विज्ञान की मानद प्रोफेसर गाडगिल की नजर एक और स्पंदन पर जमी हुई है जिसे इक्वेटोरियल इंडियन ओसिन ऑसिलेशन यानी इक्विनो का नाम दिया गया है. गाडगिल बताती हैं कि इस स्पंदन का भारतीय मॉनसून पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा और इसमें अल नीनो के कारण हुई मॉनसून की क्षति की भरपाई की क्षमता है.

इक्विनो हिंद महासागर के पूर्वी और पश्चिमी हिस्से के बीच के वायुमंडलीय स्थितियों का झूला है. आम तौर पर भारत में जब ग्रीष्म ऋतु होती है, उस दौरान हिंद महासागर का पूर्वी भूमध्य भाग जो पश्चिमी भाग से ज्यादा गर्म होता है, के ऊपर बादलों की प्रचुर सघनता देखी जाती है. मॉनसून के चार महीनों में कुछ साल पूर्वी हिंद महासागर क्षेत्र में औसत से अधिक बादल निर्माण होता है तो कुछ साल पश्चिमी क्षेत्र में बादल ज्यादा सघन होते हैं. मॉनसून भारत में अच्छा तब होता है जब हिंद महासागर के पश्चिमी भाग में सघन बादल हों और पूर्वी भाग में कम.

अल नीनो का स्थान कारक

अल नीनो के कारण भारत के मॉनसून पर आने वाला संकट इस बात पर निर्भर करता है कि प्रवाह किस ओर अवस्थित है? अगर अल नीनो केंद्रीय प्रशांत महासागर में है तो उसका उप-महाद्वीप की ओर बारिश ले जाने वाली हवाओं पर गहरा असर होगा. पानी के गर्म बुलबुलों के कारण समुद्रतल का तापमान बढ़ जाता है और इससे महासागर के ऊपर की हवा भी तप जाती है. फैलती हुई गर्म हवा ऊपरी वायुमंडल में सर्कुलेशन सेल्स बना देती हैं जो हवा को उस ओर खींचती है. हिंद महासागर इस नीचे की ओर उतरती हवा के क्षेत्र में पड़ता है इसलिए यहां पहुंचने वाली मॉनसूनी हवाएं बाधित रहती हैं. अल नीनो जितना ताकतवर होगा, नुकसान उतना अधिक होगा.

19वीं सदी के उतरार्ध में भारत में आए छह बड़े सूखे अल नीनो जनित सूखे रहे हैं. इनमें 2002 और 2009 का सूखा भी शामिल है. लेकिन सभी अल नीनो वर्ष सूखे या सामान्य से कम वर्षा वाले साल नहीं रहे हैं. इसके कारण भारतीय मॉनसून के पूर्वानुमान कई बार आसाधारण रूप से गलत साबित हुए हैं.

 

गाडगिल और उनके सहकर्मियों ने मॉनसून के पूर्वानुमान की असफलता के कारणों की समीक्षा के दौरान 2003 में इक्विनो की खोज की थी. गाडगिल कहती हैं, “1997 में अल नीनो बहुत प्रबल था इसलिए सबने यह अंदाजा लगाया कि इस तो साल सूखा पड़ेगा. लोगों ने इसके आधार पर सूखे की भविष्यवाणी की थी लेकिन उस साल औसत से अधिक बरसात हुई. शोधपत्र तक लिखे गए कि अल नीनो के कारण मॉनसून को होने वाला नुकसान अब पहले जैसा नहीं रहा. लेकिन 2002 में अल नीनो फिर आया. हालांकि वह 1997 के मुकाबले काफी कमजोर था फिर भी भयंकर सूखा पड़ा. लोग समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर यह हो क्या रहा है. हो न हो इसके पीछे कोई और वजह तो है.”

गाडगिल औऱ उनके सहयोगियों का मानना है कि दक्षिण एशियाई मॉनसून मुख्य रूप से दो कारकों पर निर्भर करता है- अल नीनो की ताकत और इक्विनो की स्थिति. अगर अल नीनो मजबूत है तो भारत में सूखे की संभावना बढ़ जाती है लेकिन अगर इक्विनो पश्चिमी हिंद महासागर में अवस्थित हो जाए तो वह बारिश लाकर अल नीनो की काट कर सकता है. अगर अल नीनो कमजोर है तो मॉनसून के अच्छा होने की संभावना है लेकिन साथ ही साथ अगर इक्विनो हिंद महासागर के पूर्वी हिस्से में प्रभावी है तो वह सूखे की स्थिति पैदा कर देगा.

इसके अलावा केंद्रीय प्रशांत में अल नीनो बनने से पूर्वी हिंद महासागर के क्षेत्र में बादल निर्माण कमजोर पड़ जाता है जो भारतीय मॉनसून के लिए उपयुक्त स्थितियां पैदा करता है. गाडगिल के मुताबिक 1997 में अल नीनो और इक्विनो को बीच एक जबरदस्त खींचतान देखने को मिली और इस वजह से मॉनसून सामान्य रहा. हिंद महासागर के पश्चिमी भूमध्यीय इलाकों में बादल सघन रहे जिससे ऊप-महाद्वीप में अच्छी बारिश हुई. 2002 में अल नीनो और इक्विनो मिल गए. हिंद महासागर में बनने वाले बादल ज्यादातर पूर्वी हिंद महासागर में रहे. इस वजह से सूखा पड़ा.

इक्विनो की स्थिति इस साल अच्छी है

हिंद महासागर में वायुमंडल के मिजाज पर नजर गड़ाए रखने वाली गाडगिल बताती हैं कि गर्मी के महीनों में इक्विनो की स्थिति एक अच्छे मॉनसून वाले साल के लिहाज से उपयुक्त थी लेकिन वायुमंडल का मिजाज बदलता रहता है.

इक्विनो एक नई खोज है इसलिए जलवायु के मॉडल इक्विनो की भविष्यवाणी करने या मॉनसून और इक्विनो के बीच के संबंधों का सटीक अनुकरण करने में अभी समर्थ नहीं हैं. करंट साइंस नामक पत्रिका के संपादकीय में गाडगिल लिखती हैं कि जहां अल नीनो के आधार पर भारत के मॉनसून में के 29 प्रतिशत फेर-बदल की व्याख्या की जा सकती है वहीं इक्विनो के आधार पर अतिरिक्त 19 फीसदी फेरबदल का पता लगाया जा सकता है. हिंद महासागर में बादल निर्माण में अल नीनो के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए अल नीनो और इक्विनो दोनों को मिलाकर मॉनसून के फेर बदल के आधे से ज्यादा की व्याख्या की जा सकती है और इससे आज के मुकाबले मॉनसून की बेहतर भविष्यवाणी की जा सकती है.

गाडगिल को आशा है भारतीय जलवायु की भविष्यवाणी को ज्यादा सटीक बनाने के लिए इक्विनो का अवलोकन और उसके प्रतिमानों के अध्ययन को गंभीरता के साथ बड़े पैमाने पर किया जाएगा. वह बताती हैं, “मैं निजी तौर पर उम्मीद रखती हूं कि अगले पांच से दस साल के भीतर हम निश्चित तौर पर ऐसा करने में सफल रहेंगे.”

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