सत्ता से कांग्रेस की बेदखली के बाद नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली नई सरकार की तरफ से मंत्रियों के चयन से पर्यावरणविदों को सुखद आश्चर्य हुआ है।

प्रकाश जावड़ेकर को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री बनाया गया है। जलवायु परिवर्तन शब्द इस मंत्रालय में नया जोड़ा गया है। उमा भारती जल संसाधन और गंगा सफाई मंत्रालय दिया गया है।

अब तक संसद में विपक्षी खेमे में बैठने वाले जावड़ेकर ग्लोब नाम संगठन से सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं। ग्लोब समावेशी विकास को आगे बढ़ाने के लिए एक वैश्विक कानून बनाने वाला संगठन है। यह समूह पिछले वर्षों में जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में सक्रिय है।

जावेड़कर इंडिया चैप्टर के पहले अध्यक्ष थे और रियो 20 जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में एक मुखर भागीदार रहे हैं।

हालांकि जावड़ेकर की नियुक्ति को लेकर दो चिंताएं भी हैं। पहला यह कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन ही उनके पास अकेला मंत्रालय नहीं है, बल्कि वह सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भी संभाल रहे हैं। लंबे समय तक भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता होने के नाते यह उनके रुचि का क्षेत्र है। सवाल यह है कि दोनों मंत्रालयों के कामकाज को देखने के लिए जावड़ेकर अपने समय को किस तरह बांटते हैं।

दूसरी चिंता का कारण यह है कि जावड़ेकर उन लोगों में शामिल हैं जो अब तक पर्यावरण मंत्रालय की इस बात को लेकर आलोचना करते रहे हैं कि वह उद्योग और बुनियादी ढांचागत सुविधाओं से जुड़ी परियोजनाओं को अनुमति देने में अड़ंगा डालता है, जबकि ये परियोजनाएं पर्यावरण के लिए खतरे का कारण थीं।

भारत में पिछले कई वर्षों से इसे कथित विकास बनाम पर्यावरण की बहस के रूप में जाना जाता है।

पर्यावरणविदों को उम्मीद है कि सर्वोच्च न्यायालय इस पूरे प्रकरण को मंत्रालय से अपने हाथ में ले लेगा और एक स्वतंत्र नियामक को सौंप देगा, जिसका नाम राष्ट्रीय पर्यावरण मूल्यांकन एवं निगरानी प्राधिकरण हो सकता है।

स्वतंत्र पर्यावरणविद रमन मेहता ने द थर्डपोल डॉट नेट से कहा, इस कदम का सकारात्मक पक्ष यह है कि प्रशासन जलवायु परिवर्तन के महत्व को स्पष्ट रूप से समझेगा। यह मनेगा कि जलवायु परिवर्तन एक अहम मुद्दा है और इस मुद्दे पर काम करने की जरूरत है। हालांकि पर्यावरण को लेकर जावड़ेकर विश्वसनीयता के बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।

मैं उम्मीद करता हूं कि वह एक ऐसे पर्यावरण मंत्री साबित होंगे जो परियोजनाओं को तेजी मंजूरी दिलाने के लिए इससे संबंधित नियामक प्रक्रियाओं और संरचनाओं को कमजोर करने के बजाय इसे लागू करने का प्रयास करेंगे।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट के थिंक टैंक चंद्र भूषण, पर्यावरण मंत्रालय में जलवायु परिवर्तन को जोड़े जाने का स्वागत करते हैं। वह कहते हैं, सांकेतिक रूप से यह बेहद अहम कदम है क्योंकि इससे यह प्रदर्शित होता है कि भारत, जलवायु परिवर्तन को लेकर गंभीर है। हम इस कोशिश का स्वागत करते हैं।

गंगा की सफाई

उमा भारती को नया जल संसाधन मंत्री बनाया गया है। साथ ही उन्हें गंगा सफाई नामक नये मंत्रालय का जिम्मा भी सौंपा गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की सबसे पवित्र नदी की सफाई का वादा किया था। इसके अलावा वह हिंदुओं के सबसे प्रमुख तीर्थ स्थल वाराणसी से सांसद भी चुने गए हैं। वाराणसी विश्व के सबसे पुराने शहरों में से एक है। तकरीबन 5,000 साल पुराना यह शहर विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में से भी एक है।

गंगा किनारे बसे एक अन्य प्रदूषित शहर कानपुर में इको फ्रेंड नामक एक गैर-सरकारी संस्था (एनजीओ) चलाने वाले राकेश जायसवाल ने उमा भारती की नियुक्ति पर थर्डपोल डॉट नेट से कहा, मैं उनसे नहीं मिला हूं लेकिन वह चुनावों से पहले भी गंगा की सफाई को लेकर अभियान चलाती रही हैं।

नई मंत्री एक सन्यासी हैं और गंगा की सफाई करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावना से जुड़ा हुआ मसला है।

हालांकि भारती इस साल के शुरुआत में उस समय विवादों में आ गईं थीं जब उन्होंने कहा था कि गंगा नदी के किनारों से तब तक बालू का खनन बंद नहीं होना चाहिए, जब तक यह इको-फ्रेंडली तरीके से हो रहा है। यह ज्यादातर पर्यावरणविदों के विचारों से विपरीत है।

गंगा सफाई के लिए नये मंत्रालय को बनाए जाने के बारे में जायसवाल कहते हैं, यह देखकर अच्छा लगा कि नये प्रधानमंत्री गंगा की सफाई को लेकर प्रतिबद्ध हैं। लेकिन अगर राष्ट्रीय नदी को बचाना है तो नई सरकार को तुरंत कई ठोस कदम उठाने होंगे।

इस मामले में दो प्रमुख मुद्दे हैं- गैर बारिश वाले मौसम में नदी में पानी की कमी और प्रदूषण। सरकार को यह तय करना चाहिए कि हिमालय से आने वाले कुल पानी के आधे को नहरों में डालने के बजाय मुख्य धारा में वापस डाला जाए। इसके लिए धन की नहीं, बल्कि एक मजबूत प्रतिबद्धता और ठोस फैसले लेने की जरूरत है। सरकार 1986 से इसको लेकर संघर्ष कर रही है लेकिन इसमें कोई प्रगति नहीं हुई।

गंगा आहवान नामक एक जन आंदोलन की कार्यकर्ता मल्लिका भनोट कहती हैं कि अगर सरकार वास्तव में गंगा को बचाना चाहती है तो उसे गंगा में मुक्त प्रवाह को सुनिश्चित करना होगा।

वह कहती हैं, वैसे तो उमा भारती पहले बांध बनाए जाने के खिलाफ बोल चुकी हैं लेकिन मैं इस बात को लेकर सुनिश्चित नहीं हूं कि अब जबकि भाजपा की सरकार बन चुकी है, तब भी वह इसके खिलाफ बोल पाएंगी।

सरकार केवल सफाई पर फोकस करके मुख्य मुद्दे से दूर भाग रही है। जब तक मुक्त प्रवाह सुनिश्चित नहीं किया जाता, तब सारी कवायद का कुछ खास फायदा नहीं।

गंगा के संदर्भ में कई अहम मुद्दे हैं। मसलन, इकोसेंसटिव जोंस, समितियों की निगरानी, बांध, ग्लेशियर। गंगा की सफाई एक छोटा सा हिस्सा है।

भनोट उत्तराखंड में बांधों के खिलाफ अभियान चला रही हैं। वह कहती हैं कि नई सरकार को इस हिमालयी राज्य के लिए नीतियां बनाते वक्त सतर्क रहना चाहिए ताकि पिछले साल की भूस्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं दोबारा न हों।

किसी एक घाटी पर पड़ने वाले प्रभाव का असर दूसरी घाटी पर भी पड़ता है, जैसा कि हमने पिछले साल प्राकृतिक आपदा के दौरान देखा कि सभी नदियों के किनारों की सभी घाटियों पर इसका असर पड़ा।

यह एक बहुत संवदेनशील क्षेत्र है और सरकार को यहां की जल विद्युत नीति के बारे में फिर से विचार करना चाहिए।

गंगा सफाई के लिए नया मंत्रालय बनाए जाने और इसका जिम्मा उमा भारती को देने के बारे में यमुना जिये अभियान के मनोज मिश्र कहते हैं, मंत्रालय का वास्तविक नाम जल संसाधन, नदी विकास और गंगा सफाई है।

यह तो अब वक्त ही बताएगा कि यह केवल शब्दों का चमत्कार है या फिर वास्तव में यह मंत्रालय अपने नाम के हिसाब से काम करता है।

उमा भारती गंगा अभियान में सक्रिय रही हैं। गंगा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को वह पहले ही जाहिर कर चुकी हैं और हम उम्मीद करते हैं कि उनकी यही प्रतिबद्धता अन्य नदियों के प्रति भी दिखेगी।

नदी विकास शब्द पर चिंता जताते हुए मिश्र कहते हैं, हम नहीं जानते कि इसका क्या मतलब है, खासकर विकास यहां किस संदर्भ में इस्तेमाल किया गया है। यह एक भारी-भरकम और चिंता पैदा करने वाला शब्द है। हम नहीं चाहते कि नदी को विकसित किया जाए, बल्कि नदी को नदी की तरह ही रहने दिया जाना चाहिए। नदी विकास का मतलब नदियों को जोड़ने से है? अभी हम नहीं जानते।

 

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